जनधारा न्यूज़ चारामा)
संवाददाता -अनूप वर्मा ।
रबी फसलों की कटाई का सीजन पूरा होते ही ग्रामीण अंचलों में खेतों में बची हुई नरवाई और पराली (पैरा) को जलाने की घटनाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं। इस नुकसानदेह परंपरा पर अंकुश लगाने के लिए शासन-प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा चारामा ब्लॉक सहित पूरे कांकेर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में एक व्यापक और सघन जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। कृषि विभाग के अधिकारी और कर्मचारी लगातार गांवों का दौरा कर किसानों को खेतों में आग न लगाने की समझाइश दे रहे हैं और उन्हें आधुनिक व वैज्ञानिक तौर-तरीके अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।आग लगाने से बंजर हो रही है धरती माता की कोख
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, जब किसान भाई अपने खेतों में बची हुई नरवाई या पराली को आग के हवाले करते हैं, तो वे केवल कचरा नहीं जलाते, बल्कि अपनी ही जमीन की उपजाऊ शक्ति को हमेशा के लिए स्वाहा कर देते हैं। पराली जलाने से:
वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी जहरीली गैसें घुलती हैं, जिससे भारी वायु प्रदूषण होता है और ग्रामीणों में सांस व अस्थमा की बीमारियां बढ़ती हैं।
मिट्टी के भीतर मौजूद अत्यंत आवश्यक पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जलकर पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
जमीन को उपजाऊ और पोला बनाने वाले किसानों के सच्चे मित्र केंचुए और लाभदायक सूक्ष्मजीव (बैक्टीरिया) इस भीषण गर्मी और आग में दम तोड़ देते हैं, जिसके कारण आने वाले समय में भूमि पूरी तरह बंजर होने लगती है।
कृषि विभाग ने सुझाए दो बेहतरीन और मुनाफे वाले वैज्ञानिक विकल्प
इस गंभीर संकट से निपटने और किसानों को नुकसान से बचाने के लिए प्रशासन द्वारा खेतों में ही पराली का सही प्रबंधन करने के दो बेहद प्रभावी और किफायती तरीके बताए जा रहे हैं:
मात्र ₹20 की ‘वेस्ट डीकंपोजर’ शीशी से जैविक खाद: राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र (NCOF) द्वारा तैयार किया गया यह फॉर्मूला बेहद चमत्कारी है। इसके तहत किसानों को मात्र 20 से 25 रुपये की लागत वाली एक शीशी वेस्ट डीकंपोजर को 200 लीटर पानी और 2 किलो गुड़ के साथ मिलाकर एक ड्रम में घोल तैयार करना होता है। इस तैयार घोल का खेत में बिखरी पराली पर छिड़काव करने से मात्र 15 से 25 दिनों के भीतर सारा कचरा और कड़क नरवाई पूरी तरह गलकर सर्वोत्तम ‘काली जैविक खाद’ में बदल जाती है। इससे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है।
स्ट्रॉ बेलर मशीन से ‘कचरे से कंचन’ की ओर: कृषि विभाग आधुनिक तकनीकों को भी बढ़ावा दे रहा है। इस आधुनिक मशीन की मदद से खेत में बिखरी पराली को इकट्ठा कर उसके ठोस बंडल (गांठें) बना दिए जाते हैं। इन बंडलों को किसान भाई आसानी से गत्ता उद्योगों, पेपर मिलों, बायोमास पावर प्लांटों और स्थानीय गौशालाओं में बेचकर अतिरिक्त नगद आय कमा सकते हैं। सबसे खास बात यह है कि शासन द्वारा इन आधुनिक कृषि यंत्रों की खरीद पर किसानों और समूहों को आकर्षक सब्सिडी (अनुदान) भी प्रदान की जा रही है।
विवेक दिखाएं, शॉर्टकट छोड़ें
कृषि विभाग ने क्षेत्र के तमाम किसान भाइयों से पुरजोर अपील की है कि वे खेतों में आग लगाने की शॉर्टकट, खतरनाक और नुकसानदेह पद्धति को पूरी तरह छोड़ें। किसान अपनी सूझबूझ और विवेक का परिचय दें; पराली को जलाएं नहीं, बल्कि उसे खाद बनाकर अपनी जमीन की उर्वरा शक्ति को ‘जगाएं’। इन वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाकर न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी, बल्कि खेती की लागत घटेगी और क्षेत्र के किसान एक खुशहाल व समृद्ध भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकेंगे।
रिपोर्टर: अनुप वर्मा