-सुभाष मिश्र
विकास की हर बड़ी परियोजना अपने साथ एक कठिन प्रश्न लेकर आती है—क्या विकास लोगों को साथ लेकर होगा या लोगों को हटाकर? सड़कें बनेंगी, उद्योग लगेंगे, नए शहर बसेंगे, सरकारी संस्थान खड़े होंगे तो कहीं न कहीं भूमि अधिग्रहण और विस्थापन होगा। यह दुनिया के हर देश में हुआ है और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि विकास की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि बुलडोजर कितनी तेजी से चला, बल्कि इस बात से तय होती है कि विस्थापित व्यक्ति के सम्मान, सुरक्षा और भविष्य का कितना ध्यान रखा गया।
नर्मदा घाटी परियोजना से लेकर हरसूद, टिहरी, पोलावरम और अनेक बड़ी परियोजनाओं तक, जहां-जहां पुनर्वास की प्रक्रिया कमजोर रही, वहां-वहां आंदोलन खड़े हुए। दूसरी ओर, जहां लोगों को पर्याप्त समय, मुआवजा, संवाद और सम्मान मिला, वहां विरोध अपेक्षाकृत कम हुआ। उत्तर प्रदेश के जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का उदाहरण अक्सर इसलिए दिया जाता है कि वहां भूमि अधिग्रहण के साथ संवाद और आर्थिक पैकेज पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
छत्तीसगढ़ में भी यह पहली बार नहीं है कि लोगों को हटाया गया हो। राजधानी रायपुर में पहले भी झुग्गी बस्तियों का पुनर्वास हुआ है। अलग-अलग सरकारों ने अतिक्रमण हटाए हैं। लेकिन नकटी गांव का मामला इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि यहां विवाद अतिक्रमण का कम और कार्रवाई के तरीके का अधिक बन गया है।
यदि प्रशासन का दावा सही भी मान लिया जाए कि भूमि सरकारी थी, अतिक्रमण था और उसे खाली कराना आवश्यक था, तब भी प्रश्न यह है कि क्या यह कार्रवाई इसी समय, इसी तरीके और इसी जल्दबाजी में होना अनिवार्य थी? बरसात की शुरुआत, बच्चों के नए शिक्षा सत्र का समय और परिवारों को अचानक चौथी मंजिल के फ्लैटों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया, इन सबने प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए।
सबसे बड़ी कमी संवाद की दिखाई देती है। बताया गया कि वर्षों से बातचीत चल रही थी। यदि ऐसा था तो अंतिम चरण में इतनी हड़बड़ी क्यों हुई? यदि लोगों को हटाना अपरिहार्य था तो ग्रामसभा, सार्वजनिक बैठकें, लिखित आश्वासन, चरणबद्ध पुनर्वास और पर्याप्त तैयारी के बाद यह काम क्यों नहीं किया गया? शासन यदि पहले लोगों का विश्वास जीतता, बेहतर विकल्प देता और सम्मानपूर्वक पुनर्वास करता तो शायद आज यही कार्रवाई विकास के मॉडल के रूप में प्रस्तुत होती। दुर्भाग्य से आज वही कार्रवाई सरकार की छवि पर प्रश्न बन गई है।
यही कारण है कि मामला केवल प्रशासनिक नहीं रहा, राजनीतिक भी बन गया है। सत्ता पक्ष के सांसद और विधायक भी असहज दिखाई दिए। कुछ जनप्रतिनिधियों ने सार्वजनिक रूप से विस्थापितों के पक्ष में आवाज उठाई, तो विपक्ष को सरकार को घेरने का अवसर मिल गया। जिस विधायक कॉलोनी के निर्माण को विकास परियोजना के रूप में देखा जाना था, वही अब राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गई है।
यह भी याद रखना होगा कि बुलडोजर स्वयं कोई निर्णय नहीं लेता। वह केवल आदेश का पालन करता है। इसलिए बहस बुलडोजर पर नहीं, निर्णय प्रक्रिया पर होनी चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की पहचान उसकी शक्ति से नहीं, उसकी संवेदनशीलता से होती है। कानून का पालन आवश्यक है, लेकिन कानून का मानवीय क्रियान्वयन उससे भी अधिक आवश्यक है।
रायपुर में पहले भी हाउसिंग बोर्ड की परियोजनाओं के लिए मकान खाली कराए गए। कई स्थानों पर वर्षों बीत गए, लेकिन प्रस्तावित निर्माण समय पर शुरू नहीं हुआ। ऐसे अनुभव जनता के मन में यह प्रश्न पैदा करते हैं कि क्या वास्तव में तत्काल इतनी जल्दी थी कि लोगों को मानसून के बीच घरों से बेदखल करना जरूरी हो गया? यदि परियोजना के शेष कार्य अभी भी प्रारंभिक अवस्था में हैं तो फिर यह जल्दबाजी किसलिए थी?
