सिमटती दुकानें घर पहुंचता बाजार

-सुभाष मिश्र

एक फर्म जब घर में सस्ती दवाई उपलब्ध करा रहे हो तब दवाई दुकान में जाकर कौन महंगी दवाई खरीदेगा। इस समय देश की 12 लाख दवा दुकानों पर बंद होने का खतरा मंडरा रहा है। यही वजह है कि ई फार्मेसी के खतरे को भांपते हुए देशभर में 20 मई को दवा दुकान से जुड़े संगठन ऑल इंडिया मेडिकल एंड ड्रजिस्ट एसोसिएशन द्वारा बंद का आव्हान किया है।
ऐसा पहली बार नहीं है कि बहुत सारी छोटी-छोटी दुकानें बंद हो रही हैं। इसके पहले किराना दुकान भी बड़ी संख्या में बंद हुई है। भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां बाजार अब सिर्फ चौक-चौराहों, गलियों और मंडियों तक सीमित नहीं रह गया है। वह धीरे-धीरे हमारी जेब में आ चुका है। मोबाइल स्क्रीन पर सिमट चुका है। कभी लोग कहा करते थे —’बाजार से गुजऱा हूं, खरीदार नहीं हूंÓ। लेकिन अब हालत यह है कि बाजार को आपके खरीदार बनकर निकलने की भी जरूरत नहीं रही। बाजार खुद आपके घर पहुंच रहा है। आपके ड्राइंग रूम तक, आपके बेडरूम तक, यहां तक कि आपकी उंगलियों के इशारों तक।
एक समय था जब खरीदारी एक सामाजिक गतिविधि हुआ करती थी। लोग बाजार जाते थे, दुकानदार से मोलभाव होता था, पहचान बनती थी, रिश्ते बनते थे। मोहल्ले का किराना वाला परिवार की जरूरत जानता था। मेडिकल स्टोर वाला बिना पर्ची के भी रात में दवा दे देता था। सब्जी वाला घर की पसंद पहचानता था। लेकिन अब इन रिश्तों की जगह ऐप ने ले ली है। स्क्रीन पर ऑफर चमकते हैं और इंसानी संवाद धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है।
आज आपको रेलवे रिजर्वेशन के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ता। फ्लाइट टिकट के लिए ट्रैवल एजेंट के चक्कर नहीं काटने पड़ते। बिजली बिल जमा करने बैंक नहीं जाना पड़ता। होटल बुकिंग से लेकर टैक्सी बुलाने तक सब कुछ घर बैठे हो रहा है। यह बदलाव सुविधा का नया युग लेकर आया है। समय बचा है, मेहनत कम हुई है, जीवन तेज हुआ है। लेकिन हर सुविधा अपने साथ कुछ अनदेखे संकट भी लेकर आती है।
अब खाने के लिए रेस्टोरेंट जाने की जरूरत नहीं, Swiggy और Zomato घर पहुंचा रहे हैं। राशन के लिए किराना दुकान जाने की जरूरत नहीं, Blinkit और Zepto दस मिनट में सामान ला रहे हैं। दवाइयों के लिए मेडिकल स्टोर तक जाने की जरूरत नहीं, ई-फार्मेसी कंपनियां भारी छूट के साथ घर पर दवाएं भेज रही हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि उन लाखों छोटे दुकानदारों का क्या होगा जिनकी जिंदगी इसी फुटकर व्यापार पर टिकी हुई है?
देश में करीब 12 लाख से ज्यादा मेडिकल स्टोर हैं और अब वे खुद को संकट में महसूस कर रहे हैं। किराना दुकानें पहले से दबाव में हैं। छोटे सब्जी विक्रेता, मिठाई दुकानें, डेयरी स्टोर और मोहल्ले की जनरल दुकानें धीरे-धीरे ग्राहकों से खाली होती जा रही हैं। शहरों में भीड़ अब बाजारों में नहीं, बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर्स और डिस्काउंट मॉल्स में दिखाई देती है। बाकी ग्राहक मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त है।
