-सुभाष मिश्र
हिन्दी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने पर
मुख्य बात यह है कि स्याही के दौर की पत्रकारिता के मूल्य उस दौर के बीतते ही विघटित हो चुके हैं। 1826 की परिस्थितियों पर विचार करें। तब सूचना के अत्यंत सीमित संसाधनों के बीच अंग्रेजी साम्राज्यवाद के कठिन दौर में पत्रकारिता को नागरिक धर्म के निर्वाह की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ा था। आधुनिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार न होने से पाठकों की संख्या भी बहुत सीमित थी। याद करें कि लगभग 50 वर्ष बाद भारतेंदु हरिश्चंद्र की पत्रकारिता में ‘हिंदी नई चाल में ढली। वह अपने समय का सीधे सामना करने के काबिल हुई जब इसी छत्तीसगढ़ में माधव राव सप्रे ने ‘हिंदी केसरी पत्रिका निकाली जो लोकमान्य तिलक के ‘केसरी से प्रेरित थी। औपनिवेशिक युग के पत्रकारों ने स्याही से आजादी की लड़ाई लड़ी थी। महात्मा गांधी की पत्रकारिता को इस सिलसिले में याद किया जाना चाहिए।
स्वतंत्र भारत में शिक्षा के प्रचार-प्रसार और राजनीतिक जागरूकता के साथ पत्रकारिता जन जागरण के दायित्व का निर्वाह करती चली आ रही थी। जनता को शिक्षित करने में उसकी अहम भूमिका थी। यह भूमिका तब बदलने लगी जब पत्रकारिता बड़ी पूंजी और संस्थाओं के हवाले हो गई। उसके सामाजिक सरोकारों का क्रमश: क्षरण होने लगा। आपातकाल के आसपास पत्रकारिता में स्पष्ट वैचारिक विभाजन दिखाई देता है जब दो तरह की पत्रकारिता अलग-अलग राहों पर चल पड़ती है। एक रास्ता सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता का था, और दूसरा रास्ता व्यावसायिक सरोकारों से बनने लगा। 21वीं शताब्दी में पत्रकारिता मुख्यत: व्यवसाय बन गई वह पूंजी निवेश का माध्यम और निहित व्यावसायिक और राजनीतिक हितों के अनुरूप जनमत निर्माण की फैक्ट्री बन गई। इस दौरान पूंजी निवेश के साथ पत्रकारिता में नवीनतम टेक्नोलॉजी का प्रवेश हुआ और वह प्रिंट माध्यम की सीमाएं तोड़कर साइबर के माध्यम यानी आधुनिक संचार क्रांति के साथ कदम से कदम मिलाकर इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता में बदल गई। इस नई कसम की पत्रकारिता में पढऩे की बजाय देखना मुख्य क्रिया थी। पत्रकारिता के इस नए दौर में पाठक हाशिए पर जा रहा है और दर्शक पत्रकारिता की नई संस्कृति में दीक्षित हो चुका है। उसके लिए दृश्य ही सत्य है। दृश्य ही उसका मत और समाज का जनमत निर्मित करता है। दृश्य पूर्णत: वैध है, क्योंकि दर्शक मानता है कि’आंखिन देखी को झूठ लाया नहीं जा सकता। सच तो यह है कि पत्रकारिता में एक ‘पोस्ट ट्रुथ या ‘उत्तर सत्य सक्रिय है कि झूठ का ही दूसरा नाम है। कंप्यूटर या टेलीविजन का स्क्रीन वह जगह है जहां विश्वसनीय सत्य और उत्तर सत्य दोनों संभावनाओं के साथ एक नई पत्रकारिता संस्कृति आकार ले रही है। यही आज की पत्रकारिता का सत्य है।
कलम से लड़ी गई लड़ाई का लक्ष्य कभी अंग्रेजी साम्राज्यवाद का सामना करना था। फिर पत्रकारिता की यह लड़ाई राष्ट्र निर्माण के संघर्ष से जुड़ गई। लेकिन नव औपनिवेशिक समय की वैश्वीकृत पत्रकारिता आज फिर से एक नई तरह की गुलामी की ओर जनता को धकेल रही है। झूठ को सच और सच को झूठ बनाकर पेश करने में लगातार नए-नए करतब और कौशल से लैस हो रहा है। यही हमारे दौर की पत्रकारिता की विडंबना है।
स्याही से स्क्रीन तक का बदलाव
