भाजपा बदल रही या बदला ले रही

बीते एक दशक से भारतीय जनता पार्टी में बदलाव की बयार चल रही हैऔर इससे प्रभावित नेता इसे बदलाव नहीं बदला बता रहे हैं। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद छत्तीसगढ़ में भी इसका असर देखने मिला जब भाजपा ने सारे स्थापित नेताओं को किनारे लगाना शुरू कर दिया।दो साल पहले विष्णुदेव साय मुख्यमंत्री बने और विजय शर्मा, अरुण साव, ओपी चौधरी, श्यामबिहारी जायसवाल, राजेश अग्रवाल और गजेंद्र यादव को मंत्रिमंडल में महत्त्व दिया।संगठन में भी किरण देव को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। साथ ही नए चेहरों यशवंत जैन, अखिलेश सोनी और नवीन मारकंडे जैसे युवाओं पर भरोसा जताया गया। अब भाजपा की कोर कमेटी और प्रदेश कार्यसमिति में भी जब बदलाव की यह बयार चली तो हंगामा हो गया। भाजपा ने अपनी कोर कमेटी से सांसद बृजमोहन अग्रवाल, कृषि मंत्री रामविचार नेताम, विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह, पुन्नूलाल मोहिले, विक्रम उसेंडी, रेणुका सिंह और गौरीशंकर अग्रवाल को बाहर कर दिया। अब इनकी जगह विजय शर्मा, अरुण साव, ओपी चौधरी, लता उसेंडी, अमर अग्रवाल और शिव रतन शर्मा ने ले ली है। ठीक इसी तरह प्रदेश कार्यसमिति से 23 विधायकों को बहार का रास्ता दिखाया गया है। भाजपा संगठन की परम्परा में सभी विधायकों को प्रदेश कार्यसमिति में शामिल किया जाता है लेकिन इस बार चौदह मंत्री और सत्रह विधायकों को ही जगह दी गई है। इस कार्यसमिति में विधायक सुशांत शुक्ल, भैया लाल रजवाड़े, ललित चंद्राकर, प्रबोध मिंज, धर्मजीत सिंह, अनुज शर्मा और ईश्वर साहू भी जगह नहीं बना पाए। अब भाजपा के विधायक दबे स्वरों में गुटबाजी का आरोप लगा रहे हैं। इनका कहना है कि कुछ बड़े नेताओं की करीबी का लाभ कुछ नेताओं को मिल रहा है। इस बदलाव में सर्वाधिक चर्चा सांसद बृजमोहन अग्रवाल को लेकर हो रही है। देखा जाये तो बृजमोहन को किनारे लगाने का काम कई साल पहले से चल रहा है। प्रदेश की राजनीति में अमर अग्रवाल से उनकी प्रतिद्वंदिता किसी से छिपी नहीं है। आज संगठन अमर अग्रवाल को महत्व दे रहा है और बृजमोहन को किनारे कर रहा है। केवल बृजमोहन ही नहीं अजय चंद्राकर, प्रेम प्रकाश पांडेय जैसे और कई नाम हैं जिनकी पार्टी में कोई पूछ परख नहीं है। अपना महत्त्व बढ़ने के लिए इन नेताओं ने क्या नहीं किया मुख्यमंत्री के नाम पत्र लिखकर उसे सार्वजानिक किया, विधानसभा में नए विधायकों और मंत्रियों को नीचे दिखाया लेकिन कोई जतन काम नहीं आया। ये बदलाव बता रहा है कि आने वाले समय में भाजपा के संगठन की तस्वीर कैसी होगी। नए लोगों को बढ़ावा मिलेगा और उनका कद भी बढ़ाया जायेगा। पार्टी के वरिष्ठ लोग कहते हैं कि यह एक पीढ़ीगत बदलाव है जिन लोगों को आज किनारे लगाया जा रहा है एक समय उन्हें भी आगे लाने के लिए संगठन ने उस दौर के वरिष्ठ लोगों को किनारे लगाया था। यह बात कम से कम बृजमोहन अग्रवाल तो भली भांति जानते होंगे। ये बदलाव है या बदला यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन इतना तय है कि आने वाले समय में भाजपा कई दिग्गजों को घर भेजने की तैयारी कर रही है। आज जो विधायक या सांसद हैं उन्हें अगली बार टिकट भी मिलेगा इस बात पर भी संशय है। एक ज़माने में संगठन पर जिन गौरीशंकर अग्रवाल का शासन चलता था पार्टी ने उन्हें एक पद के लिए तरसा दिया। एक बात और कि मोदी लहर में कुछ ऐसे लोग जो नाच गाकर या जनता की सहानुभूति पाकर या जुगाड़ लगाकर आज सत्ता और संगठन में मौज काट रहे हैं उनका नंबर भी जल्द लगने वाला है।
समय पर हो पाएगी पीसीसीएफ की नियुक्ति

