राजपाट : प्रफुल्ल पारे

भुवन ना होते तो दारु भट्टी ना खुलती
आपको आशुतोष गोवारीकर की मशहूर फिल्म लगान का नायक भुवन (आमिर खान) तो याद ही होगा। वही भुवन जिसने अपने गांव चम्पानेर को तीन गुना लगान से बचाने के लिए अंग्रेजों से क्रिकेट मैच खेला था। आखिर में भुवन जीता और चम्पानेर गांव का लगान माफ़ हुआ। अब हम आपको छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ के पास स्थित एक गांव चारभाठा के भुवन से मिलाते हैं। भुवन साहू गांव का सियान है और वह इस बात से परेशान रहता था कि उसके गांव में सरकार ने एक भी दारु की भट्टी नहीं खोली। गांव में शराब के शौक़ीन लोगों को दारु पीने के लिए खतरों से खेलकर कई किलोमीटर दूर दूसरे गांव जाना पड़ता है। शराब के नशे में वापस आते समय दुर्घटनाएं होती हैं और गांव के लोग घायल हो जाते हैं। चारभाठा के भुवन ने ठान लिया कि वह अपने गांव में दारु भट्टी खुला कर ही दम लेगा। उसने अपने गांव की एक महिला नेता पर गांव में दारु भट्टी खोलने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। कई महीनों की मेहनत और तगड़े फॉलोअप के बाद आखिरकार चारभाठा में दारु की भट्टी खुल गई। दारु भट्टी का शुभारम्भ गांव की पंचायत से जुड़ी महिला नेता ने फीता काटकर किया। इस मौके पर उन्होंने गांव वालों को समझाया कि सरकार एक साथ बहुत सारी दारु भट्टी नहीं खोल सकती, इसलिए योजनाबद्ध तरीके से और भी गांव में भट्टी खोली जाएंगी। इस महिला नेता ने भुवन साहू को इस दारु भट्टी खोले जाने का पूरा श्रेय दिया और कहा कि हमारे सियान भुवन साहू ने मेहनत ना की होती तो यह भट्टी नहीं खुलती जबकि भुवन खुद शराब नहीं पीते हैं।। पूरे गांव ने भुवन के सम्मान में तालियां बजाई। महिला नेता ने यह भी हिदायत दी कि यह अपने गांव की भट्टी है, इसलिए सम्हलकर पीना है क्योंकि दारु सेहत के लिए अच्छी नहीं होती। है ना कमाल की बात कि चंपानेर के भुवन ने अंग्रेजों से क्रिकेट मैच जीतकर गांव का लगान माफ करवाया और हमारे चारभाठा के भुवन ने भी सरकारी व्यवस्था से लड़कर अंग्रेजी शराब की दुकान खुलवा दी।

