कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के तमाम दावों के बीच अब खुद शिक्षक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। शिक्षक समूहों में चल रही चर्चा केवल कुछ कर्मचारियों की नाराजगी नहीं, बल्कि उन समस्याओं का आईना है जो वर्षों से प्रदेश, विशेषकर आदिवासी और ग्रामीण अंचलों के विद्यालयों को कमजोर करती रही हैं। शिक्षकों का कहना है कि जब तक विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होंगे, तब तक शिक्षा सुधार के दावे केवल कागजों तक सीमित रहेंगे।
शिक्षकों का सबसे बड़ा सवाल विद्यालयों में पदों की भारी कमी को लेकर है। कई विद्यालयों में एक या दो शिक्षक ही माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक दोनों स्तरों की कक्षाएं संभालने को मजबूर हैं। ऐसे में एक शिक्षक कई विषय पढ़ाने, परीक्षा कार्य करने और विभागीय जिम्मेदारियां निभाने के बोझ तले दब जाता है। शिक्षकों का तर्क है कि माध्यमिक विद्यालयों में कम से कम चार शिक्षक, उच्च विद्यालयों में प्रधानाचार्य सहित छह व्याख्याता तथा उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में प्रधानाचार्य सहित सत्रह व्याख्याताओं की व्यवस्था की जाए। जब तक नियमित नियुक्तियां नहीं होतीं, तब तक संविदा के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति कर तत्काल राहत दी जाए।
चर्चा में विद्यालयों के समय निर्धारण को लेकर भी असंतोष खुलकर सामने आया है। शिक्षकों का कहना है कि जिन विद्यालयों में एक ही शिक्षक दोनों स्तरों की पढ़ाई संभाल रहा है, वहां एक ही पाली में कक्षाएं संचालित करने की व्यवस्था होनी चाहिए। उनका मानना है कि पहले पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं, उसके बाद समय-सारणी में बदलाव किया जाए। बिना संसाधनों के केवल आदेश जारी करने से न तो शिक्षकों को राहत मिलेगी और न ही विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।
शनिवार को पूरे दिन विद्यालय संचालित करने के आदेश पर भी शिक्षकों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि बैंक, शासकीय कार्यालय और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए शनिवार ही व्यवहारिक रूप से उपलब्ध रहता है। ऐसे में पूरे दिन विद्यालय में रहने से निजी और पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कठिन हो जाता है। यह केवल सुविधा का नहीं, बल्कि सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों और संतुलित जीवन का भी प्रश्न है।
शिक्षक संगठनों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई शिक्षकों का आरोप है कि संगठन केवल औपचारिक कार्यक्रमों और स्वागत-सम्मान तक सीमित होकर रह गए हैं, जबकि वास्तविक समस्याओं को लेकर अपेक्षित संघर्ष दिखाई नहीं देता। वहीं कुछ शिक्षक संगठन के पदाधिकारी इस चर्चा को एकजुटता बढ़ाने और विभाग तक सामूहिक आवाज पहुंचाने की कोशिश बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि शिक्षक स्वयं अपनी समस्याओं पर मुखर नहीं होंगे तो समाधान की उम्मीद भी कमजोर पड़ जाएगी।
यह पूरा घटनाक्रम केवल शिक्षकों की नाराजगी भर नहीं है, बल्कि स्कूल शिक्षा व्यवस्था की उन खामियों को सामने लाता है जिनका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है। वर्षों से लंबित नियुक्तियां, पदों का असंतुलन, गैर-शैक्षणिक कार्यों का अतिरिक्त बोझ और संसाधनों की कमी ने शिक्षकों पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में शिक्षक और विद्यार्थी को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय मूल समस्या पर ध्यान देना अधिक जरूरी है।
यदि शिक्षा विभाग समय रहते विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति, कार्यभार का संतुलित बंटवारा और कार्य परिस्थितियों में सुधार जैसे कदम उठाता है तो इसका सीधा लाभ विद्यार्थियों को मिलेगा। लेकिन यदि इन आवाजों को अनसुना किया गया तो बढ़ता असंतोष आने वाले समय में बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। आखिर किसी भी शिक्षा व्यवस्था की मजबूती भवनों से नहीं, बल्कि उस शिक्षक से तय होती है जो कक्षा में खड़ा होकर भविष्य गढ़ता है।