दरअसल यह केवल व्यापार का बदलाव नहीं, बल्कि सुविधा बनाम रोजगार, टेक्नोलॉजी बनाम पारंपरिक व्यापार और ‘कॉरपोरेट बनाम फुटकर व्यापारी की नई लड़ाई है। ग्राहक को सुविधा चाहिए, समय की बचत चाहिए और सस्ता सामान चाहिए। दूसरी ओर छोटे दुकानदार के पास न बड़ी पूंजी है, न भारी डिस्काउंट देने की क्षमता और न ही विशाल डिजिटल नेटवर्क। बड़ी कंपनियां डेटा, टेक्नोलॉजी, वेयरहाउस और निवेशकों के पैसे के दम पर बाजार पर कब्जा मजबूत कर रही हैं, जबकि मोहल्ले की छोटी दुकानें धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा से बाहर होती जा रही हैं।
यही कारण है कि अब दवा दुकानों से लेकर किराना व्यापारियों तक की मांग केवल व्यापार बचाने की नहीं, बल्कि बाजार में समान अवसर और संतुलन बनाए रखने की भी है। छोटे व्यापारी चाहते हैं कि ई-कॉमर्स और ई-फार्मेसी पर कुछ नियमन हो, भारी डिस्काउंट की सीमा तय हो और ऐसे नियम बनें जिनसे पारंपरिक व्यापार पूरी तरह खत्म न हो जाए। क्योंकि यदि पूरा बाजार कुछ बड़ी कंपनियों के हाथ में सिमट गया तो आने वाले समय में स्थानीय रोजगार, छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था और बाजार की विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
यह केवल व्यापार का परिवर्तन नहीं है, यह समाज की जीवनशैली का परिवर्तन है। सुविधा ने संबंधों को पीछे धकेल दिया है। डिजिटल अर्थव्यवस्था ने इंसान को उपभोक्ता में बदल दिया है। पहले दुकानदार ग्राहक को पहचानता था, अब एल्गोरिदम ग्राहक की आदत पहचानता है। पहले उधार विश्वास पर मिलता था, अब ऑफर डेटा के आधार पर मिलते हैं।
निस्संदेह, तकनीक को रोका नहीं जा सकता। बदलाव प्रकृति का नियम है। जैसे मॉल आने से पुराने बाजार बदले, वैसे ही ई-कॉमर्स और क्विक डिलीवरी ने रिटेल बाजार का स्वरूप बदल दिया है। लेकिन चिंता तब बढ़ती है जब पूरा बाजार कुछ बड़ी कंपनियों के हाथ में सिमटने लगे। क्योंकि जब छोटी दुकानें खत्म होती हैं तो सिर्फ व्यापार नहीं मरता, स्थानीय रोजगार भी कमजोर पड़ता है, सामाजिक संबंध भी टूटते हैं और बाजार का लोकतंत्र भी सीमित होता जाता है।
आज सबसे ज्यादा प्रभावित वह मध्यवर्ग है जो सुविधा और बचत के बीच संतुलन खोज रहा है। उसे घर बैठे सामान चाहिए, सस्ता चाहिए, जल्दी चाहिए। और कंपनियां यही दे रही हैं। लेकिन इसी दौड़ में वह अनजाने में उस छोटे दुकानदार को पीछे छोड़ रहा है जिसने दशकों तक उसके घर की जरूरतें पूरी की थीं।
यह दौर केवल तकनीकी क्रांति का नहीं, सामाजिक पुनर्गठन का दौर है। आने वाले समय में वही छोटे व्यापारी बच पाएंगे जो खुद को डिजिटल ढांचे में ढालेंगे। व्हाट्सऐप ऑर्डर, होम डिलीवरी, ऑनलाइन भुगतान और स्थानीय नेटवर्क अब उनकी मजबूरी बनेंगे। क्योंकि बाजार अब सड़क पर कम और स्क्रीन पर ज्यादा दिखाई देगा।
और शायद आने वाले वर्षों में यह शायरी भी नए अर्थ ले ले —
‘बाजार से गुजऱा हूं, खरीदार नहीं हूं
क्योंकि अब बाजार से गुजरना जरूरी नहीं रहा,
बाजार खुद आपके दरवाजे पर खड़ा है।

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