क्या सच में बदल जाएगा 23 साल पुराना कानून? सुप्रीम कोर्ट के एक बयान से खलबली

सुप्रीम कोर्ट ने देश में पंचायत और अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की अनिवार्यता वाले नियम पर बहुत गंभीर सवाल उठाए हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत का मानना है कि बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए सालों पहले बनाई गई यह नीति अब अपनी उपयोगिता खो चुकी है। अदालत ने कहा कि भारत में बच्चों के जन्म लेने की औसत दर यानी फर्टिलिटी रेट लगातार कम हो रही है। ऐसे में इस पुराने नियम को जारी रखने के पीछे के तर्कों की समीक्षा की जानी चाहिए। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की विशेष पीठ ने इस मामले में महाराष्ट्र की एक महिला सरपंच को तीसरा बच्चा होने पर अयोग्य ठहराए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की है। अदालत ने इस कानूनी मुद्दे पर मदद के लिए वकील रुक्मिणी बोबडे को न्याय मित्र नियुक्त किया है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद से बड़े बदलाव की संभावनाओं को लेकर देश भर में नई बहस छिड़ गई है।

अदालत की पीठ ने इस दौरान वर्ष 2003 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक पुराने फैसले का भी विशेष रूप से जिक्र किया। उस समय जावेद बनाम हरियाणा राज्य के ऐतिहासिक मामले में अदालत ने दो बच्चों के नियम को कानूनी रूप से सही माना था। लेकिन अब वर्तमान पीठ ने कहा कि उस पुराने फैसले पर फिर से विचार करने की बहुत सख्त जरूरत है क्योंकि देश अब पूरी तरह बदल चुका है। पिछले 23 वर्षों में भारत की जनसंख्या के आंकड़ों और इसकी बनावट में बहुत भारी बदलाव आया है। आज के समय में देश का कुल फर्टिलिटी रेट गिरकर लगभग 1.7 के स्तर पर पहुंच चुका है। केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में तो बच्चों के जन्म की दर कई यूरोपीय देशों से भी काफी कम दर्ज की जा रही है।

जब कई राज्य गिरती जन्म दर से परेशान हैं तो पुराने नियमों को ढोने का क्या मतलब

सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में आबादी को जबरदस्ती कम करने के लिए ऐसे पुराने नियमों को जारी रखना पूरी तरह से अनुचित हो सकता है। जजों ने तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि जब देश के कई बड़े राज्य पहले से ही गिरती जन्म दर की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं, तो आबादी रोकने के लिए बनाई गई किसी पुरानी नीति को जबरन थोपने का कोई तार्किक मतलब नहीं रह जाता है।

अदालत ने यह भी व्यावहारिक बात सामने रखी कि आज के समय में अधिकांश परिवारों में तीन बच्चे होना बहुत ही सामान्य बात है। जजों ने कहा कि पिछली पीढ़ियों की तुलना में आज के दौर में तीन बच्चे होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। इस पुरानी नीति का असली मकसद अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि चुनाव में विरोधी उम्मीदवार इस नियम का इस्तेमाल आपसी रंजिश निकालने और दूसरे को अयोग्य कराने के लिए एक राजनीतिक हथियार की तरह करते हैं।

महाराष्ट्र की पूर्व महिला सरपंच की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दिखाई सख्ती

यह पूरा मामला तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट की पीठ महाराष्ट्र की एक पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर विस्तार से सुनवाई कर रही थी। उन्होंने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत कानून के उस विशेष सेक्शन को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी थी जिसके तहत दो से ज्यादा बच्चे होने पर किसी भी व्यक्ति को पंचायत सदस्य या सरपंच का चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता है।

मंगला भीमराव इंगले बुलढाणा जिले की काकोडा ग्राम पंचायत से भारी बहुमत से सरपंच चुनी गई थीं। हालांकि उनके कार्यकाल के दौरान उनके विरोधी उम्मीदवार ने तीसरा बच्चा होने का आरोप लगाते हुए जिला कलेक्टर के सामने एक शिकायत दर्ज करा दी थी। इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए अक्टूबर 2024 में कलेक्टर ने उन्हें पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। इसके बाद कमिश्नर और फिर अगस्त 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अधिकारियों के फैसले को सही माना था। हाई कोर्ट का कहना था कि अधिकारियों ने जिस जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर फैसला लिया वह एक सरकारी दस्तावेज था और महिला इसे गलत साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहीं। अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे कानून की नए सिरे से समीक्षा करने जा रहा है।

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