-सुभाष मिश्र
हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती, यह कहावत दुनिया में कहीं भी कही गई हो, लेकिन उसका सबसे गहरा अर्थ भारत ही समझता है। क्योंकि भारत में सोना सिर्फ धातु नहीं है, भावना है, प्रतिष्ठा है, सुरक्षा है, संस्कार है और कई बार तो संकट के समय घर की चलती-फिरती बैंक भी है। यहां बच्चा पैदा होता है तो दादी उसकी कलाई में सोने का कड़ा डाल देती है, शादी होती है तो लड़की के गहनों से घर की इज्जत नापी जाती है। इसके पीछे व्यावहारिक कारण यह रहा कि कभी आर्थिक संकट के समय यही सोना काम आएगा। हमारे यहां तो मंदिर बनता है तो उसके शिखर पर सोने का कलश चढ़ता है और भगवान तक सोने का मुकुट पहनकर विराजते हैं। मंदिरों में भगवान की मूर्तियों पर हीरे मोती और सोने के जेवर चढ़ाए जाते हैं जो परोक्ष में दर्शनार्थियों की कथित धार्मिक भावना को बढ़ाने के भी काम में आते हैं कि वे भी चाहें तो मंदिर में सोना दान कर सकते हैं। भारत में सोना केवल शरीर पर नहीं, संस्कृति पर भी पहना जाता है।
हमारे गीत-संगीत, कहावतें और किस्से भी सोने से चमकते हैं। सोना ले जा रे, चांदी ले जा रे, सोने जैसा दिल, सोने सा खरा आदमी , चांदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल.. यहां तक कि रावण की लंका भी सोने की कल्पित की गई। यानी भारतीय मानस में वैभव की अंतिम परिभाषा ही सोना है। अमीरी का प्रतीक सोना ही है। स्त्री और अब तो पुरुष भी सोने के गहने पहनते हैं और अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करते हैं। सोना अमीरी मापने का एक पैमाना हो गया है। दक्षिण भारत में तो शादी-ब्याह में सोने का प्रदर्शन सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। कई परिवारों में बैंक बैलेंस कम हो सकता है, लेकिन लॉकर में दो चूडिय़ां और एक हार जरूर मिलेगा।
ऐसे देश में जब प्रधानमंत्री लोगों से अपील करते हैं कि च्च्एक साल तक सोना कम खरीदिए तो यह केवल आर्थिक अपील नहीं रहती, यह सीधे भारतीय गृहस्थी के दिल पर दस्तक बन जाती है। वजह भी है। खाड़ी देशों में तनाव, अमेरिका-ईरान और पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल के साथ सोने के दाम भी लगातार बढ़ रहे हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में है। हम हर साल लगभग 700 से 900 टन सोना विदेशों से खरीदते हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है। सरकार चाहती है कि लोग सोने की खरीद थोड़ी कम करें ताकि आयात बिल घटे। आर्थिक दृष्टि से बात बिल्कुल सही है लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह वैसा ही है जैसे किसी भारतीय से कह देना कि थोड़ा कम रिश्तेदारी निभाइए।
दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद सोशल मीडिया पर भी नया स्वर्ण युग शुरू हो गया। पुरुष वर्ग के मीम्स वायरल होने लगे कोई टीवी पर मोदी जी की आरती उतार रहा है कि अब पत्नी के लिए सोना नहीं खरीदना पड़ेगा तो कोई लिख रहा है कि देशहित में इस बार कंगन नहीं आएंगे। महिलाओं की तरफ से भी जवाब आया देश के लिए त्याग करेंगे, लेकिन पहले पेट्रोल 70 रुपए कर दीजिए! कुल मिलाकर भारत में सोने पर बहस भी सोने जैसी चमकदार हो गई है।
अब थोड़ा आंकड़ों की बात भी हो जाए। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक भारत के घरों, विशेषकर महिलाओं के पास करीब 25 हजार टन से ज्यादा सोना माना जाता है। यह दुनिया के कई देशों के कुल स्वर्ण भंडार से भी ज्यादा है। भारत सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास लगभग 880 टन के आसपास गोल्ड रिजर्व है। वहीं अमेरिका दुनिया में सबसे ज्यादा सरकारी सोना रखने वाला देश है, जिसके पास 8 हजार टन से ज्यादा स्वर्ण भंडार है। भारत में कर्नाटक की कोलार गोल्ड फील्ड कभी प्रसिद्ध खदान थी, हालांकि अब वह लगभग बंद हो चुकी है। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में सोने के बड़े भंडार की खबरों ने भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं।
मंदिरों में जमा सोने की बात करें तो कई बड़े मंदिर अपने आप में स्वर्ण साम्राज्य है। केरल का पद्मनाभस्वामी मंदिर, आंध्र प्रदेश का तिरुपति बालाजी मंदिर, महाराष्ट्र का शिरडी साईं मंदिर और अब अयोध्या का राम मंदिर, यहां श्रद्धा भी सोने में चमकती है। कहीं सोने के द्वार हैं, कहीं सोने के मुकुट, कहीं सोने के रथ। भक्त भगवान को सोना चढ़ाते हैं, क्योंकि भारत में आस्था भी अक्सर पीली धातु में ढल जाती है। कुछेक लोभी पुजारी सोना दान को पुण्य का बताकर लोगों को सोना दान के लिए उकसाते हैं।
लेकिन इस पूरे विमर्श में एक दूसरा भारत भी है। वह भारत जो सोना खरीदना तो दूर, आज दाल-तेल के दाम देखकर परेशान है। प्रधानमंत्री ने पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल करने, विदेश पर्यटन घटाने और सोना कम खरीदने की अपील की है। लेकिन सवाल यह है कि जो लोग रोजमर्रा की महंगाई, बेरोजगारी और राशन के संकट से जूझ रहे हैं, वे आखिर क्या कम करें? स्लम में रहने वाला व्यक्ति कौन सा रोज पेट्रोल फूंक रहा है या हर महीने दुबई घूमने जा रहा है? उसके लिए तो गैस सिलेंडर भराना ही किसी गोल्ड लोन से कम नहीं।
सच यही है कि भारत में सोना केवल अमीरी की चीज नहीं, असुरक्षा की भी निशानी है। लोग बैंक से ज्यादा भरोसा सोने पर करते हैं। बेटी की शादी, बीमारी, संकट, हर मुश्किल में वही गहने गिरवी रखे जाते हैं। इसलिए भारतीय परिवार सोना खरीदते नहीं, सुरक्षा जमा करते हैं। शायद इसी कारण कहा गया कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। फर्क बस इतना है कि धतूरा खाने वाला पागल होता है, और सोना रखने वाला समाज में सम्मानित।
अब यह भारतीय राजनीति में एक नई बहस शुरू हो गई है । आरोप प्रत्यारोप। जिनके पास पीने का ठीक से पानी भी नहीं है उनको पेट्रोल कम उपयोग का उपदेश किस काम का है? इसी तरह जिनके पास पहनने के लिए ठीक से कपड़े भी नहीं है, उनको सोना कम खरीदने की सीख मजाक या अपमान की तरह है। लेकिन भारतीय आम आदमी अब इस तरह के अपमान और उपदेश का आदी हो गया है।