राजपाट – प्रफुल्ल पारे

रिमांड पर रामगोपाल
लगभग तीन साल से फरार चल रहे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल ने आखिरकार ईओडब्ल्यू के सामने समर्पण कर दिया। प्रदेश में भूपेश बघेल की सरकार के दौरान कोयला परिवहन में अवैध वसूली और करोड़ों के आबकारी घोटाले में रामगोपाल का नाम प्रमुखता से आ रहा था। ईडी और ईओडब्ल्यू का आरोप है कि राज्य के कोयला और आबकारी घोटाले में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल की अहम् भूमिका रही है। एजेंसियों का मानना है कि रामगोपाल ही वही व्यक्ति हैं, जिनके पास घोटाले की राशि का बड़ा हिस्सा पहुंचता था और उन्ही के माध्यम से पैसा कांग्रेस के उच्च पदस्थ लोगों तक भेजा जाता था। कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार के समय रामगोपाल अग्रवाल पार्टी के कोषाध्यक्ष के साथ नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष भी रहे हैं। बीते तीन साल में एजेंसियों ने रामगोपाल अग्रवाल के यहां दबिश दी, लेकिन रामगोपाल पकड़ में नहीं आये। पिछले दिनों ईओडब्ल्यू ने उनके पुत्र को पूछताछ के लिए बुलाया और इसके कुछ घंटे बाद ही रामगोपाल अग्रवाल ने समर्पण कर दिया। इस गिफ्तारी के बाद राज्य में राजनीति भी शुरू हो गई है। भाजपा के हमलों के बाद कांग्रेस भी अपने नेता रामगोपाल अग्रवाल के लिए केवल खानापूर्ति करती नजर आ रही है। प्रदेश कांग्रेस अधयक्ष दीपक बैज ने अपने बयान में इसे भाजपा सरकार की साजिश तो कहा है लेकिन अपने नेता को पूर्व कोषाध्यक्ष करार दे दिया है। जानकारों का कहना है कि रामगोपाल अग्रवाल ने कोषाध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा नहीं दिया है और ना ही कांग्रेस ने उन्हें हटाया है तो वे पूर्व कोषाध्यक्ष कैसे हो गए। उनके फरार होने की स्थिति में कांग्रेस कमेटी ने कोष में से राशि आहरण वितरण के लिए केवल हस्ताक्षर अधिकर्ता मलकीत सिंह गेदू को बनाया। कांग्रेस के भीतर ही इस बात को लेकर चर्चा है कि कांग्रेस रामगोपाल अग्रवाल की गिरफ्तारी का विरोध वैसा नहीं कर रही है जैसा उसे करना चाहिए। इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि वह अपने कोषाध्यक्ष की गिरफ्तारी से पल्ला झाडऩे में लगी है। ईओडब्ल्यू ने रामगोपाल अग्रवाल को अदालत में पेश कर रिमांड पर ले लिया है जहां उनसे गहन पूछताछ की जाएगी। कांग्रेस नेता के बयान कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं शायद इसलिए कांग्रेस उन्हें पूर्व कोषाध्यक्ष बता रही है, ताकि भविष्य में उनसे किनारा करने में ज्यादा कठिनाई ना हो। हालांकि, कांग्रेस के सूत्र यह भी बता रहे हैं कि पार्टी रामगोपाल अग्रवाल की गिरफ्तारी का प्रदेशव्यापी विरोध करने पर विचार कर रही है लेकिन ये प्रदर्शन कितने प्रभावशाली होंगे यह तो बाद में पता चलेगा। वहीं इससे इतर एक चर्चा यह भी है कि रामगोपाल अग्रवाल को बचाने के लिए भाजपा के एक बड़े नेता भी लगे हुए हैं जो रामगोपाल अग्रवाल के निकट संबंधी भी हैं। अगर यह भाजपा नेता रामगोपाल अग्रवाल को बचाने में कामयाब हो जाते हैं तो यह तय मानिये कि आने वाले दिनों में कांग्रेस की मुश्किलें और बढऩे वाली हैं। फिलहाल तो कांग्रेस रामगोपाल अग्रवाल को न उगल पा रही है ना निगल पा रही है।

रायपुर में भी वाह ताज जैसी कहानी
