बस्तर के ‘लालों’ को सलाम

*विशेष लेख**बस्तर के ‘लालों’ को सलाम**डर से विश्वास तक की नई सुबह*31 मार्च 2026 का सूर्यास्त और 1 अप्रैल 2026 का सूर्योदय छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर अंचल के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बनकर दर्ज हो चुका है। यह केवल तारीखों का बदलाव नहीं, बल्कि दशकों से भय, हिंसा और अस्थिरता में जी रहे लाखों लोगों के जीवन में आशा और विश्वास की

वापसी का प्रतीक है।बस्तर-कांकेर, नारायणपुर, कोंडागांव, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जैसे जिलों से मिलकर बना यह क्षेत्र, लंबे समय तक वामपंथी उग्रवाद की चपेट में रहा। यहां की फिजाओं में बारूद की गंध घुल चुकी थी। चिड़ियों की चहचहाहट को गोलियों की आवाज ने दबा दिया था। गांवों में विकास की रफ्तार पगडंडियों तक सिमट गई थी और हर घर में भय का साया था।इन वर्षों में बस्तर के लोगों ने जो सहा, वह केवल आंकड़ों में नहीं समाया जा सकता। अनाथ होते बच्चे, विधवा होती महिलाएं और अपनों को खोने का असहनीय दर्द यह सब इस क्षेत्र की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गया। स्कूलों में सन्नाटा था, सड़कों पर सन्नाटा था और दिलों में भी एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।फिर भी, इस अंधकार के बीच उम्मीद की एक लौ हमेशा जलती रही। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के साथ लोगों ने विकास, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का सपना देखा था। यह सपना भले ही वर्षों तक अधूरा रहा, लेकिन बुझा नहीं।13 दिसम्बर 2023 को जब जशपुर जिले के ग्राम बगिया के श्री विष्णु देव साय ने मुख्यमंत्री के तौर पर राज्य की कमान संभाली, तो बस्तर के लिए एक नई दिशा तय होती दिखाई दी। आदिवासी समाज से आने वाले नेतृत्व ने इस क्षेत्र की पीड़ा को न केवल समझा, बल्कि उसे राष्ट्रीय स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया। संवाद, विश्वास और समर्पण की नीति के साथ सुरक्षा और विकास के संतुलन ने धीरे-धीरे हालात बदलने शुरू किए। लगातार प्रयासों, जमीनी संवाद और सख्त कार्रवाई के संयोजन ने बस्तर में वह माहौल तैयार किया, जहां लोग फिर से लोकतंत्र पर भरोसा करने लगे, जो क्षेत्र कभी बंदूक और बारूद के साये में जी रहा था, वहां अब विकास की संभावनाएं आकार लेने लगी हैं।आज बस्तर एक नए मोड़ पर खड़ा है। यह वह क्षण है, जब अतीत की पीड़ा को याद रखते हुए भविष्य की ओर कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। अब समय है कि मांदर की थाप फिर से गूंजे, महुआ की खुशबू फिर से महके, बच्चों की हंसी फिर से गांवों में सुनाई दे और शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार हर घर तक पहुंचे।बस्तर, भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर का अनमोल हिस्सा है। यहां के जंगल, नदियां, पहाड़ और सबसे बढ़कर यहां के लोग ये सब मिलकर एक ऐसी पहचान बनाते हैं, जिसे संरक्षित और समृद्ध करना हम सबकी जिम्मेदारी है।1 नवम्बर 2000 छत्तीसगढ़वासियों के लिए एक सुखद तिथि के तौर पर इतिहास में दर्ज हो चुका है, उसी तरह 26 बरस के युवा छत्तीसगढ़ राज्य के लिए, बस्तर के लिए 1 अप्रैल 2026 केवल एक नई तारीख नहीं, बल्कि एक नए युग की शुरुआत के लिए दर्ज हो गया । यह उस विश्वास का प्रतीक है कि बस्तर अब भय की छाया से निकलकर विकास, शांति और समृद्धि की राह पर आगे बढ़ेगा।बस्तर के ‘लाल’- वहां के बेटे-बेटियां, युवा जो इस बदलाव के असली नायक हैं, उन्हें सलाम! यही लोग बस्तर की असली ताकत हैं और यही इसके उज्ज्वल भविष्य की नींव भी। अब समय है कि पूरा देश बस्तर के साथ खड़ा हो, ताकि बारूद की गंध की जगह पलाश की खुशबू फैले और बंदूक की आवाज की जगह चिड़ियों की चहचहाहट।*(लेखक: विजय मानिकपुरी, कोरिया)*

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