ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर आज देश सहित प्रदेशभर में वट सावित्री व्रत का पावन पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए सुबह से ही वट वृक्ष (बरगद) की विशेष पूजा-अर्चना कर रही हैं। इस साल का व्रत बेहद खास माना जा रहा है क्योंकि आज शनिवार का दिन होने के कारण शनि जयंती का भी एक दुर्लभ और अत्यंत फलदायी संयोग बना है।
ज्योतिषविदों के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या तिथि की शुरुआत 15 मई की दोपहर से हो चुकी है, जो आज 16 मई की शाम तक प्रभावी रहेगी। उदयातिथि के मान से आज पूरे दिन व्रत रखा जा रहा है। सुबह से ही सुहागिनें सोलह श्रृंगार कर नए वस्त्रों में बरगद के पेड़ के नीचे जुटने लगी हैं, जहां वे वट वृक्ष को जल अर्पित कर, सूत लपेटकर परिक्रमा कर रही हैं और सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा का श्रवण कर रही हैं।
पूजा के लिए ये हैं सबसे उत्तम मुहूर्त
शास्त्रों के अनुसार, शुभ समय में की गई पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है। आज दिनभर में आराधना के लिए दो सबसे विशेष मुहूर्त उपलब्ध हैं:
सुबह का उत्तम समय: सुबह 07:15 बजे से लेकर 10:45 बजे तक का समय पूजा के लिए बेहद श्रेष्ठ है। इस अवधि में की गई मानसिक और शारीरिक शुद्धि के साथ पूजा विशेष पुण्य देती है।
अभिजीत मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ समय): यदि आप सबसे शुभ घड़ी में पूजा संपन्न करना चाहती हैं, तो सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक का अभिजीत मुहूर्त सबसे उत्तम रहेगा। इस काल में किए गए धार्मिक कार्य निश्चित रूप से सफल और सिद्ध होते हैं।
पूजन विधि और आवश्यक सामग्री
इस व्रत को पूर्ण रूप से सफल बनाने के लिए पूजा की थाली और सामग्री का विशेष महत्व है। महिलाएं बांस की टोकरी में सात प्रकार के अनाज (सप्तधान्य), भीगे हुए चने, मौसमी फल और मिठाइयां रखकर वट वृक्ष के पास पहुंच रही हैं। पूजन के दौरान बरगद के तने पर सात बार कच्चा सूत या रक्षासूत्र लपेटने का विधान है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद की परिक्रमा और पूजा करते समय ‘ॐ सती सावित्र्यै नमः’ मंत्र का निरंतर जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। पूजा संपन्न होने के बाद अखंड सौभाग्य की कामना के साथ किसी सुहागिन महिला को सुहाग सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां) दान करने की भी परंपरा है।
त्रिदेवों का वास और शनि दोष से मुक्ति
सनातन धर्म में वट वृक्ष को बेहद पूजनीय माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का वास होता है। बरगद की लंबी आयु और मजबूती की तरह ही महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की स्थिरता की कामना करती हैं।
इसके साथ ही, आज शनि जयंती होने के कारण इस व्रत का महत्व दोगुना हो गया है। आज बरगद की जड़ में जल अर्पित करने और शाम के समय वहां दीपक प्रज्वलित करने से कुंडली में मौजूद शनि दोषों, साढ़ेसाती और ढैय्या के कुप्रभावों से मुक्ति मिलती है। दिनभर निर्जला या फलाहारी व्रत रखने के बाद महिलाएं शाम को सात्विक भोजन ग्रहण कर अपना उपवास खोलेंगी।