वर्ष 2016 में एक फिल्म आई थी वाह ताज। फिल्म की कहानी भले ही हास्य-व्यंग्य के अंदाज में बुनी गई थी, लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल बेहद गंभीर था। फिल्म में किसान तुकाराम मराठे (श्रेयस तलपड़े) अदालत का दरवाजा खटखटाता है और दावा करता है कि आगरा का ताजमहल उसके पूर्वजों की जमीन पर बना है। इसलिए उसे अपनी जमीन वापस चाहिए। एक साधारण किसान का देश की सबसे बड़ी ऐतिहासिक इमारत पर दावा, अदालत की प्रक्रिया, सरकारी तर्क और लालफीताशाही की उलझनें फिल्म को रोचक भी बनाती हैं और व्यवस्था पर सवाल भी खड़े करती हैं। अब इस फिल्म की याद इसलिए आ रही है क्योंकि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी एक किसान ने कुछ ऐसा ही दावा किया है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह कहानी पर्दे की नहीं, बल्कि अदालत की फाइलों में दर्ज वास्तविक विवाद है। यहां कोई ताजमहल नहीं, बल्कि देश के प्रमुख विमानतलों में शामिल रायपुर का स्वामी विवेकानंद विमानतल है, और दावा करने वाला व्यक्ति कोई फिल्मी किरदार नहीं, बल्कि रायपुर का किसान अश्वनी बांधे है। अश्वनी बांधे का दावा है कि रायपुर विमानतल का नया टर्मिनल भवन और उसके आसपास विकसित किया गया गार्डन उनके पूर्वजों की जमीन पर बना है। उनके अनुसार, द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश शासन ने इस जमीन का अधिग्रहण किया था। लेकिन उनका तर्क है कि यह अधिग्रहण स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी उद्देश्य के लिए किया गया था। युद्ध समाप्त होने के बाद यह जमीन उनके परिवार को वापस मिलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कहानी यहीं से शुरू होती है। वर्षों तक दस्तावेजों की तलाश, पुराने रिकॉर्ड खंगालना और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद अश्वनी बांधे ने अदालत का रास्ता चुना। उनका कहना है कि उनके पास ऐसे दस्तावेज हैं जो साबित करते हैं कि जमीन पर उनके परिवार का अधिकार था। अब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अश्वनी बांधे ने सरकार से करीब 3500 करोड़ के मुआवजे की मांग की है। एक तरफ एक किसान है, जो अपने पूर्वजों की जमीन वापस पाने की लड़ाई लडऩे का दावा कर रहा है। दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था है, जिसके पास दशकों पुराने रिकॉर्ड, अधिग्रहण प्रक्रिया और कानूनी तर्क हैं। असली सवाल उस व्यवस्था का है, जहां जमीन के रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच कई बार दशकों का अंतर पैदा हो जाता है। कहा जाता है कि जमीन का रिकॉर्ड जितना पुराना होता जाता है, उसे समझना उतना ही मुश्किल होता जाता है। अंग्रेजों के जमाने की फाइलें, पुराने नक्शे, राजस्व रिकॉर्ड और अधिग्रहण के दस्तावेज आज भी कई मामलों में अंतिम सत्य साबित करने का आधार बने हुए हैं। इतने लंबे समय में जमीन का स्वरूप बदल जाता है, शहर फैल जाते हैं, निर्माण हो जाते हैं और कई बार वह जमीन किसी बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट का हिस्सा बन चुकी होती है। रायपुर विमानतल का मामला भी इसी जटिलता से जुड़ा हुआ है। जिस जमीन पर आज आधुनिक टर्मिनल भवन खड़ा है, वहां तक पहुंचने में शहर ने कई दशक का सफर तय किया है। इस दौरान शासन बदले, कानून बदले, रिकॉर्ड व्यवस्था बदली और विकास की जरूरतों के अनुसार जमीनों का उपयोग बदलता गया। ऐसे में अश्वनी बांधे को भी यह समझना होगा कि वे केवल एक जमीन का दावा नहीं लड़ रहे, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था से न्याय मांग रहे हैं जिसकी गति अक्सर धीमी और प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। अदालतों में न्याय दस्तावेजों के आधार पर मिलता है, भावनाओं के आधार पर नहीं। यहां 85 साल पुरानी कहानी को कुछ घंटों में नहीं सुलझाया जा सकता। फिलहाल यह मामला अदालत में है और अंतिम फैसला न्यायपालिका को करना है। कौन सही है और कौन गलत, इसका निर्णय दस्तावेजों और कानून के आधार पर होगा। लेकिन रायपुर का यह विवाद यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि देश में जमीनों के रिकॉर्ड कितने सुरक्षित और स्पष्ट हैं।

