कृष्ण कुमार सिकंदर
रायपुर। रायपुर से विशाखापट्टनम तक प्रस्तावित भारतमाला एक्सप्रेस-वे परियोजना में कथित फर्जी मुआवजा घोटले की परतें खुलती जा रही हैं। जांच एजेंसियों की पड़ताल और सरकारी रिपोर्टों में ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जो यह बताने के लिए काफी हैं कि करोड़ों रुपये के मुआवजे के खेल में न केवल नियमों को दरकिनार किया गया, बल्कि रिश्तों तक को बदल दिया गया।
इस पूरे मामले में पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के करीबी और रिश्तेदारों के नाम सामने आए हैं। सरकारी जांच रिपोर्ट के अनुसार उनके चचेरे भाई भूपेंद्र चंद्राकर और उनके परिवार ने भी मुआवजा हासिल करने के लिए कथित तौर पर ऐसा तरीका अपनाया, जिसने जांच अधिकारियों को भी चौंका दिया। रिपोर्ट में उल्लेख है कि जमीन खरीदते समय दिप्ती चंद्राकर के पति का नाम भूपेंद्र चंद्राकर दर्ज था, लेकिन जब मुआवजे की सूची तैयार हुई तो उसी दिप्ती चंद्राकर के पति का नाम जितेंद्र चंद्राकर हो गया। जांच एजेंसियां इस बदलाव को करोड़ों रुपये के मुआवजे से जोड़कर देख रही हैं।
राजनांदगांव जिले के देवादा गांव से जुड़े इस मामले में सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार भूपेंद्र चंद्राकर और उनकी पत्नी के नाम पर अलग-अलग मदों में करीब एक करोड़ 56 लाख रुपये का मुआवजा प्राप्त किया गया। जांच में यह भी सामने आया है कि अधिग्रहण की जद में आने वाली जमीनों को पहले खरीदा गया और बाद में उनके छोटे-छोटे हिस्से कर अलग-अलग नामों पर दर्ज कराया गया, ताकि अधिक मुआवजा प्राप्त किया जा सके।
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। अभनपुर क्षेत्र में भी भूपेंद्र चंद्राकर और रोशन चंद्राकर के नाम पर दर्ज जमीनों के एवज में पांच करोड़ 44 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा मिलने की बात सरकारी दस्तावेजों में दर्ज बताई जा रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि जमीनों का विभाजन और नामांतरण वास्तविक जरूरत के तहत हुआ था या फिर मुआवजा राशि बढ़ाने के उद्देश्य से।
जांच की आंच प्रशासनिक परिवारों तक भी पहुंचती दिखाई दे रही है। दुर्ग जिले की पाटन तहसील से जुड़े एक मामले में एक अपर कलेक्टर के माता-पिता, भाई और भाभियों के नाम पर जमीनों के हिस्से किए जाने की बात सामने आई है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार एक ही खसरा नंबर की जमीन को परिवार के विभिन्न सदस्यों के नाम पर बांटकर मुआवजा प्राप्त किया गया। जांच एजेंसियां इस पूरे लेन-देन की वैधता और परिस्थितियों की पड़ताल कर रही हैं।
दरअसल, केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना के तहत रायपुर से विशाखापट्टनम तक एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना के लिए बड़ी मात्रा में भूमि अधिग्रहण किया गया। आरोप है कि परियोजना की घोषणा के बाद प्रभावशाली लोगों ने अधिग्रहण क्षेत्र के आसपास की जमीनें खरीदीं और बाद में उन्हें छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर ज्यादा मुआवजा हासिल करने की योजना बनाई। इसी कथित फर्जीवाड़े की जांच आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की जा रही है। कई स्थानों पर छापेमारी हो चुकी है और दस्तावेजों की जांच जारी है। जांच अधिकारियों का मानना है कि जैसे-जैसे रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे, इस मामले में और भी प्रभावशाली नाम सामने आ सकते हैं।
भारतमाला मुआवजा घोटाले की यह नई कड़ी केवल आर्थिक अनियमितताओं की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी दिखाती है कि करोड़ों रुपये के लालच में किस तरह नियमों, प्रक्रियाओं और यहां तक कि पारिवारिक रिश्तों को भी बदलने के आरोप सामने आ रहे हैं। अब सबकी निगाहें जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई और संभावित खुलासों पर टिकी हुई हैं।