नकटी प्रकरण का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है, सरकार की छवि। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अपने कार्यकाल में सुशासन, जनसंवाद और संवेदनशील प्रशासन की बात लगातार कही है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी सरकार ने आत्मसमर्पण करने वालों के लिए स्पष्ट पुनर्वास नीति बनाई। हजारों लोगों ने सरकार पर भरोसा किया क्योंकि उन्हें विश्वास दिलाया गया कि हथियार छोडऩे के बाद उनका भविष्य सुरक्षित होगा। यदि बंदूक छोडऩे वाला व्यक्ति सरकार पर भरोसा कर सकता है, तो अपने घर में रहने वाला सामान्य नागरिक क्यों नहीं कर सकता? फर्क केवल इतना है कि उसके साथ भी सम्मान और विश्वास का व्यवहार होना चाहिए।
आज आवश्यकता दोषारोपण से अधिक आत्ममंथन की है। यदि प्रशासनिक स्तर पर निर्णय में चूक हुई है तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। यदि समय का चयन गलत था तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। यदि पुनर्वास की प्रक्रिया में कमियां थीं तो उन्हें सुधारा जाना चाहिए। केवल प्रेस विज्ञप्तियों और सफाइयों से जनविश्वास वापस नहीं आता।
साथ ही, इस पूरे मामले में एक व्यापक प्रश्न भी उठता है। नया रायपुर वर्षों से विकसित हो रहा है। वहां आज भी बड़ी मात्रा में भूमि और अधोसंरचना उपलब्ध है। ऐसे में क्या परियोजनाओं की प्राथमिकताएं पूरी तरह स्पष्ट थीं? क्या सभी विकल्पों का परीक्षण किया गया? क्या स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों को पर्याप्त विश्वास में लिया गया? इन प्रश्नों के उत्तर सरकार को देने होंगे, क्योंकि विकास केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, सामाजिक अनुबंध भी होता है।
नकटी की घटना सरकार के लिए चेतावनी है। विकास का विरोध कोई नहीं करता, लेकिन विकास यदि संवेदनहीन दिखाई देने लगे तो वही विकास राजनीतिक और सामाजिक संकट में बदल जाता है। सरकार के सामने अभी भी अवसर है कि वह पुनर्वास की व्यवस्था को और बेहतर बनाए, प्रभावित परिवारों की समस्याओं का समाधान करे, निर्णय प्रक्रिया की समीक्षा करे और भविष्य के लिए ऐसी स्पष्ट नीति बनाए जिसमें किसी भी नागरिक को यह महसूस न हो कि विकास की कीमत केवल उसी को चुकानी पड़ रही है।
लोकतंत्र में विकास की असली पहचान ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि वह विश्वास है जिसके साथ लोग अपने भविष्य को सरकार के हाथों सौंपते हैं। नकटी की घटना बताती है कि विकास की दौड़ में सबसे पहले यदि किसी चीज़ को बचाना है, तो वह है जनविश्वास। क्योंकि विकास बिना विश्वास के खड़ा तो हो सकता है, टिक नहीं सकता।