-वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल पारे
वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल पारे ‘आज की जनधारा’ में हर शनिवार एक विशेष कॉलम ‘राजपाट’ लेकर आ रहे है जिसमें आप छत्तीसगढ़ के साथ देश विदेश के कुछ चर्चित मुद्दों पर मजेदार अंदाज में उनके द्वारा लिखे गए विचारों को पढ़ेंगे।
आरक्षण या अखाड़ा
महिला आरक्षण का मुद्दा इन दिनों अधिकार से ज्यादा सियासत का अखाड़ा बन गया है। हर दल महिलाओं को बराबरी देने की बात करता है, लेकिन जब अमल की बारी आती है तो बहस जनगणना, परिसीमन और प्रक्रियाओं में उलझ जाती है। अब लोकसभा में बिल अटकने के बाद इसे लेकर राज्यों तक राजनीति गरमा गई है। सवाल यह है कि महिला आरक्षण सचमुच अधिकार का सवाल है या चुनावी हथियार बन चुका है।
सरकार कहती है नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही आरक्षण लागू होगा, जबकि विपक्ष मौजूदा सीटों पर ही इसे लागू करने की मांग कर रहा है। यहीं से टकराव शुरू होता है। एक पक्ष इसे संवैधानिक प्रक्रिया बता रहा है, दूसरा इसे टालमटोल। लेकिन असली चिंता यह है कि इस खींचतान में महिलाओं का हक फिर इंतजार में न बदल जाए।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि महिला आरक्षण पर जितनी लड़ाई संसद में नहीं, उससे ज्यादा उसकी सियासी ब्रांडिंग पर हो रही है। कोई इसे महिला सम्मान बता रहा है, कोई राजनीतिक स्टंट। सवाल यही है आरक्षण लागू करने की गंभीरता ज्यादा है या एक-दूसरे को महिला विरोधी साबित करने की होड़? अगर हर बार नया अड़ंगा ही खड़ा होना है तो आधी आबादी का हक कहीं अखाड़े की धूल में न दब जाए।
गालीबाज आईएफएस आखिर हो गए बहाल
अपने वरिष्ठ अधिकारी को गाली देना एक आईएफएस अधिकारी को इतना भारी पड़ गया कि उन्हें दो माह का निलंबन झेलना पड़ा और आखिरकार माफ़ी मांग कर ही वे बहाल हो पाए। मामला प्रदेश के वन विभाग का है जहां सचिव स्तर के एक वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी ने अपने जूनियर अधिकारी से एक आवश्यक विभागीय बैठक का इंतजाम करने को कहा। बातचीत के दौरान इस जूनियर अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारी के लिए उसी शब्द इस्तेमाल कर दिया जो असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वसरमा ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के लिए इस्तेमाल किया था। बताते हैं बात इतनी बिगड़ गई कि विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को हस्तक्षेप करना पड़ा फिर मामले की जांच पड़ताल की जिम्मेदारी भी एक ऐसे आईएएस अधिकारी को दी गई जिस पर पहले ही अपने अधीनस्थ महिला कर्मचारी को छेडऩे के आरोप लगे हुए हैं। बहरहाल इस आईएएस अधिकारी ने रिपोर्ट बनाई और विभाग को दी और जूनियर अधिकारी ने भी माफ़ी मांग ली और मामला ख़त्म हो गया। बताते हैं कि अब ये वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी जांच रिपोर्ट देने वाले आईएएस अधिकारी से नाराज चल रहे हैं। इनका कहना है कि उनके जूनियर ने तो उन्हें फोन पर गाली दी लेकिन इस अधिकारी ने रिपोर्ट में उसे लिखकर पूरे महकमे को बता दिया। वैसे बात सही भी है कि रिपोर्ट में गाली गलौज का उल्लेख शब्दश: नहीं करना चाहिए।
एक लाख की गर्लफ्रेंड
प्रदेश में एक आईजी स्तर के आईपीएस अधिकारी जो इन दिनों निलंबित चल रहे हैं। इन पर एक पुलिस कर्मचारी की पत्नी ने ही आरोप लगाया था कि ये अधिकारी उनका मानसिक और शारीरिक शोषण कर रहे थे। सरकार ने इस शिकायत को गंभीरता से लिया और उन्हें निलंबित कर दिया। अब इस निलंबित अधिकारी के शुभचिंतक उन्हें बचाने के लिए इस महिला के पुरुष मित्रों की तलाश में जुट गए हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह महिला एक-एक लाख रुपये का ट्रैक सूट पहनती है आखिर यह उसे कौन देता है। जरूर इस महिला का कोई और पुरुष मित्र भी है जो उसे महंगे सामान उपलब्ध कराता है। खैर ये तो बहुत पुराना और घिसा पिटा दांव है कि आरोप लगाने वाले को ही संदिग्ध बना दो तो मामला कमजोर हो जाता है। लेकिन जिस शिद्दत से इस महिला के पुरुष मित्र की तलाश की जा रही है उससे लगता है कि इस प्रकरण में जल्द कुछ नया मोड़ देखने को मिल सकता है।