स्याही के शब्दों में ठहराव होता है। स्थायित्व होता है। बोलने वाले को और पढऩे वाले को विचार करने का अवसर मिलता है। सही या गलत को संतुलित करने या लिखने के लिए समय होता है। सूचना और संवेदना के पास एक अवकाश होता है यानी समय होता है कि वह समाचार को किस तरह से लिखे लेकिन स्क्रीन पर यह अवसर नहीं होता जो बोल दिया वह अंतिम हो गया। सोचने का अवसर नहीं होता। बोलते समय सोचने का अवसर नहीं होता है जो सुन रहा है उसके पास विचार करने का अवसर नहीं होता कि क्या बोला गया क्योंकि तब तक अगला वाक्य आ जाता है।
प्रिंट मीडिया में समाचार बनाते समय या कोई स्टोरी लगाते समय एक या दो लोग चर्चा करते हैं। स्क्रीन पर बोलने वाले को पीछे से कई लोग कंट्रोल करते हैं। उसे लगातार कहा जाता है कि यह नहीं बोलना है और यह बोलना है। कौन सा दृश्य दिखाना है कौन सा नहीं दिखाना है। सब कुछ कंट्रोल होता है। स्क्रीन पर झूठ बोलने के अवसर ज्यादा होते हैं क्योंकि जो झूठ बोल दिया गया है उसके बाद पचासों समाचार आ जाते हैं। बोले गए झूठ को छुपाने या ढकने के लिए बाद में कई अवसर रहते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के समय हमने देखा है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भारतीय सेवा को रावलपिंडी और लाहौर तक भेज दिया था और न जाने कितने विमान गिरते हुए बताए थे। यह झूठ का अतिरेक था। लेकिन प्रिंट मीडिया में ऐसा नहीं होता है जो छपकर चला गया उसे आप किसी भी तरह से उसी समय हटा नहीं कर सकते हैं। प्रिंट मीडिया तो प्रमाण की तरह हर बार आपके हाथ में होता है। वह प्रमाण आप पर नैतिक दबाव भी बनाता है और व्यावहारिक दबाव भी बनाता है। इसलिए स्याही का लिखा हुआ यानी प्रिंट मीडिया ज्यादा पवित्र, ईमानदार और विश्वसनीय होता है।
स्क्रीन पर यानी टेलीविजन पर बोलते समय आपके पीछे से कंट्रोल किया जाता है इसलिए आप अपने मन से कुछ नहीं बोल सकते। आपकी निजी नैतिकता और ईमानदारी का वहां कोई अर्थ नहीं होता है जो पीछे से कहा जा रहा है वही आपको बोलना है। जो समाचार सामने स्क्रीन पर आ रहा है वही बोलते जाना है।
प्रिंट मीडिया आपको समाचार या स्टोरी के विश्लेषण का अवसर देता है लेकिन स्क्रीन पर यह सुविधा नहीं है। प्रिंट मीडिया में समाचार या स्टोरी लिखते समय कोई वाक्य गलत हो गया तो हम उसी समय ठीक कर सकते हैं लेकिन स्क्रीन पर गलत बोला गया वाक्य आपके अपराध में शामिल हो जाता है। वहां उसे ठीक करने का कोई अवसर नहीं है। लाइव कार्यक्रम में तोऔर ज्यादा दिक्कतें हैं।
कोरोना काल में तो स्क्रीन पर बोलने वालों की स्थिति बहुत दिलचस्प थी। ऊपर तो न्यूज़ रीडर ने कोट पहना है और टाई पहनी है। लेकिन नीचे आदमी बरमूडा या हाफ पैंट पहन कर बैठा है। नजर नहीं आता है। कैमरा सिर्फ ऊपर ऊपर काम करता है। जिस तरह बोलने वाले का झूठ उसके चेहरे पर नजर नहीं आता है। उसी तरह उसकी नंगेपन का सच भी नजर नहीं आता है क्योंकि कैमरा कमर से ऊपर रहता है।
प्रिंट मीडिया में हम जो कुछ भी बोलते हैं, जो स्टोरी लिखते हैं वो महत्वपूर्ण होती है। वह कई बार एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह इतिहास हो जाती है। आपातकाल और भोपाल की गैस त्रासदी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। उस समय के फोटो और समाचार और स्टोरी आज भी संदर्भ की तरह काम आते हैं।
प्रिंट मीडिया में इतिहास को सुरक्षित रखने का अवसर होता है। मोहलत होती है लेकिन स्क्रीन पर ऐसा कोई अवसर नहीं होता है। एक कारण यह भी है कि स्क्रीन के पत्रकार बहुत जल्दी लोगों की स्मृतियों से उतर जाते हैं। लेकिन प्रिंट मीडिया के पत्रकार याद रहते हैं। लोग आज भी गणेशशंकर विद्यार्थी से लेकर माधवराव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी, राहुल बारपूते, राजेंद्र माथुर आदि को याद करते हैं। यानी पत्रकारिता में अमरता का रास्ता यह जगह अभी भी प्रिंट मीडिया में सुरक्षित है।