उत्तराखंड की पावन हिमालयी चोटियों पर जय बद्रीविशाल के जयघोष के साथ आज बद्रीनाथ धाम के कपाट विधि-विधान से खोल दिए गए हैं। अक्षय तृतीया पर गंगोत्री-यमुनोत्री और बीते कल केदारनाथ के द्वार खुलने के बाद अब बद्रीनाथ के कपाट खुलते ही वर्ष 2026 की चारधाम यात्रा पूरी तरह से शुरू हो गई है। इस अलौकिक अवसर के लिए संपूर्ण मंदिर परिसर को 25 क्विंटल देशी-विदेशी फूलों से दुल्हन की तरह सजाया गया जिसकी भव्यता देखते ही बन रही है। अब आगामी छह महीनों तक देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु भगवान विष्णु के इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कर पुण्य लाभ कमा सकेंगे।
मोक्ष का द्वार और आदि शंकराचार्य की विरासत: क्यों खास है यह साधना स्थली
शास्त्रों में वर्णित धरती के साक्षात वैकुंठ बद्रीनाथ धाम का महत्व अद्वितीय है क्योंकि माना जाता है कि यहां के दर्शन मात्र से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु की तपस्या के दौरान उन्हें सुरक्षा देने के लिए बेर यानी बदरी के वृक्ष का रूप धारण किया था जिसके कारण इस स्थान का नाम बद्रीनाथ पड़ा। अलकनंदा नदी के तट पर स्थित यह धाम 108 दिव्य वैष्णव तीर्थों में से एक है जिसे आदि शंकराचार्य ने पुनर्जीवित कर सनातन धर्म की आस्था का केंद्र बनाया था। हिमालय की गोद में स्थित इस तीर्थ के बारे में स्पष्ट कहा गया है कि तीनों लोकों में बद्रीनाथ जैसा कल्याणकारी स्थान न कोई था और न ही कभी होगा।
