-सुभाष मिश्र
बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के प्रभावी दौर के बाद यदि भारतीय जनता पार्टी राज्य में अपने नेतृत्व को आगे बढ़ाते हुए सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपती है, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि राजनीति की दिशा और शैली में बदलाव का संकेत भी माना जाएगा।
पिछले तीन दशकों में बिहार की राजनीति मुख्यतः लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इस पूरे दौर में भाजपा सत्ता की भागीदार तो रही, लेकिन नेतृत्व के केंद्र में नहीं आ सकी। यही कारण है कि बिहार में अपना स्वतंत्र राजनीतिक चेहरा खड़ा करना भाजपा की लंबे समय से प्राथमिकता रही है। सम्राट चौधरी का उभार इसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।
इस संभावित बदलाव को केवल राज्यीय परिप्रेक्ष्य में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के व्यापक संदर्भ में भी समझना होगा। ऐसे समय में जब देश के कई राज्यों में चुनावी माहौल है और विशेषकर पश्चिम बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में राजनीतिक लड़ाई अपने चरम पर है, भाजपा का बिहार में नेतृत्व परिवर्तन का दांव यह संकेत देता है कि पार्टी अब क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत चेहरों के सहारे अपनी पकड़ और गहरी करना चाहती है।
सम्राट चौधरी का चयन सामाजिक समीकरणों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। बिहार में जातीय संरचना राजनीति का मूल आधार रही है। कुशवाहा (कोइरी) समुदाय से आने वाले चौधरी भाजपा को अन्य पिछड़ा वर्ग में एक नया संतुलन प्रदान कर सकते हैं। यह रणनीति सीधे तौर पर यादव-केन्द्रित राजनीति को चुनौती देने और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने का प्रयास है।
इसके साथ ही, उनकी आक्रामक राजनीतिक शैली भाजपा की उस नई रणनीति से मेल खाती है, जिसमें पार्टी सहयोगी राजनीति की सीमाओं से बाहर निकलकर खुद को केंद्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहती है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने पिछले वर्षों में ऐसे कई प्रयोग किए हैं, जहां क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत और स्पष्ट नेतृत्व को आगे बढ़ाया गया—उत्तर प्रदेश इसका प्रमुख उदाहरण रहा है।
हालाँकि, बिहार की राजनीति केवल नेतृत्व और जातीय समीकरणों से नहीं चलती, बल्कि गठबंधन और संतुलन की जटिल संरचना पर आधारित है। ऐसे में सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ सामाजिक संतुलन बनाए रखने की होगी। बिहार में कोई भी राजनीतिक प्रयोग तब तक सफल नहीं माना जाता, जब तक वह विभिन्न वर्गों और समूहों के बीच स्वीकार्यता हासिल न कर ले।
इसी संदर्भ में महिला आरक्षण का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो जाता है। केंद्र सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण कानून को आगे बढ़ाने की कोशिश को केवल एक विधायी पहल के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह स्पष्ट है कि भाजपा महिलाओं को एक निर्णायक मतदाता वर्ग के रूप में देखते हुए उन्हें राजनीतिक रूप से साधने की रणनीति पर काम कर रही है।
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, इस पर सवाल उठाता रहा है कि महिला आरक्षण को परिसीमन और सीटों के पुनर्गठन से जोड़ना राजनीतिक लाभ की रणनीति हो सकती है। ऐसे में यह बहस केवल ‘आरक्षण’ तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि चुनावी गणित और प्रतिनिधित्व के स्वरूप तक फैल जाती है।
यदि इन दोनों घटनाओं—बिहार में नेतृत्व परिवर्तन और महिला आरक्षण की पहल—को एक साथ देखा जाए, तो एक व्यापक राजनीतिक तस्वीर उभरती है। भाजपा एक ओर सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर नए मतदाता वर्गों, विशेषकर महिलाओं, को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रही है।
यह रणनीति केवल आगामी चुनावों तक सीमित नहीं लगती, बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति के लिए जमीन तैयार करने का संकेत देती है।
अंततः, बिहार में यह परिवर्तन एक प्रयोग भी है और एक संदेश भी। प्रयोग इस अर्थ में कि भाजपा पहली बार राज्य में पूर्ण नेतृत्व की भूमिका में खुद को स्थापित करने का प्रयास कर रही है; और संदेश इस रूप में कि भारतीय राजनीति अब पारंपरिक समीकरणों से आगे बढ़कर नए सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ों की ओर बढ़ रही है।
अब देखना यह होगा कि क्या यह प्रयोग बिहार की जटिल सामाजिक संरचना में सफल हो पाता है और क्या यह मॉडल अन्य राज्यों में भी प्रभावी सिद्ध होता है। यदि ऐसा होता है, तो यह केवल बिहार की राजनीति का नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक दिशा का संकेतक बन सकता है।
बिहार में नेतृत्व परिवर्तन: रणनीति, संकेत और राष्ट्रीय राजनीति की दिशा

15
Apr