बिजली बिल का झटका, GAD चटका
छत्तीसगढ़ में इन दिनों सरकार के फैसलों पर एक नई कहावत फिट बैठती दिख रही है-पहले फैसला, फिर विरोध, उसके बाद समीक्षा। इसकी शुरुआत हाफ बिजली बिल योजना में बदलाव से हुई, जब 400 यूनिट तक मिलने वाली 50 फीसदी छूट घटाकर 100 यूनिट कर दी गई। लाखों उपभोक्ताओं को लगा कि राहत छिन गई और विपक्ष ने इसे जनता के साथ वादाखिलाफी करार दिया। बढ़ते दबाव के बीच अब 100 से 200 यूनिट तक राहत बढ़ाने की चर्चा फिर शुरू हो गई है। यानी पहले झटका, फिर नरमी का संकेत।
इसके बाद सरकारी कर्मचारियों के लिए जारी सख्त सर्कुलर ने नया बवाल खड़ा कर दिया। राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियों से दूरी वाले इस आदेश को कर्मचारियों ने अधिकारों पर हमला बताया, ट्रेड यूनियनों ने विरोध किया, क्रस्स् तक आपत्ति में आ गया और सरकार को आखिरकार सर्कुलर होल्ड पर रखना पड़ा। यानी यहां भी पहले आदेश, फिर विरोध और आखिर में बैकफुट। मुखिया की सीधाई का कुछ लोग गलत फायदा उठाते हैं, फिर मुखिया को भूल सुधार करवानी पड़ती है ये कोई अच्छे शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली नहीं है।
अब दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो तस्वीर दिलचस्प है। पहले हाफ बिजली बिल में कटौती, फिर राहत बढ़ाने के संकेत; पहले कर्मचारियों पर सख्ती, फिर आदेश पर रोक। मानो सरकार फैसले लागू करने के बाद जनता और संगठनों की प्रतिक्रिया से उनका ‘रिव्यू’ कर रही हो। सवाल यह है कि यह नीतिगत लचीलापन है या दबाव की राजनीति? फिलहाल छत्तीसगढ़ में हाफ बिल और हाफ सर्कुलर, दोनों ने यही संदेश दिया है कि विरोध की आंच तेज हो तो फैसले भी ठंडे पड़ सकते हैं।
विशेष सत्र: मजबूरी या मजबूती
छत्तीसगढ़ में 30 अप्रैल को बुलाया गया विशेष सत्र अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। सवाल है कि यह सरकार की मजबूती दिखाने की कोशिश है या किसी दबाव में उठाया गया कदम? महिला आरक्षण मुद्दे पर विपक्ष के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने की तैयारी है, लेकिन जिस विषय पर फैसला लोकसभा में अटका, उस पर विधानसभा में प्रस्ताव लाकर क्या हासिल होगा, यही बड़ा सवाल है। क्या यह केंद्र की लाइन को राज्य में दोहराने की कवायद है या सिर्फ राजनीतिक संदेश?
नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने संवैधानिक सवाल उठाकर सरकार की रणनीति पर ही प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अगर एक सदन की कार्यवाही पर दूसरे सदन में निंदा प्रस्ताव लाना बहस का मुद्दा बना, तो विपक्ष को घेरने की कोशिश सरकार पर ही भारी पड़ सकती है। यानी जो सत्र विपक्ष को एक्सपोज करने के लिए बुलाया गया, वहीं सरकार खुद कटघरे में आ सकती है।
सवाल यही है यह विशेष सत्र मजबूती का प्रदर्शन है या मजबूरी का संकेत? और विपक्ष को घेरने की कोशिश में कहीं सरकार खुद तो नहीं घिर जाएगी। 30 अप्रैल का सत्र इसका जवाब देगा।
सायकस का जादू
मनोरंजन के साथ सेहत भी बनी रहे और मिलना-जुलना नैन मट्टका भी चलती रहे तो महंगे जिम से अच्छी जगह इन दोनों दूसरी नहीं हो सकती। रायपुर करेंसी टावर में बनी सायकस जिम का जादू इन दिनों बहुतों के सिर चढ़कर बोल रहा है, कोई जांच एजेंसी का अफसर किसी मेनका को युवा व्यापारी से हथिया रहा है तो कहीं सीनियर अधिकारी जुंबा डांस के बहाने धुरंधर की रिदम पर डांस कर रहा है, तो कहीं सीनियर महिला अधिकारी और कांग्रेसी नेता लिफ्ट में फंसकर जान जोखिम में डालकर सेहत के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। बहुत सारे नए पुराने किस्से कहानियों से भरे हैं रायपुर के महंगे जिम। सेहत के साथ मनोरंजन किसे अच्छा नहीं लगता।