गोदी गांव के बाद अब गोदी थाने
भारतीय परंपरा में गोद लेना हमेशा से अपनत्व, संरक्षण और जिम्मेदारी का प्रतीक रहा है। किसी बच्चे को गोद लेना हो या किसी जरूरतमंद का सहारा बनना, यह शब्द भावनाओं से जुड़ा रहा है। लेकिन राजनीति की दुनिया में आते-आते गोद और गोदी का अर्थ भी बदलने लगा है। अब यह शब्द सिर्फ रिश्तों और जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकारी योजनाओं और राजनीतिक प्रतीकों का हिस्सा बन गया है। वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद गोद लेने की राजनीति को एक नया विस्तार मिला। प्रधानमंत्री ने देश के सभी सांसदों से अपील की कि वे अपने संसदीय क्षेत्र के एक गांव को गोद लें और उसे आदर्श ग्राम बनाएं। उद्देश्य सुनने में बेहद आकर्षक था-ऐसा गांव तैयार करना जहां विकास की तस्वीर देश के सामने उदाहरण बने। सांसदों को लगा कि अब उनके गोद लिए गांव विकास की प्रयोगशाला बनेंगे और ग्रामीणों के अच्छे दिन गांव की गलियों से होकर आएंगे, लेकिन राजनीति में घोषणाओं और हकीकत के बीच की दूरी अक्सर बहुत लंबी होती है। एक पूरा कार्यकाल गुजर गया। वर्ष 2019 में जब सांसद आदर्श ग्राम योजना की समीक्षा हुई तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं मिली, जितनी भाषणों में दिखाई गई थी। कई सांसदों के गोद लिए गांव विकास की बाट जोहते रह गए। कहीं सड़कें अधूरी रहीं, कहीं मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंचीं और कहीं आदर्श ग्राम का सपना सिर्फ सरकारी फाइलों में ही आदर्श बना रहा। यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि जब सांसद अपने गोद लिए गांवों को ही आदर्श नहीं बना पाए तो फिर देश के बाकी गांवों के लिए विकास के दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं? आखिर गोद लेना केवल घोषणा करने का नाम है या उसकी कोई जवाबदेही भी तय होगी? राजनीति में प्रतीकों का अपना महत्व होता है। कभी गांव गोद लिए जाते हैं, कभी योजनाएं गोद ली जाती हैं और अब लगता है कि थाने भी गोद लेने की श्रेणी में शामिल होने जा रहे हैं। करीब छह माह पहले छत्तीसगढ़ में देशभर के पुलिस महानिदेशकों और वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक के बाद पुलिस व्यवस्था को आधुनिक और प्रभावी बनाने की दिशा में कई चर्चाएं हुईं। इसी बीच थानों को विशेष रूप से विकसित करने और मॉडल बनाने की पहल सामने आई। अब चर्चा है कि कुछ थानों को भी गोद लेकर उनका कायाकल्प किया जाएगा। गांवों के बाद अब थानों की बारी है। कल तक सांसद गांवों के संरक्षक बने घूम रहे थे, अब अधिकारी और संस्थाएं थानों के पालनहार बनने की तैयारी में हैं। सवाल यह नहीं है कि थाना गोद लिया जा रहा है या नहीं, सवाल यह है कि क्या आम आदमी की सुनवाई भी गोद ली जाएगी? क्योंकि देश में सबसे बड़ी समस्या थानों की इमारतों की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। कई जगह फरियादी आज भी न्याय की उम्मीद लेकर थाने पहुंचता है तो उसे पहले अपनी पहचान, पहुंच और प्रभाव साबित करना पड़ता है। गरीब और कमजोर व्यक्ति के लिए थाना आज भी डर का स्थान बना हुआ है, जबकि होना यह चाहिए कि थाना उसके भरोसे का केंद्र बने। अगर गोद लिए गए थानों में सिर्फ रंग-रोगन होगा, नए बोर्ड लगेंगे, फोटो खिंचेंगे और उद्घाटन समारोह होंगे तो यह भी गोद लिए गए गांवों जैसी एक और सरकारी कवायद बनकर रह जाएगी। असली बदलाव तब होगा जब पुलिस का व्यवहार बदलेगा, शिकायतों का समाधान तेजी से होगा, जांच निष्पक्ष होगी और आम नागरिक बिना डर के अपनी बात रख सकेगा।