राम जी की लीला है न्यारी
प्रदेश की खेती बाड़ी इन दिनों राम भरोसे चल रही है और राम जी की न्यारी लीला लोगों के पल्ले ही नहीं पड़ रही। हम यहां बात कर रहे हैं उनके विभाग की जो प्रदेश के लाखों किसानों को खाद, बीज और रासायनिक उर्वरक प्रदान करने के साथ उनका मार्गदर्शन भी करता है। हर साल करोड़ों रुपए की खरीदी करने वाले इस विभाग में एक सिंगल विंडो सिस्टम काम करता है। पता नहीं यह कितना सच है, लेकिन लोग बताते हैं यह सिस्टम मंत्री जी की सहमति से बना है। विभाग और मंत्रालय से इतर एक पॉश कालोनी में यह सिस्टम काम करता है। जिन कंपनियों को बीज,खाद केमिकल बेचना होता है वो पहले यहाँ आते हैं और चढ़ावा देते हैं। फिर इनसे मंत्री जी के नाम पर भी वसूली की जाती है। काम मिलने के बाद भुगतान के समय पूरा विभाग इन कंपनियों को नोचता है। अगर आपने विरोध किया तो अगले साल आपका लाइसेंस निरस्त समझो। जानकारों का कहना है कि इस साल तो कमीशन का रेट भी बढ़ा दिया गया है जो काम पहले 20 प्रतिशत होता था। अब उसका 25 प्रतिशत लग रहा है। इसके बावजूद भुगतान की कोई गारंटी नहीं। यही हाल राज्य के जंगल महकमे का है जहां कमीशन खोरी का जंगल राज चल रहा है। इन दिनों यह विभाग लाखों किलो का वर्मी कम्पोज़ खरीद रहा है। जेम पोर्टल के जरिये हर जिले के अलग अलग टेंडर हो रहे हैं और व्यापारी जो मर्जी आये वह रकम डालकर काम हासिल कर रहे हैं। दूसरे विभागों में जब किसी सामान की खरीदी होती है तो विभाग की एक कमेटी उस सामान का एक वास्तविक मूल्य तय करती है और उस मूल्य से कम राशि यदि निविदा में कोई डालता है तो उसे निरस्त कर दिया जाता है। लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं होता। जानकारों ने बताया कि एक किलो वर्मी कम्पोस्ट की कीमत किसी भी हाल में आठ रुपये प्रति किलो से कम नहीं हो सकती, लेकिन यहां पांच रुपये प्रतिकिलो की दर से काम प्राप्त किया जा रहा है। अब आप ही बताओ तीन रुपये प्रतिकिलो का घाटा उठाकर ये कौन दानवीर हैं जो इस काम को कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में विभाग के अधिकारी और दलाल मिलकर शार्ट सप्लाई जैसे अपराध को अंजाम देते हैं। गरीब किसान आदिवासी के अधिकारों पर डाका डालकर ये लोग अपना ऐश्वर्य बढ़ा रहे हैं। दरअसल,राज्य में और भी कई विभाग ऐसे हैं जिन्हें मंत्रियों ने ठेके पर दे दिया है। आपको विभाग में काम करना है तो पहले इन ठेकेदारों से मिलो, इन्हे चढ़ावा दो, फिर आगे की प्रक्रिया शुरू होती है। ये ठेकेदार मंत्रियों की आड़ में कंपनियों से पहले ही लम्बी वसूली कर लेते हैं। मंत्रियों के बंगलों में इन ठेकेदारों से पीडि़त लोग चक्कर काटते मिल जाएंगे जिनकी कोई सुनवाई नहीं है।

मंत्रिमंडल में फेरबदल अटकलें या दुविधा
जिस दिन से राज्य में भाजपा की सरकार बनी है उसी दिन से यह अटकलें लगाई जाने लगी थीं कि मौजूदा मंत्रिमंडल अपना कार्यकाल पूरा नहीं करेगा चुनाव के पहले एक बड़ी सर्जरी जरूर होगी। अब चुनाव में लगभग दो वर्ष रह गए हैं इसलिए चर्चाओं का बाजार भी गरमा गया है। फेरबदल में मुख्यरूप से स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल, महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी रजवाड़े, उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन और राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा का नाम सबसे अधिक चर्चा में रहा। अब इसमें कृषि मंत्री रामविचार नेताम और राजेश अग्रवाल का नाम भी जुड़ गया है। भाजपा सूत्रों की मानें तो इस फेरबदल ने भाजपा की दुविधा बढ़ा दी है। लक्ष्मी रजवाड़े को हटाना मतलब सरगुजा में करीब ढाई से तीन लाख रजवाड़े वोट प्रभावित हो सकते हैं। लखनलाल देवांगन को छेडऩा मतलब बुनकर समाज का वोट भी प्रभावित हो सकता है। टंकराम वर्मा मंत्री मंडल में कुर्मी चेहरा हैं। हालांकि भाजपा के पास और भी कुर्मी नेता हैं जिन्हें टंकराम की जगह शामिल किया जा सकता है, लेकिन यह काम भी आसान नहीं है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल तो सर्वाधिक विवादों में घिरे मंत्री हैं। कहा जा रहा है कि मां लक्ष्मी की कृपा रही तो वे बने रहेंगे। सरगुजा से आने वाले कृषि मंत्री रामविचार नेताम और राजेश अग्रवाल भी संगठन के निशाने पर हैं। सूत्र बताते हैं कि संगठन वरिष्ठ भाजपा नेता अमर अग्रवाल को मंत्रिमंडल में लाना चाहता है, लेकिन पार्टी के दूसरे वरिष्ठ विधायक राजेश मूणत, अजय चंद्राकर और धरमलाल कौशिक की प्रतिक्रिया से संगठन चिंतित है। वर्तमान मंत्रिमंडल की कार्यशैली से राज्य में और भाजपा के भीतर भी भारी असंतोष पनप रहा है। चुनाव से पहले भाजपा को एक दमदार मंत्रिमंडल बनाना होगा, लेकिन जातिगत, क्षेत्रीयता, वरिष्ठता और योग्यता में सामंजस्य कैसे बैठे इसी दुविधा से भाजपा जूझ रही है। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही भाजपा नए मंत्रिमंडल का गठन कर देगी।

