55 की उम्र में फिर गूंजेगी आंगन में किलकारी: हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, संतान सुख को माना जीवन का मौलिक अधिकार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक भावुक और कानूनी रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए एक वृद्ध दंपती के लिए दोबारा माता-पिता बनने के द्वार खोल दिए हैं। बिलासपुर की हाईकोर्ट कॉलोनी में रहने वाले इस दंपती ने साल 2022 में अपनी इकलौती बेटी को खो दिया था, जिसके बाद उन्होंने आईवीएफ तकनीक के जरिए फिर से परिवार बसाने का साहस दिखाया। हालांकि उम्र की कानूनी बाधा के कारण डॉक्टरों ने इलाज करने से मना कर दिया था, लेकिन जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने संविधान की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि संतान सुख पाना अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का हिस्सा है। अदालत ने माना कि किसी भी व्यक्ति को केवल तकनीकी नियमों के आधार पर उसकी प्रजनन स्वायत्तता से वंचित नहीं किया जा सकता है।

कानून की दीवार ढही और मानवीय संवेदना की हुई जीत

इस मामले में सबसे बड़ी अड़चन असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) एक्ट 2021 की धारा 21(जी) थी, जिसमें पिता बनने के लिए पुरुष की अधिकतम आयु 55 वर्ष निर्धारित है। याचिकाकर्ता पति फरवरी 2026 में ही 55 की उम्र पार कर चुके थे, जिसके चलते निजी आईवीएफ सेंटर ने प्रक्रिया शुरू करने से हाथ खड़े कर दिए थे। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस कानूनी पेच को सुलझाते हुए कहा कि अधिनियम में उम्र की पात्रता महिला और पुरुष के लिए व्यक्तिगत तौर पर देखी जानी चाहिए न कि सामूहिक रूप से। चूंकि पत्नी की उम्र अभी 50 वर्ष की कानूनी सीमा से कम है और वे चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट हैं, इसलिए पति की आयु मात्र कुछ महीने अधिक होने की वजह से उन्हें मातृत्व के अधिकार से दूर नहीं रखा जा सकता है।

प्रजनन स्वायत्तता पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी

अदालत ने अपने आदेश में जोर देकर कहा कि प्रजनन का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अभिन्न अंग है और राज्य या कानून इसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक कि यह पूरी तरह अनिवार्य न हो। याचिकाकर्ता दंपती ने अपनी संतान को खोने के बाद जिस मानसिक पीड़ा का सामना किया है, उसे देखते हुए कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाया और मेडिकल बोर्ड की फिटनेस रिपोर्ट को आधार मानकर आईवीएफ की अनुमति दी। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है जो ढलती उम्र में संतान खोने का गम झेल रहे हैं और कानूनी पेचीदगियों के कारण दोबारा माता-पिता नहीं बन पा रहे थे। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि संवैधानिक अधिकार किसी भी तकनीकी अधिनियम से ऊपर हैं।

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