-सुभाष मिश्र
पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं और अब सबकी नजर नतीजों से पहले आने वाले एग्जिट पोल पर टिक गई है। मतदान खत्म होते ही टीवी चैनलों पर आंकड़ों की बाढ़ आ जाती है और हर एजेंसी अपने-अपने सर्वे के आधार पर यह बताने लगती है कि किस राज्य में किसकी सरकार बन रही है और किसे हार का सामना करना पड़ेगा। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या एग्जिट पोल वाकई जनता के फैसले का आईना होते हैं, या सिर्फ एक अनुमान, जो माहौल तो बनाता है पर कई बार सच से दूर भी निकल जाता है।
इस बार भी सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु को लेकर है, जबकि केरल में सत्ता की परंपरा और असम में बीजेपी की वापसी की संभावनाओं पर पहले से ही अटकलें लगाई जा रही हैं। अब जब आंकड़े सामने आए हैं, तो तस्वीर और दिलचस्प हो गई है।
पश्चिम बंगाल में मैट्रिज तृणमूल कांग्रेस को 122-132 सीटें देता है, जबकि एनडीए को 87-100 और टीएमसी विरोधी अन्य दलों को 0-6 सीटें। पीपुल्स प्लस के अनुसार तृणमूल 125-145 सीटों तक जा सकती है और एनडीए 65-80 के बीच रह सकता है, जबकि टीएमसी से इतर वोट 18-24 सीटों में सिमटते दिख रहे हैं। वहीं कुछ अन्य सर्वे जैसे चाणक्य स्ट्रेटेजी तृणमूल को 130-140 और भाजपा को 150-160 सीटें तक दिखाते हैं, जबकि पूजा पोल भाजपा को 178-208 सीटें देकर बड़ा उलटफेर भी दर्शाता है। यानी बंगाल में आंकड़े ही सबसे बड़ा भ्रम पैदा कर रहे हैं।
तमिलनाडु में भी तस्वीर एकतरफा नहीं है। मैट्रिज भाजपा+ को 85-95 सीटें देता है, जबकि कांग्रेस+ को 25-32 और अन्य को 6-12 सीटें। आजतक-एक्सिस माय इंडिया भाजपा+ को 88-100 और कांग्रेस+ को 24-36 सीटों पर दिखा रहा है। जेवीसी-टाइम्स नाउ भी भाजपा+ को 88-101 और कांग्रेस+ को 23-33 सीटें देता है। दूसरी ओर पीपुल्स प्लस डीएमके+ को 75-85 सीटें और एनडीए को 55-65 सीटें देता है। यानी यहां भी मुकाबला कागज पर अलग-अलग दिशाओं में जाता दिख रहा है।
केरल में मैट्रिज यूडीएफ को 70-75 सीटें देता है, एलडीएफ को 60-65 और भाजपा+ को 3-5 सीटें। पीपुल्स प्लस के मुताबिक यूडीएफ 55-65 और एलडीएफ 75-85 सीटों तक जा सकती है, जबकि भाजपा+ 0-3 सीटों तक सीमित रह सकती है। यानी यहां सत्ता परिवर्तन की संभावना तो है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है।
असम में पीपुल्स प्लस एनडीए को 16-19 सीटें देता है, कांग्रेस+ को 10-12 और अन्य को 1-2 सीटें। यहां आंकड़े अपेक्षाकृत स्थिर दिखते हैं और सत्ता में वापसी के संकेत देते हैं। पुडुचेरी में भी पीपुल्स प्लस एनडीए को 16-19 सीटें, कांग्रेस+ को 10-12 और अन्य को 1-2 सीटें देता है, जिससे स्पष्ट बहुमत तो दिखता है, लेकिन छोटे सदन के कारण यहां हर सीट का महत्व बढ़ जाता है। जैसे ही ये आंकड़े सामने आते हैं, कार्यकर्ताओं में उत्साह या निराशा का दौर शुरू हो जाता है और नेताओं के चेहरे पर भी जीत-हार की झलक दिखने लगती है, जबकि असली फैसला तो मतगणना के दिन ही होता है।
अगर पिछले अनुभवों पर नजर डालें, तो एग्जिट पोल की विश्वसनीयता एक जटिल सवाल बन जाती है। 2021 का चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, खासकर पश्चिम बंगाल में, जहां लगभग सभी एजेंसियां मुकाबले को कांटे का बता रही थीं, कुछ ने तो बीजेपी की सरकार तक बना दी थी। लेकिन जब नतीजे आए, तो ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने 215 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया और सारे अनुमान धरे के धरे रह गए। यह अंतर सिर्फ आंकड़ों की गलती नहीं था, बल्कि उस साइलेंट वोटर का असर था, जो सर्वे में अपनी राय खुलकर नहीं बताता।
वहीं तमिलनाडु में एग्जिट पोल ने दिशा तो सही पकड़ी थी कि एम. के. स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके सत्ता में लौटेगी, लेकिन सीटों के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए। केरल में भी अनुमान सही दिशा में रहे कि पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ दोबारा सत्ता में आएगा, लेकिन सीटों की सटीक संख्या को लेकर एजेंसियां अलग-अलग रहीं। इसके उलट असम और पुडुचेरी में एग्जिट पोल अपेक्षाकृत सटीक साबित हुए और सरकार बनने की तस्वीर काफी हद तक पहले ही साफ हो गई थी।
इन सभी उदाहरणों से एक बात साफ होती है कि एग्जिट पोल अक्सर हवा की दिशा तो बता देते हैं, लेकिन हवा की रफ्तार का सही अंदाजा लगाने में चूक जाते हैं। इस बार के आंकड़े भी यही कहानी कह रहे हैं जहां एक एजेंसी किसी दल को स्पष्ट बहुमत देती है, वहीं दूसरी उसे संघर्ष में दिखाती है। इसके बावजूद एग्जिट पोल का असर कम नहीं होता। ये सिर्फ आंकड़े नहीं होते, बल्कि राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने वाले टूल बन जाते हैं। कार्यकर्ताओं का मनोबल, निवेशकों का भरोसा, यहां तक कि आम जनता की धारणा भी इनसे प्रभावित होती है। कई बार यह माहौल ऐसा बन जाता है कि नतीजे आने से पहले ही जीत और हार की कहानी लिखी जाने लगती है।
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि एग्जिट पोल कोई अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक अनुमान है, जो सीमित सैंपल और मतदाताओं की प्रतिक्रियाओं पर आधारित होता है। इसमें मानवीय व्यवहार, स्थानीय मुद्दे, और साइलेंट वोटर जैसे फैक्टर बड़ी भूमिका निभाते हैं, जिन्हें पूरी तरह माप पाना आसान नहीं होता। अंतत:, लोकतंत्र में असली फैसला मतपेटी से निकलता है, न कि टीवी स्क्रीन से। एग्जिट पोल चाहे जितने भी भरोसेमंद क्यों न लगें, उनका मूल्य सिर्फ एक संकेत भर है, न कि परिणाम। इसलिए किसको वोट, किसको चोट का सही जवाब 4 मई को ही मिलेगा, जब जनता का अंतिम फैसला सामने आएगा और सारे अनुमान या तो सही साबित होंगे या फिर एक बार फिर चौंका देंगे।