-सुभाष मिश्र
देश इस समय दोहरी मार झेल रहा है-एक तरफ आसमान से बरसती आग और दूसरी तरफ धरती के भीतर सूखता पानी। उत्तर भारत से लेकर छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान और दक्षिण भारत तक तापमान 45 से 46 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। शहरों में ट्रांसफार्मर फेल हो रहे हैं, बिजली व्यवस्था चरमरा रही है, एसी और कूलर जवाब दे रहे हैं और गांवों में पेयजल के लिए टैंकरों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। मीडिया की सुर्खियां अब केवल मौसम की खबर नहीं रहीं, बल्कि वे आने वाले जलवायु संकट की चेतावनी बन चुकी है।
छत्तीसगढ़ के अखबारों में प्रकाशित खबरें बताती हैं कि रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और बिलासपुर जैसे शहरों में पारा 44-46 डिग्री तक पहुंच गया है। बिजली ट्रांसफॉर्मर फेल हो रहे हैं, केबल जल रहे हैं, और बड़े भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसी व्यवस्थाएं केवल कागजों तक सीमित हैं। यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि विकास मॉडल की खामियों का प्रमाण है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार बीते वर्षों में गर्मी की तीव्रता लगातार बढ़ी है। वर्ष 2025 भारत का आठवां सबसे गर्म वर्ष रहा। अत्यधिक गर्मी, बाढ़, तूफान और अन्य चरम मौसमी घटनाओं में लगभग 2760 लोगों की मौत दर्ज की गई। एक अन्य अध्ययन के अनुसार 2025 में देश के 99 प्रतिशत दिनों में किसी न किसी प्रकार की चरम मौसमी घटना दर्ज की गई।
गर्मी अब केवल असुविधा नहीं रही, यह एक साइलेंट डिजास्टर बन चुकी है। नीति अनुसंधान संस्था ञ्जश्वक्रढ्ढ के अनुसार, 1992 से 2015 के बीच भारत में आधिकारिक रूप से 24 हजार से अधिक लोगों की मौत हीटवेव से हुई। 2024 में 48 हजार से अधिक संदिग्ध हीटस्ट्रोक मामले दर्ज किए गए। विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है क्योंकि भारत में हीटस्ट्रोक से होने वाली मौतों का सही दस्तावेजीकरण नहीं हो पाता।
सबसे भयावह स्थिति पेयजल संकट की है। महाराष्टप्त के अकोला जैसे शहरों में छह-छह दिन बाद पानी सप्लाई हो रहा है। बांधों का जलस्तर तेजी से घट रहा है और महिलाएं पूरा दिन केवल पानी जुटाने में बिता रही हैं। देश के अनेक हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। शहरीकरण और कांक्रीट के जंगलों ने बारिश के पानी को जमीन में जाने से रोक दिया है। अखबारों में प्रकाशित खबरों के अनुसार बड़े भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था या तो है नहीं, या फिर निष्क्रिय पड़ी है। परिणामस्वरूप बारिश का पानी सीधे नालियों में बह जाता है और भूजल रिचार्ज नहीं हो पाता।
यह संकट केवल मौसम का नहीं, बल्कि विकास और उपभोग की उस अंधी दौड़ का परिणाम है जिसमें प्रकृति को पीछे छोड़ दिया गया। शहरों में पेड़ कटे, तालाब पाटे गए, नदियों को सीवर में बदल दिया गया और कंक्रीट की इमारतों ने धरती की सांस रोक दी। अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव के कारण शहर गांवों की तुलना में कई डिग्री अधिक गर्म हो चुके हैं। रात का तापमान भी अब राहत नहीं देता।
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती आर्द्रता और गर्मी मिलकर वेट बल्ब टेम्परेचर जैसी घातक स्थिति पैदा कर सकती है, जहां मानव शरीर स्वयं को ठंडा रखने में असमर्थ हो जाता है। इस संकट का सबसे बड़ा शिकार गरीब और मेहनतकश वर्ग है। दिहाड़ी मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, निर्माण श्रमिक और सड़क किनारे काम करने वाले लोग खुले आसमान के नीचे काम करने को मजबूर हैं। उनके पास न पर्याप्त पानी है, न शीतलन के साधन, और न ही स्वास्थ्य सुरक्षा। गर्मी अमीर-गरीब के बीच की खाई को और चौड़ा कर रही है। जिनके घरों में एसी हैं, वे भी बिजली कटौती से परेशान हैं और जिनके पास पंखा भी नहीं, उनके लिए यह मौसम जीवन-मृत्यु का प्रश्न बनता जा रहा है।
भविष्य की तस्वीर और भी चिंताजनक है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरण विनाश की वर्तमान गति जारी रही तो आने वाले दशकों में भारत के कई हिस्से लंबे समय तक अत्यधिक गर्म क्षेत्र बन सकते हैं। एक हालिया शोध के अनुसार उच्च उत्सर्जन की स्थिति में भारतीय शहरों में हीटवेव से होने वाली मौतें कई गुना बढ़ सकती हैं। जल संकट भी केवल ग्रामीण समस्या नहीं रहेगा। महानगरों में डे-जीरो जैसी स्थिति-जब नलों में पानी आना बंद हो जाए अब काल्पनिक नहीं रह गई।
सरकारों द्वारा हीट एक्शन प्लान, टैंकर सप्लाई और अलर्ट जारी करना जरूरी है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। असली समाधान दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुधारों में है वर्षा जल संचयन को कठोरता से लागू करना होगा, तालाबों और जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने होंगे और ऊर्जा के टिकाऊ विकल्पों पर तेजी से काम करना होगा। साथ ही जल संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन बनाना होगा।
यह समय केवल मौसम की शिकायत करने का नहीं, बल्कि विकास की दिशा पर पुनर्विचार करने का है। क्योंकि यदि धरती इसी तरह गर्म होती रही और पानी इसी तरह घटता रहा, तो आने वाले वर्षों में भारत को केवल गर्मी नहीं, बल्कि जल और जीवन के अस्तित्व की लड़ाई लडऩी पड़ सकती है।