–सुभाष मिश्र
किसी भी समाज में चली रही है परंपराएं तभी बदल सकती हैं या उनका दुरूपयोग रोका जा सकता है जब समाज के लोग सतर्क हों। छत्तीसगढ़ के गांव गांव मे शादी ब्याह और मृत्यु के समय होने वाले बहुत से अपव्यय को रोका गया है। हाल ही में इंदौर में श्मशान घाट से मृतकों के कपड़े बाजार तक पहुंचाने वाले गिरोह का खुलासा एक बड़ी अपराधिक घटना है। यह समाज, संस्कृति और धर्म के प्रति भी बड़ा अपराध है। श्मशान में मर्दों के कपड़े इकट्ठे करके धोकर औ प्रेस करके बाजार में बेचे जाते हैं। और यह कोई छोटा-मोटा धंधा नहीं है बल्कि बड़े पैमाने पर संगठित गिरोह का अपराध है। इसके तार मध्य प्रदेश से गुजरात तक जुड़े हैं। जो समाज और सरकार धर्म के प्रति इतना समर्पण रखती है उसकी नाक के नीचे इतना बड़ा संगठित अपराध बहुत अचरज और दुख की बात है। और यह भी संभव नहीं है कि इसकी खबर अफसरों को न हो। प्रशासन की अनदेखी भी संदिग्ध है। यह हमारे समाज के भीतर चल रहे दो समानांतर सचों को सामने लाता है। एक तरफ मृत्यु, आस्था और परंपराओं का बाजारीकरण है, तो दूसरी तरफ समाज के भीतर से उठता सुधार और आत्मसंयम का प्रयास भी दिखाई देता है।
छत्तीसगढ़ सहित देश के कई हिस्सों में वर्षों से यह परंपरा रही है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर रिश्तेदार, परिचित और समाज के लोग शवयात्रा में नए कपड़े, साडिय़ां, शॉल, धोती या अन्य वस्त्र अर्पित करते हैं। यह भावनात्मक सम्मान और श्रद्धांजलि का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन समय के साथ समाज ने यह भी देखा कि इन कपड़ों का एक बड़ा हिस्सा या तो चिता में जल जाता है या फिर श्मशान घाटों से चोरी-छिपे बाजार तक पहुंच जाता है। यानी श्रद्धा औ संस्कार भी एक आपराधिक कारोबार में बदलने लगे हैं।
यहीं से छत्तीसगढ़ के कई समाजों और गांवों में आत्ममंथन शुरू हुआ। लोगों ने महसूस किया कि हजारों रुपए के नए कपड़े जलाने से न तो मृतक को कोई लाभ है और न ही उसके परिवार को। इसके बाद अनेक समाजों ने सामूहिक निर्णय लेने शुरू किए कि शवयात्रा में अनावश्यक कपड़े न डाले जाएं, प्रतीकात्मक रूप से श्रद्धांजलि दी जाए और यदि कोई वस्त्र या आर्थिक सहयोग देना ही है तो वह सीधे पीडि़त परिवार की सहायता में उपयोग हो। यह बदलाव केवल आर्थिक सोच नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का उदाहरण है।
इसी प्रकार विवाह और मृत्यु भोज को लेकर भी छत्तीसगढ़ में एक नई चेतना उभर रही है। विशेष रूप से वे समुदाय, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर माना गया, उन्होंने सबसे पहले यह समझा कि दिखावे की प्रतिस्पर्धा परिवारों को कर्ज और संकट में धकेल रही है। गांवों और समाजों ने मिलकर तय किया कि शादी में सीमित व्यंजन होंगे, फिजूलखर्ची नहीं होगी और मृत्यु भोज जैसी परंपराओं को सीमित या समाप्त किया जाएगा। यह निर्णय किसी कानून के दबाव से नहीं, बल्कि समाज के सारे लोगों ने मिलकर स्वेच्छा से समाज हित में लिए हैं।
भारतीय समाज की एक बड़ी विडंबना यह रही है कि विवाह और मृत्यु, दोनों ही अवसर कई परिवारों के लिए आर्थिक विनाश का कारण बन जाते हैं। एक बेटी की शादी में जीवनभर की कमाई खर्च हो जाती है, जमीन तक बिक जाती है। वहीं मृत्यु के बाद तेरहवीं, दशगात्र और भोज जैसी परंपराओं में भी गरीब परिवार भारी बोझ उठाते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव में लोग अपनी क्षमता से अधिक खर्च करते हैं। ऐसे में यदि समाज स्वयं इन परंपराओं की समीक्षा कर बदलाव ला रहा है, तो यह सकारात्मक संकेत है।
इंदौर की घटना यह भी बताती है कि जहां आस्था और भावनाएं होंगी, वहां कुछ लोग व्यापार और मुनाफे का रास्ता खोज ही लेते हैं। चाहे यह रास्ता अपराध का ही क्यों ना हो! मंदिरों में चढऩे वाले फूल, नारियल, कपड़े, मिठाइयां या अन्य सामग्री दोबारा बाजार में पहुंचने की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। यह केवल धार्मिक या सामाजिक भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं के शोषण का प्रश्न है। एक तरह से सामाजिक और धार्मिक अपराध है। इसलिए जरूरत पुलिस कार्रवाई के साथ ही सामाजिक जागरूकता की भी है।
लेकिन शमशान की क्रियाकलापों और संस्कार के प्रति सबसे अच्छा समर्पण और आस्था छत्तीसगढ़ में दिखाई देती है। छत्तीसगढ़ के गांवों और विभिन्न समाजों में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह भारतीय समाज की जीवंतता का प्रमाण है। यह बदलाव बताता है कि समाज केवल परंपराओं का बोझ ढोने वाला ढांचा नहीं है, बल्कि समय के अनुसार खुद को सुधारने की क्षमता भी रखता है। यदि समुदाय स्वयं निर्णय लेकर फिजूलखर्ची, दिखावा और व्यवसायीकरण को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह सामाजिक सुधार की एक मजबूत दिशा है। आखिरकार, परंपराओं का उद्देश्य इंसान और समाज को जोडऩा होना चाहिए, न कि उन्हें आर्थिक बोझ, दिखावे और कारोबार में बदल देना। श्रद्धा, सम्मान और संस्कार तब ही सार्थक हैं, जब वे संवेदना और विवेक के साथ जुड़े हों।