क्या अभनपुर से कांग्रेस को मिलेगा नया जीवन?

-सुभाष मिश्र

भारतीय राजनीति में संगठन ही किसी दल की सबसे बड़ी ताकत होता है। विचारधारा, नेतृत्व और जनसमर्थन तभी स्थायी बनते हैं, जब उन्हें एक अनुशासित और सक्रिय संगठन का आधार मिले। यही कारण है कि चुनावी राजनीति में सफलता केवल लोकप्रिय नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ताओं और मजबूत संगठनात्मक संरचना से तय होती है।
छत्तीसगढ़ के अभनपुर में आयोजित कांग्रेस का 10 दिवसीय जिला अध्यक्ष प्रशिक्षण शिविर इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी, संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल, प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत और अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि पार्टी अब केवल सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि अपने संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश कर रही है।
दरअसल, कांग्रेस आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें उसकी सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा नहीं है। उससे बड़ी चुनौती स्वयं कांग्रेस का संगठन, उसका अनुशासन और उसकी आंतरिक एकजुटता है। एक समय देश के अधिकांश राज्यों पर शासन करने वाली कांग्रेस आज सीमित राज्यों तक सिमट चुकी है। दूसरी ओर भाजपा ने पिछले तीन दशकों में अपने संगठन को लगातार मजबूत किया है। नियमित प्रशिक्षण वर्ग, वैचारिक कार्यशालाएं, बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं के सतत संवाद ने भाजपा को एक अनुशासित राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दीर्घकालिक कार्यप्रणाली ने भी इस संगठनात्मक संस्कृति को मजबूती दी है।
ऐसे में यह स्वाभाविक है कि कांग्रेस भी संगठनात्मक प्रशिक्षण को प्राथमिकता दे रही है। अभनपुर शिविर में इतिहास, संविधान, कांग्रेस की विचारधारा, राजनीतिक चुनौतियों और भविष्य के आंदोलनों की रणनीति पर चर्चा हो रही है। जिला अध्यक्षों को संगठन की रीढ़ मानते हुए उन्हें नेतृत्व और अनुशासन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह प्रयास स्वागतयोग्य है, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक दल की मजबूती उसके कार्यकर्ताओं की क्षमता और संगठनात्मक संस्कृति पर निर्भर करती है।
लेकिन सवाल केवल प्रशिक्षण का नहीं, उसके प्रभाव का है। कांग्रेस इससे पहले भी पचमढ़ी चिंतन शिविर, उदयपुर नवसंकल्प शिविर और अनेक संगठनात्मक बैठकों का आयोजन कर चुकी है। हर बार संगठन को मजबूत करने और नई ऊर्जा भरने का संकल्प लिया गया, लेकिन अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए। कारण केवल रणनीति की कमी नहीं थी, बल्कि नेतृत्व संघर्ष, गुटबाजी और सार्वजनिक असहमति भी रही।
छत्तीसगढ़ इसका ताजा उदाहरण है। वर्ष 2018 में कांग्रेस ने भारी बहुमत से सरकार बनाई, लेकिन पांच वर्षों के भीतर सत्ता से बाहर हो गई। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसके पीछे सत्ता विरोधी लहर के साथ-साथ आंतरिक मतभेद, नेतृत्व विवाद और संगठनात्मक कमजोरी को भी महत्वपूर्ण कारण माना। यदि किसी राजनीतिक दल के नेता सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे पर सवाल उठाने लगें, तो उसका सीधा प्रभाव कार्यकर्ताओं और मतदाताओं पर पड़ता है।
यहीं पर अभनपुर प्रशिक्षण शिविर की असली परीक्षा है। यदि यह केवल भाषणों और तस्वीरों तक सीमित रह गया तो इसका असर भी पहले के शिविरों जैसा ही होगा। लेकिन यदि यहां से निकले संदेश बूथ स्तर तक पहुंचते हैं, जिला अध्यक्षों को वास्तविक अधिकार मिलते हैं, अनुशासन व्यवहार में दिखाई देता है और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर संगठन को रखा जाता है, तो यह कांग्रेस के पुनर्निर्माण की शुरुआत साबित हो सकता है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष उतना ही आवश्यक है जितनी मजबूत सरकार। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा तभी संभव है जब विपक्ष भी संगठित, वैचारिक और जनसरोकारों से जुड़ा हो। इसलिए कांग्रेस का संगठनात्मक पुनर्गठन केवल पार्टी का आंतरिक विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है।
अभनपुर का प्रशिक्षण शिविर कांग्रेस के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी। अवसर इसलिए कि वह अपनी पुरानी कमजोरियों से सीखकर नए संगठन की नींव रख सकती है। परीक्षा इसलिए कि अब कार्यकर्ताओं और जनता दोनों को भाषण नहीं, व्यवहार में बदलाव चाहिए। राजनीतिक इतिहास बताता है कि चुनाव घोषणाओं से नहीं, संगठन की ताकत से जीते जाते हैं। यदि कांग्रेस इस मूल मंत्र को आत्मसात कर पाती है, तो अभनपुर का यह शिविर भविष्य में उसकी वापसी की कहानी का पहला अध्याय बन सकता है। यदि नहीं, तो यह भी कांग्रेस के अनेक चिंतन और प्रशिक्षण शिविरों की सूची में दर्ज होकर इतिहास का हिस्सा भर बन जाएगा।

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