-सुभाष मिश्र
अगले महीने होने जा रहे विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति की उस सच्चाई को सामने ला दिया है, जिसे अब नजऱअंदाज़ करना किसी भी दल के लिए संभव नहीं रहा, महिला मतदाता अब निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं। कभी चुनावी गणित जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता था, लेकिन अब उसमें एक नया और बेहद प्रभावशाली आयाम जुड़ गया है महिलाओं का संगठित वोट बैंक।
तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कडग़म सरकार द्वारा महिलाओं को ‘समर पैकेज के तहत सीधे नकद सहायता देना हो, असम में भारतीय जनता पार्टी द्वारा बिहू पर आर्थिक सहयोग, केरल में वामपंथी सरकार की ‘स्त्री सुखम योजना या पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ‘लक्ष्मी भंडार ये सभी योजनाएं अब सिर्फ कल्याणकारी पहल नहीं रहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बन चुकी हैं। लगभग 4.1 करोड़ महिला लाभार्थियों को सीधे खाते में पैसा पहुंचाना और इसके बदले राजनीतिक समर्थन की उम्मीद करना एक नए तरह की ‘डायरेक्ट पॉलिटिकल कनेक्ट की तस्वीर पेश करता है।
पिछले कुछ चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हो जाती है। मध्य प्रदेश की ‘लाड़ली बहना, कर्नाटक की ‘गृह लक्ष्मी, महाराष्ट्र की ‘लाड़की बहिन और झारखंड की ‘मैया सम्मान जैसी योजनाओं ने न केवल महिलाओं के जीवन में तत्काल राहत दी, बल्कि सत्ता परिवर्तन या सत्ता वापसी में निर्णायक भूमिका भी निभाई। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अब चुनावी जीत का एक बड़ा ‘फॉर्मूला महिलाओं के खातों तक सीधे पहुंचने लगा है।
लेकिन इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह बदलाव वास्तविक सशक्तिकरण की दिशा में है, या फिर महिलाओं को एक नए प्रकार के ‘निर्भर वोट बैंक में बदलने की प्रक्रिया? नकद सहायता निश्चित रूप से तात्कालिक राहत देती है महंगाई, घरेलू खर्च और छोटे-मोटे आर्थिक संकटों से जूझ रही महिलाओं के लिए यह सहारा महत्वपूर्ण है। परंतु क्या इससे उनकी सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक स्थिति में बुनियादी बदलाव आता है?
यथार्थ यह है कि आज भी देश में महिलाओं की स्थिति विरोधाभासी है। एक ओर हम देवी पूजन और महिला सम्मान की बात करते हैं, दूसरी ओर राजनीतिक और प्रशासनिक संरचनाओं में उनकी भागीदारी सीमित है। पंचायत स्तर पर 50फीसदी आरक्षण ने जरूर एक नई राह दिखाई है, लेकिन लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी अपेक्षाकृत कम है। नौकरियों और निर्णय लेने वाले पदों पर भी उनकी उपस्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती।
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि केवल नकद हस्तांतरण से सशक्तिकरण का भ्रम तो पैदा किया जा सकता है, पर वास्तविक समानता नहीं। यदि महिला को हर महीने 1000 या 2000 रुपए मिल भी जाएं, लेकिन उसके पास गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुरक्षित वातावरण, रोजगार के अवसर और निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं है, तो यह सहायता सीमित प्रभाव ही डाल पाएगी।
राजनीतिक दलों के लिए भी यह एक आसान रास्ता बनता जा रहा है, लंबी अवधि के कठिन सुधारों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सृजन) की बजाय तात्कालिक नकद लाभ देकर वोट हासिल करना। इससे राजकोष पर भी भारी दबाव पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि देश के 15 से अधिक राज्य अब महिलाओं को नकद सहायता दे रहे हैं, जिन पर सालाना लगभग 2.46 लाख करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। यह खर्च यदि समानांतर रूप से उत्पादक निवेश में नहीं बदला गया, तो आने वाले समय में अर्थव्यवस्था पर इसका असर दिखना तय है।
फिर भी इस बदलाव को पूरी तरह नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। सकारात्मक पक्ष यह है कि महिलाओं को अब राजनीतिक रूप से गंभीरता से लिया जा रहा है। उनकी प्राथमिकताएं, उनकी जरूरतें और उनकी भागीदारी अब चुनावी एजेंडे के केंद्र में आ गई हैं। यह एक सामाजिक बदलाव का संकेत है, जहां महिला अब ‘मूक दर्शकÓ नहीं, बल्कि ‘निर्णायक मतदाताÓ बन चुकी है।
लेकिन अगला और अधिक महत्वपूर्ण चरण यह होना चाहिए कि महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भागीदार बनाया जाए। उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने, कौशल विकास, उद्यमिता, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ठोस निवेश की जरूरत है। साथ ही, राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए लंबित महिला आरक्षण को शीघ्र लागू करना भी उतना ही आवश्यक है।
अंतत:, यह सवाल राजनीति के साथ-साथ समाज के सामने भी खड़ा है, क्या हम महिलाओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखते रहेंगे, या उन्हें देश के विकास की बराबर की साझेदार बनाएंगे? नकद सहायता एक शुरुआत हो सकती है, लेकिन मंजिल नहीं। जब तक महिला आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से पूर्ण रूप से सशक्त नहीं होगी, तब तक यह आधी आबादी अपने पूरे सामर्थ्य के साथ देश के विकास में योगदान नहीं दे पाएगी। और तब तक कोई भी चुनावी ‘फॉर्मूला अधूरा ही रहेगा।