हवाई सेवाओं का विस्तार: भरोसे, निरंतरता और व्यवहारिकता की कसौटी पर

-सुभाष मिश्र

रायपुर से रीवा के लिए नई हवाई सेवा की शुरुआत एक सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन यह सवाल भी उतनी ही मजबूती से खड़ा करती है कि क्या यह सेवा स्थायी होगी या पहले की तरह कुछ समय बाद बंद हो जाएगी। क्योंकि अनुभव यही रहा है कि रायपुर से इलाहाबाद (प्रयागराज) और बनारस (वाराणसी) जैसी महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक नगरों के लिए शुरू हुई उड़ानें भी स्थगित हो चुकी हैं। ऐसे में नई सेवाओं का विस्तार जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक आवश्यक है उनका निरंतर और भरोसेमंद संचालन।
दरअसल, क्षेत्रीय हवाई सेवाओं के विस्तार का पूरा विमर्श आज दो प्रमुख आधारों पर टिका हुआ है—पर्यटन और व्यावसायिक व्यवहार्यता। एक तरफ धार्मिक पर्यटन का तेजी से विस्तार हुआ है, जिसमें अयोध्या, प्रयागराज और वाराणसी जैसे शहरों में यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर पर्यावरण और वन्यजीव पर्यटन के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ा है, जिसके चलते बस्तर, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और ओंकारेश्वर जैसे क्षेत्रों की संभावनाएं उभरती दिखती हैं। इसके बावजूद इन स्थानों के लिए हवाई सेवाएं या तो अनियमित हैं या फिर पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं।
छत्तीसगढ़ में ही देखें तो रायपुर से जगदलपुर और अंबिकापुर के लिए हवाई सेवाएं शुरू तो हुईं, लेकिन उनकी निरंतरता पर हमेशा सवाल बने रहे। बिलासपुर का उदाहरण भी अलग नहीं है। उड़ानें शुरू होती हैं, कुछ समय चलती हैं और फिर अचानक बंद हो जाती हैं। इससे आम यात्रियों के मन में अविश्वास पैदा होता है, वे टिकट बुक करने से पहले ही सोचने लगते हैं कि कहीं सेवा बीच में बंद न हो जाए।
मध्य प्रदेश ने भी पर्यटन को ध्यान में रखते हुए भोपाल से महेश्वर और ओंकारेश्वर जैसे धार्मिक स्थलों को हवाई सेवा से जोडऩे की योजना बनाई थी, लेकिन वह भी अपेक्षित रूप से जमीन पर नहीं उतर सकी। यह स्थिति केवल छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में क्षेत्रीय हवाई सेवाओं के सामने यही चुनौती है।
असल समस्या यह है कि निजी एयरलाइंस कंपनियां पूरी तरह व्यावसायिक तर्क पर काम करती हैं। यदि किसी रूट पर यात्रियों की संख्या पर्याप्त नहीं होती, तो उनके लिए सेवा जारी रखना घाटे का सौदा बन जाता है। यही कारण है कि कई कंपनियां—जैसे Jet Airways और Air Sahara, समय के साथ आर्थिक संकट में फंसकर बंद हो गईं। वर्तमान में भी कई छोटी एयरलाइंस क्षेत्रीय रूट्स पर इसी दुविधा से जूझ रही हैं।
दूसरी ओर, सरकार की महत्वाकांक्षी योजना उड़ान योजना का उद्देश्य छोटे शहरों को हवाई नेटवर्क से जोडऩा है, लेकिन इसमें भी स्थायित्व की कमी साफ दिखती है। कई रूट्स पर शुरुआत में सब्सिडी के सहारे उड़ानें चलती हैं, पर जैसे ही वह आर्थिक समर्थन कम होता है या यात्री संख्या नहीं बढ़ती, सेवाएं बंद हो जाती हैं।
यही स्थिति रेल सेवाओं में भी कहीं-कहीं देखने को मिल रही है। रायपुर से विशाखापट्टनम के लिए शुरू की गई वंदे भारत एक्सप्रेस को लेकर भी यात्रियों की संख्या और आर्थिक व्यवहार्यता पर सवाल उठे हैं। इसका सीधा संकेत है कि केवल सेवा शुरू कर देना पर्याप्त नहीं है, उसे टिकाऊ बनाना अधिक जरूरी है।
समस्या का एक और पहलू किराए की अनिश्चितता है। जैसे ही कोई सीजन आता है—त्योहार, छुट्टियां या पर्यटन का समय—हवाई किराए अचानक बढ़ जाते हैं, जिससे आम यात्रियों के लिए हवाई यात्रा फिर से दूर की चीज बन जाती है। इससे मांग का संतुलन बिगड़ता है और ऑफ-सीजन में वही रूट घाटे में चला जाता है।
पहला, सरकार को केवल रूट शुरू करने पर नहीं, बल्कि उसकी दीर्घकालिक स्थिरता पर ध्यान देना होगा। सब्सिडी मॉडल को इस तरह डिजाइन करना होगा कि वह धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े, न कि अचानक समाप्त हो जाए।
दूसरा, हवाई सेवाओं को पर्यटन नीति के साथ एकीकृत करना होगा। यदि किसी स्थान के लिए उड़ान शुरू की जाती है, तो वहां पर्यटन, होटल, स्थानीय परिवहन और प्रचार-प्रसार को भी समानांतर रूप से विकसित करना होगा।
तीसरा, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को तार्किक बनाना होगा। उदाहरण के लिए रायपुर से नागपुर या जबलपुर जैसे प्रमुख शहरों के लिए सीधी उड़ानें अधिक व्यवहारिक हो सकती हैं, क्योंकि इनका व्यावसायिक और पर्यटन दोनों महत्व है।
चौथा, किराए को लेकर एक संतुलित और पारदर्शी नीति आवश्यक है, ताकि यात्रियों का भरोसा बना रहे और मांग स्थिर रहे। विदेशों में क्षेत्रीय हवाई सेवाओं की सफलता का कारण केवल बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता और समयबद्धता है। वहां छोटी दूरी की उड़ानें भी नियमित और पूर्वानुमानित होती हैं, जिससे लोग बिना हिचकिचाहट के उन पर निर्भर रहते हैं।
अंतत:, हवाई सेवाओं का विस्तार केवल उड़ानों की संख्या बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि यह भरोसे, निरंतरता और समन्वित विकास का सवाल है। जब तक यात्रियों को यह विश्वास नहीं होगा कि जो सेवा आज शुरू हुई है, वह कल भी उपलब्ध रहेगी, तब तक हवाई नेटवर्क का वास्तविक विस्तार अधूरा ही माना जायेगा।

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