-सुभाष मिश्र
1 फरवरी 2026 को पेश होने वाला बजट सिर्फ सरकार का सालाना हिसाब-किताब नहीं है, बल्कि यह उस आम जनता की उम्मीदों का आईना है जो लगातार महंगाई, बेरोजग़ारी और अनिश्चित भविष्य के दबाव में जी रही है। बजट से ठीक पहले आए आर्थिक सर्वे ने सरकार के पक्ष में 7.4 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ, नियंत्रित महंगाई और राजकोषीय अनुशासन की तस्वीर ज़रूर पेश की है, लेकिन ज़मीन पर हालात इससे कहीं ज़्यादा जटिल हैं। आज सवाल यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था कितनी तेज़ बढ़ रही है, बल्कि यह है कि उस विकास का लाभ आखिऱ किसे मिल रहा है।
सरकार का दावा है कि भारत वैश्विक अस्थिरता के दौर में भी ‘ब्राइट स्पॉटÓ बना हुआ है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और मुख्य आर्थिक सलाहकार बार-बार कहते हैं कि टैरिफ वॉर, वैश्विक मंदी और भू-राजनीतिक तनावों का असर भारत पहले ही अपने अनुमानों में शामिल कर चुका है। यह भरोसा कागज़़ पर तो मजबूत लगता है, लेकिन आम आदमी की थाली, जेब और नौकरी की सुरक्षा में वह आत्मविश्वास अभी दिखाई नहीं देता।
आर्थिक सर्वे ने एक तरफ इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और दीर्घकालिक विकास की बात की है, तो दूसरी तरफ रोजगार सृजन और ग्रामीण मांग को लेकर कोई ठोस तस्वीर नहीं रखी। मनरेगा में राज्यों की बढ़ती हिस्सेदारी और केंद्र की कटौती ने यह साफ कर दिया है कि सामाजिक सुरक्षा का बोझ धीरे-धीरे राज्यों पर डाला जा रहा है। संघीय ढांचे में यह असंतुलन आने वाले समय में राजनीतिक तनाव भी पैदा कर सकता है।
बजट से पहले सोना-चांदी के दामों में आई बड़ी गिरावट सिर्फ सर्राफा बाजार की खबर नहीं है, यह उस अनिश्चितता का संकेत है जो आम निवेशक और मध्यम वर्ग महसूस कर रहा है। जब लोग सुरक्षित निवेश से भी पीछे हटते हैं, तो समझा जा सकता है कि भरोसे की ज़मीन कितनी कमजोर है। ऐसे समय में सरकार से उम्मीद होती है कि वह टैक्स राहत, बचत को बढ़ावा और खर्च करने की ताक़त लौटाने वाले फैसले ले।
मध्यम वर्ग की निगाहें इस बार भी इनकम टैक्स स्लैब और होम लोन पर टिकी हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह वर्ग सबसे ज़्यादा टैक्स देता है और सबसे कम राहत पाता है। महंगाई बढ़ती रही, शिक्षा और स्वास्थ्य महंगे होते गए, लेकिन टैक्स ढांचे में राहत सीमित रही। अगर इस बजट में भी मध्यम वर्ग को सिर्फ आश्वासन मिले और ठोस राहत नहीं, तो यह राजनीतिक रूप से भी सरकार के लिए महंगा पड़ सकता है। महिलाओं के लिए उज्ज्वला जैसी योजनाओं के विस्तार और महिला उद्यमियों को सस्ते ऋण की बातें हर बजट में दोहराई जाती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनकी पहुंच और प्रभाव सीमित ही रहा है। कामकाजी महिलाओं के लिए टैक्स में विशेष छूट की मांग अब सामाजिक नहीं, राजनीतिक सवाल बन चुकी है।
युवा वर्ग के सामने सबसे बड़ा संकट रोजगार का है। स्टार्टअप के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन सरकारी नौकरियों की रिक्तियां और निजी क्षेत्र में अनिश्चितता ने युवाओं की बेचैनी बढ़ाई है। स्किल डेवलपमेंट और एजुकेशन लोन सस्ते करने की बातें तब तक अधूरी हैं, जब तक उन्हें स्थायी नौकरी और सम्मानजनक आय से नहीं जोड़ा जाता। किसानों के लिए पीएम-किसान सम्मान निधि की राशि 6,000 से बढ़ाकर 12,000 रुपये करने की मांग सिर्फ आर्थिक नहीं, राजनीतिक भी है। सरकार खुद बता चुकी है कि 11 करोड़ किसानों को 4.09 लाख करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह राशि बढ़ती लागत और गिरती आय के मुकाबले पर्याप्त है। एमएसपी को कानूनी दर्जा देने की मांग को हर बार टालना अब किसानों के बीच गहरे असंतोष का कारण बन रहा है।
शेयर बाजार के आंकड़े बताते हैं कि बजट के बाद अक्सर तेजी आती है। सेंसेक्स और निफ्टी के पिछले 15 साल के आंकड़े निवेशकों को भरोसा देते हैं, लेकिन बाजार की यह खुशी तब तक खोखली है जब तक गांव, कस्बे और शहरों में मांग नहीं बढ़ती। बाजार का उत्साह अगर जनता की जेब से नहीं जुड़ा, तो वह टिकाऊ नहीं होता।
मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में ‘मोदी की गारंटीÓ के नाम पर कई राज्यों में बड़े-बड़े वादे किए गए हैं। इन वादों के लिए पैसा कहां से आएगा, यह सवाल हर बार टाल दिया जाता है। काला धन वापसी को लेकर जो उम्मीदें जगाई गई थीं, वे आज भी अधूरी हैं। खर्च बढ़ रहा है, संसाधन सीमित हैं और दबाव अंतत: करदाताओं और राज्यों पर ही पड़ता दिख रहा है।
भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहा है, लेकिन 2026 का बजट उसी सपने की असली परीक्षा है। यह देखा जाना बाकी है कि यह बजट सिर्फ आंकड़ों, ग्रोथ और बाजार को साधने का दस्तावेज़ बनेगा या फिर महंगाई से जूझती जनता, कजऱ् में दबे किसान, नौकरी की तलाश में भटकते युवा और संसाधनों के लिए जूझते राज्यों की आवाज़ भी इसमें सुनी जाएगी।