इस महीने के अंत में प्रदेश के वन विभाग के मुखिया श्रीनिवास राव रिटायर हो रहे हैं। अब सबको इंतजार और उत्सुकता है कि अगला पीसीसीएफ यानी प्रधान मुख्य वन संरक्षक कौन होगा। राज्य सरकार को इस नियुक्ति के साथ साथ मुख्य वन बल संरक्षक के पद पर भी नियुक्ति करना है। फ़िलहाल यह दोनों पद श्रीनिवास राव के पास ही है। सामान्य प्रक्रिया में ऐसा होता है कि विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक हो और इन दोनों पदों पर नियुक्ति कर दी जाए लेकिन यह इतना सामान्य भी नहीं है। बीते दिनों विभाग में पदोन्नति समिति की बैठक होने वाली थी लेकिन अचानक उसे टाल दिया गया, तभी से से इस पद पर होने वाली नियुक्ति लेकर चर्चा गरमा गई है। थोड़ी पुरानी बात कर लेते हैं जब प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तब पुलिस महानिदेशक, मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद पर अशोक जुनेजा, अमिताभ जैन और श्रीनिवास राव पदस्थ थे। विष्णुदेव साय सरकार ने तमाम दबाव के बाद भी इनमें से किसी को नहीं हटाया। चूँकि अशोक जुनेजा पहले ही एक्सटेंशन पर चल रहे थे इसलिए सरकार ने अरुणदेव गौतम को प्रभारी डीजीपी बनाया। मुख्य सचिव अमिताभ जैन के रिटायर होने तक सरकार नए मुख्य सचिव का नाम तय नहीं कर पाई और अमिताभ जैन की सेवा को तीन महीने का विस्तार देना पड़ा। अब सरकार को प्रधान मुख्य वन संरक्षक और मुख्य वन बल संरक्षक का चयन करना है और वह भी इस महीने की आखरी तारीख तक। लगता है कि सरकार इस मामले में भी पुराने प्रदर्शन को दोहरा सकती है। इस आशंका बल इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि दो दिन पहले ही विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक को टाल दिया गया। जानकार बताते हैं कि इस पद के लिए 1994 बैच के आईएफएस अरुण पांडे और 1995 बैच के ओमप्रकाश यादव का नाम सबसे आगे है। वरिष्ठता के क्रम में कुछ और नाम भी हैं लेकिन इनमें कौशलेन्द्र कुमार के नाम की ज्यादा चर्चा है। बहरहाल, उम्मीद की जा सकती है कि सरकार इसी महीने के अंत तक वन विभाग के इन दोनों शीर्ष पदों पर नियुक्ति कर देगी और इसके लिए उसे दिल्ली दरबार की ओर ताकना नहीं पड़ेगा।
मन में लड्डू तो फूटा था

” मन में लड्डू फूटा ” ये किसी चॉकलेट कंपनी के विज्ञापन का एक चर्चित जिंगल हुआ करता था। राजनीति में भी कई बार कई अवसरों पर नेताओं और उनके समर्थकों के मन में लड्डू फूटते रहते हैं। हुआ यूँ कि केरल में कांग्रेस गठबंधन ने रिकॉर्ड जीत अर्जित की और उसके बाद मुख्यमंत्री के चयन पर माथापच्ची शुरू हो गई। कांग्रेस के संगठन महासचिव और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के अत्यंत करीबी केसी वेणुगोपाल का नाम इस दौड़ में सबसे ऊपर चल रहा था। उनके साथ डी सतीशन और रमेश चेन्निथला भी मुख्यमंत्री की दौड़ में थे। सबको लग रहा था कि वेणुगोपाल केरल के सीएम बन जाएंगे क्योंकि वे राहुल गांधी के खासम ख़ास हैं। अगर ऐसा होता है तो संगठन महासचिव का पद किसे मिलेगा। इस दौरान वेणुगोपाल के समर्थकों के मन में भी लड्डू फूट रहे थे। इसी बीच छत्तीसगढ़ में चर्चा होने लगी कि वेणुगोपाल सीएम बने तो उनका स्थान पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव भूपेश बघेल को मिल सकता है।मतलब लड्डू यहाँ भी फूट रहा था। सोशल मिडिया पर भी यह बात होने लगी कि कांग्रेस भूपेश बघेल को बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है, लेकिन राहुल गांधी ने डी सतीशन को सीएम बनाकर लड्डू का चूरमा बना दिया। वैसे कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को ये बात याद रखना चाहिए कि कांग्रेस का हाई कमान यानी गांधी परिवार भूपेश बघेल जैसे देशज और जमीन से जुड़े नेता को आगे तो बढ़ा सकता है लेकिन अपनी गुड बुक में कभी नहीं रखेगा क्योंकि उनकी कोटरी में जगह केवल अभिजात्य वर्ग (इलीट क्लास ) के नेताओं को ही मिलती है।
जिसकी चल जाए वो चला लेता है

किसी भी सरकार का एक शक्ति केंद्र होता है चालू भाषा में इसे सिंगल विंडो सिस्टम भी कहते हैं। पंद्रह वर्षों तक चली भाजपा की रमन सरकार में यह व्यवस्था थी, लेकिन मौजूदा विष्णुदेव साय की सरकार में ऐसा कोई सिस्टम बन नहीं पाया। जिसका फायदा भी है और नुकसान भी। लोग अक्सर पूछते हैं इस सरकार में किसकी चल रही है अब क्या बताएं किसकी चल रही है जो चला ले उसकी चल रही है। अब देखिये कि लम्बे समय की माथापच्ची के बाद सरकार ने बड़े पैमाने पर प्रशासनिक फेरबदल किया लेकिन मात्र 48 घंटे के भीतर फिर एक छोटा आदेश निकालकर एक महिला आईएएस को कलेक्टर बनाना पड़ा। दरअसल, 20216 बैच की इस महिला आईएएस को उच्च शिक्षा का आयुक्त बनाया गया लेकिन इनको बनना कलेकटर था फिर क्या ? संगठन के एक प्रभावशाली नेता की दखल के बाद तत्काल उन्हें कलेक्टर बनाया गया और 2012 बैच की जिस महिला आईएएस को कलेक्टर बना दिया गया था उन्हें बिना ज्वाइन किये वापस अपने पुराने विभाग में लौटना पड़ा। लब्बे लुबाब ये कि जिसकी चल जाये वो चला लेता है।