जहाँ हुस्न दिखा वहीँ मर मिटे
किसी उस्ताद शायर का यह शेर कि ‘गली गली में मज़ार बनी है अपनी, जहां हुस्न दिखा वहीं मर मिटे हमÓ प्रदेश के एक कलेक्टर साहब पर फिट बैठता है। दरअसल कलेक्टर साहब जिस जिले में पदस्थ हैं वहीं पर वे एक समय जिला पंचायत के सीईओ हुआ करते थे। उस दौरान वे जिले के एक गांव की महिला सरपंच पर साहब बहादुर लट्टू हो गए। उस महिला सरपंच को भी यह बात भा गई कि साहब का दिल हिल डुल रहा है तो उसने भी अपनी पंचायत में साहब से खूब काम कराये। अपने गांव में जिले का सबसे सुन्दर उद्यान भी बनवा लिया। इसी जिले में इन साहब बहादुर के पहले भी एक जिला पंचायत के सीईओ थे। वह भी अपनी आशिक मिज़ाजी के चलते खूब चर्चा में रहे। बताते हैं कि उन साहब की तो पत्नी ने साहब की क्लास लगा दी थी। पूरे कलेक्टोरेट में और सत्ता की वीथिकाओं में लोग बहुत चटखारे लेकर इन किस्सों का जिक्र करते हैं, लेकिन लोग यह नहीं समझते कि साहब बहादुर अपने दिल का क्या करें जो मानता ही नहीं।

दो-दो बंगलों पर कब्ज़ा
सत्ता में नेताओं और नौकरशाहों के बीच सरकारी बंगला बहुत संवेदनशील मसला होता है। बंगला बचाने के लिए नेता अपना स्वाभिमान,पार्टी की विचारधारा और लोकलाज सब तज देते हैं। नौकरशाहों का भी यही स्वाभाव होता है वे सेवानिवृत्ति के बाद भी बंगले में बने रहने की चाहत में अपने पुनर्वास के लिए सत्ताधीशों की चौखट पर मिमियाते हैं। आज भी कई नेताओं ने दो-दो बंगलों पर आधिपत्य जमा रखा है। नया रायपुर में पूरी सरकार शिफ्ट हो चुकी है। मंत्रियों के बंगले भी बन गए हैं, लेकिन उनमे जो मंत्री रह रहे हैं उनमें से अधिकतर ने पुराने बंगले को अभी तक खाली नहीं किया है। रायपुर में एक सांसद को उस समय बंगला मिला, जब वे मंत्री थे। फिर वे विधायक रहे और अब सांसद हैं। वे अपने निजी निवास में रहते हैं फिर भी उन्होंने बंगला खाली नहीं किया। इसी तरह भाजपा नेता चुनाव हारने के बाद भी कई साल तक सरकारी बंगले में जमे रहे। पता नहीं इस मोह से ये लोग मुक्त क्यों नहीं हो पाते।

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