(मधुकर दुबे)
रायपुर। जैसे-जैसे चुनावी साल नजदीक आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन अपनी सरकार के कामकाज की समीक्षा में जुट गई हैं। इसमें साय सरकार के मौजूद मंत्रियों के विभागीय लंबित मामलों और उनकी बन रही छवि को लेकर फीड बैक भी जुटाए जा रहे हैं, क्योंकि इसके पीछे वजह है की जब भाजपा की सरकार बनी थी तो क्षेत्रीय और जातीय स्मीकरण को देखते हुए नए चेहरों पर संगठन ने बड़ा दांव खेला था। लेकिन कहीं न कहीं ये नेता जो पहली बार विधायक बने और फिर मंत्री, लेकिन प्रशासिनक अनुभव नहीं होना से कई प्रकार की विसंगितयां पैदा हो गईं। इसका एक साल पूरा होते-होते एक बड़ा साइड इफेक्ट जनता के बीच देखने को मिला कि, इनके विभागीय कामकाज को अधिकारी ही अपने हिसाब से चला रहे हैं।
मंत्रियों द्वारा अनुशंसित कामों को भी नियमानुसार नहीं होना का मंत्र देकर अधिकांश मामले पेंडिंग करने का खेल चला। इसी का नतीजा रहा कि, सुशासन तिहार में जनता के काम नहीं होने को लेकर जनप्रतिनिधि और अधिकारी सार्वजनिक मंचों पर आमने-सामने हैं। ऐसा नहीं है कि ये कोई नई बात है, सुशासन तिहार के पूर्व ही अधिकारियों की स्वछंदता और मनमानी से मंत्री तो मंत्री, सत्ता पक्ष के विधायक और पार्टी के कार्यकर्ता और पदाधिकारी नाखुश हैं। ये बड़ी अजीब विडंबना है कि, सत्ता पक्ष के जनप्रितिनिधियों की बात भी अधिकारी गंभीरता से नहीं लेते। उदाहरण के तौर पर विधानसभा सत्र के दौरान ऐसे कई मौके आते हैं जब सत्ता पक्ष के ही विधायक ही अपनी सरकार की कार्यप्रणालियों को सवालों के घेरे में लेते हैं और तीखी बहस भी होती है। कहने कहा आशय है कि, उपजे ऐसे हालात के मद्देनजर भाजपा संगठन यह भांप चुका है कि राज्य सरकार में मुख्यमंत्री साय को छोड़कर कैबिनेट में बड़े बदलाव करने की जरूरत है।
सूत्रों का कहना है कि सुशासन तिहार और पूर्व के जनसमस्याओं के निराकरण की रिपोर्ट की समीक्षा के बाद संगठन राज्य सरकार के स्वरूप में बड़े बदलाव की हरी झंडी देगा। इस काम की मानरिटिंग भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और आरएसएस के वरिष्ठजनों को जिम्मेदारी दी गई है। काम की समीक्षा के लिए संगठन के प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों और भाजपा जिलाध्यक्षों के साथ स्थानीय कार्यकर्ताओं को दी गई है। ताकि माहौल का पता लगे, इसमें कई चरण की समीक्षा अलग-अलग समूह करेंगे। इनसे मिले इनपुट के आधार पर ही बदलाव की जरूरत पर विचार किया जाएगा।
बता दें, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन नबीन इस बार किसी भी राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बेहद गंभीर हैं। इसलिए यहां छत्तीसगढ़ में भाजपा के वरिष्ठ नेता पवन साय को संगठन की मजबूती और सरकार के कामकाज पर नजर रखने की जिम्मेदारी पहले से ही दे दी है। लेकिन इसके अलावा महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा से किसी बड़े नेता को इस बार प्रदेश प्रभारी बनाए जाने की चर्चा संगठन में चल रही है। साथ ही आगामी विधानसभा चुनाव के पूर्व साय सरकार के कामकाज को आम लोगों में चर्चा का बहस बनाने की भी रणनीति है। इसके लिए साफ संकेत हैं, किसी काम के लिए लापरवाह व जिम्मेदार अधिकारी को बख्शा न जाए। इन्हीं परफेक्शन को बनाने को इस नजिरए से देख सकते हैं कि कर्मचारी संघ ने कहा कि किसी मंत्री या विधायक के समर्थक ऐसा कोई विडियो न बनाए जिसमें उन्हें डांट पड़ रही हो, आरोप है कि कुछ जनप्रितिनिधि अपनी छवि चमकाने के लिए के डांट फटकार के विडियो वायरल करवा रहे हैं। बहरहाल, मौजूदा समय में अब अपनी छवि चमकाने की छटपटाहट दिख रही है।
बदलाव को लेकर ये सुलगते सवाल भी, सियासी चर्चाओं का दौर शुरू
जब भी राजनीतिक गलियारों में मंत्रिमंडल की फेर बदल की बात होती है या मंत्रियों के प्रभार में इस पर उनको हटाए जाने की बात होती है तो फिर वही सवाल घूम फिर कर ही आता है कि अनुसूचित जाति वर्ग से कितने मंत्री हैं । अनुसूचित जनजाति से कितने विधायक हैं क्या पिछड़े वर्ग से कितने मंत्री हैं और उसमें से किसको ड्रॉप किया जा सकता है, जो मंत्री हैं और किसको रखा जा सकता है। एक महिला मंत्री हैं उनके परफॉर्मेंस को लेकर भी बहुत-बहुत होती है। दूसरे ओबीसी वर्ग के मंत्री हैं उनको लेकर भी बात हो रही है। मंत्री ज्ञान से जुड़े हुए हैं उनका ज्ञान पूरे प्रदेश के ज्ञान के भंडार को भरना चाह रहे हैं। बात हम फिर के यह होती की क्या मंत्रिमंडल से कद्दावर लोगों को हटा पाएंगे। क्योंकि दो-दो मुख्यमंत्री हैं एक वित्त मंत्री हैं तो कहने को लोग कहते हैं कि सत्ता के चार केंद्र हैं तो क्या वह हटेंगे या फिर वही जो कमजोर खिलाड़ी माने जाते हैं, उनको हटाया जाएगा।
इस तरह की बातचीत भी राजनीतिक गलियों में हो रही है तो धुआंधार बैटिंग कौन कर रहा है और जनता किसके बारे में क्या बोल रही है। यह भी लोग चर्चा कर रहे हैं क्योंकि संगठन के पास सारी सूचनाओं होती है तो संगठन अब किस तरह से निर्णय लेगा क्योंकि जातिगत समीकरण को भी साधना जरूरी है। क्षेत्र को भी साधना जरूरी है और सत्ता और संगठन में समीकरण बन रहे यह भी जरूरी है। बदलाव की जरूरत पर विचार होता है तो संगठन या सत्ता के सामने भी तो यह दिक्कतें होंगी ना कि अगर तीन ही मंत्री अनुसूचित जाति के विधायक हैं। तो वह तीन कौन लोग हैं और उसमें से एक को बनाए हो तो दूसरे को कैसे बना दोगे। महिला में एक तो बनाया तो दूसरे को बनाओगे पिछड़े वर्ग से जो हैं, टंकराम वर्मा और दूसरा बंदा है तो आपके पास में जो 52 पत्ते हैं। उसमें फिट होने के लिए कार्ड कितने हैं।