भारतीय ज्ञान परंपरा पर मंथन, साहित्यकारों की कृतियों का भव्य विमोचन

रायपुर। राज्य शैक्षिक अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा और मेरा लेखन विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। इसमें साहित्य लघु कथा भारतीय चिंतन पर गंभीर विमर्श हुआ। कार्यक्रम के दौरान के तीन साहित्यकारों की पुस्तकों का विमोचन किया गया। साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार बलराम जी के जीवन के 75 वर्ष पूरे होने पर सम्मानित किया गया।
इस दौरान साहित्यकार जयप्रकाश मानस की ‘बची हुई हवा’ और ‘दो कतार पीछे’ का भी विमोचन किया गया। साहित्यकार डॉक्टर महेंद्र ठाकुर की ‘सत्य, संघर्ष, सत्य, साहस और संघर्ष का सृजन’, ‘बॉस का डिनर’ और ‘नेताजी घुंघट के साए में’ का भी विमोचन किया गया। साथ ही शकुंतला तरार की पत्रिका ‘नारी का संबल’ भी विमोचन किया गया। इस दौरान वरिष्ठ कथाकार, संपादक बलराम जी को उनके जीवन के 75 वसंत पूरे होने पर विशेष रूप से सम्मानित किया गया। उनको यह सम्मान विभिन्न साहित्य संस्थाओं की ओर से दिए गए। कार्यक्रम में डॉक्टर सुशील त्रिवेदी, गिरीश पंकज, सुभाष मिश्रा, महेंद्र ठाकुर, दिवाकर जी, डॉक्टर संजय अलांग, तिलोक पहावर, डॉ. सुधीर शर्मा, छत्तीसगढ़ साहित्य परिषद के अध्यक्ष शशांक शर्मा, मुमताज, लोक बाबू डॉ. चितरंजनकर मौजूद थे।
कार्यक्रम में बलराम अग्रवाल ने कहा कि ‘दो कतार पीछे’ जयप्रकाश मानस का दूसरा लघुकथा संग्रह है, जो अपनी विषयवस्तु, शिल्प और प्रयोगधर्मिता के कारण अलग पहचान बनाता है। उन्होंने बताया कि जयप्रकाश मानस कविता, लघुकथा, ललित निबंध, आलोचना, साक्षात्कार, डायरी, बालगीत, लोक साहित्य और विज्ञान जैसे विविध विषयों पर लगातार लेखन करते रहे हैं। उनकी रचनाएं देश-विदेश की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उन्होंने कहा कि इस संग्रह में लेखक ने कई नए प्रयोग किए हैं। ‘गाजा’ और ‘पांच लघुकथाएं’ जैसे शीर्षकों के माध्यम से उन्होंने कथ्य और प्रस्तुति दोनों स्तरों पर नवीनता दिखाई है। कुछ लघुकथाओं में चंपू शैली का प्रयोग भी देखने को मिलता है। अग्रवाल ने कहा कि जयप्रकाश मानस की विशेषता केवल प्रतीकों के प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि वे प्रतीकात्मक चित्र भी रचते हैं। कई बार उनकी लघुकथाओं में प्रयोग शीर्षक से ही शुरू हो जाता है। रूपक, फैंटेसी, बिंब, संकेत और प्रतीक जैसे काव्य गुणों का उन्होंने बेहद संतुलित और प्रभावी उपयोग किया है।

कार्यक्रम में ‘आज ही जनधारा’ के प्रधान संपादक और पूर्व अपर संचालक जनसंपर्क सुभाष मिश्र ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश मानस की लघुकथाएं हमेशा सकारात्मक दृष्टि के साथ पाठकों के सामने आती हैं। उन्होंने मानस की चर्चित लघुकथा ‘सभा और तालियां’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह रचना ज्ञान, अधिकार और सामाजिक स्वीकृति पर गहरी दार्शनिक टिप्पणी करती है। यह कहानी बताती है कि कई बार बाहरी सम्मान और प्रतीक वास्तविकता को विकृत कर देते हैं। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश मानस संवाद लेखन में बेहद संयमित और कुशल हैं। उनकी लघुकथाओं के संवादों में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द उद्देश्यपूर्ण और अर्थगर्भित होता है। विषय चयन और शीर्षकों में नवीनता दिखाई देती है, वहीं प्रस्तुति शैली भी पारंपरिक ढांचे से अलग नजर आती है। उन्होंने कहा कि मानस लीक पर चलने वाले साहित्यकार नहीं, बल्कि नई लीक बनाने वाले रचनाकार हैं, जो स्थापित सांचों और खांचों को तोड़ने का साहस रखते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि ‘बची हुई हवा’ के बाद यह उनका दूसरा लघुकथा संग्रह है, जिसमें जीवन के विभिन्न पक्षों को सूक्ष्मता से उकेरा गया है। उनके अनुसार लघुकथा जीवन के किसी एक क्षण, दृश्य या अंतःकरण की वीडियोग्राफी और एक्स-रे की तरह होती है, और इस संग्रह की अधिकांश रचनाएं इस अवधारणा को सार्थक करती हैं।
कार्यक्रम के दौरान अन्य वक्ताओं ने भी भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य और समकालीन लेखन पर अपने विचार रखे। व्याख्यान में साहित्य प्रेमियों और प्रतिभागियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