युवा चेहरे, बुजुर्ग सियासत और 2028 का खेल
छत्तीसगढ़ युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद का चुनाव इस बार महज संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं रह गया है। यह चुनाव कांग्रेस के भीतर चल रही अदृश्य राजनीतिक रस्साकशी का अखाड़ा बन चुका है, जहां मैदान में युवा चेहरे हैं, लेकिन दांव पर पुराने दिग्गजों की सियासी पकड़ लगी हुई है। पद एक है, लेकिन इस कुर्सी के पीछे कई राजनीतिक समीकरण, कई महत्वाकांक्षाएं और 2028 के विधानसभा चुनाव की लंबी रणनीति छिपी हुई है। युवा कांग्रेस का चुनाव अक्सर संगठन में नई ऊर्जा और नए नेतृत्व के चयन की प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस बार तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। यहां युवा कार्यकर्ता मैदान में हैं, मगर मुकाबले की दिशा और दशा तय करने में बड़े नेताओं की छाया साफ नजर आ रही है। ऐसा लगता है कि अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने वाला चेहरा भले युवा होगा, लेकिन उसके पीछे खड़े राजनीतिक कंधे ही उसकी असली ताकत तय करेंगे। कांग्रेस की राजनीति में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। यह पार्टी की पुरानी परंपरा रही है कि हर चुनाव के पहले संगठन के भीतर कई ध्रुव सक्रिय हो जाते हैं। कभी विचारधारा की लड़ाई होती है, कभी नेतृत्व की, और कभी भविष्य की कुर्सियों के लिए जमीन तैयार की जाती है। युवा कांग्रेस का यह चुनाव भी इसी परंपरा का नया संस्करण दिखाई दे रहा है। मौजूदा समीकरणों में शैलेन्द्र बंजारे का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। उन्हें विधायक देवेंद्र यादव खेमे का प्रमुख चेहरा माना जा रहा है। दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समर्थक माने जाने वाले विनय शील भी पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं। यानी मुकाबला युवाओं के बीच जरूर है, लेकिन चर्चा बड़े नेताओं की राजनीतिक ताकत की हो रही है। दिलचस्प बात यह है कि शैलेन्द्र बंजारे को केवल देवेंद्र यादव का समर्थित उम्मीदवार नहीं माना जा रहा, बल्कि राजनीतिक गलियारों में ऐसी भी चर्चा है कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत और पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव समर्थक नेताओं का भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिल सकता है। अगर यह समीकरण वास्तव में चुनावी नतीजों तक कायम रहा तो कांग्रेस के भीतर एक नया शक्ति संतुलन बन सकता है। यानी एक युवा कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के बहाने पार्टी के भीतर नई राजनीतिक धुरी का जन्म भी संभव है। रेफरल की संख्या ने भी चुनावी तापमान बढ़ा दिया है। शुरुआती आंकड़ों में शैलेन्द्र बंजारे सबसे आगे बताए जा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में लड़ाई अब दो प्रमुख खेमों के बीच केंद्रित होती दिखाई दे रही है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि युवा कांग्रेस केवल एक संगठन नहीं, बल्कि पार्टी की भविष्य की कैडर फैक्ट्री मानी जाती है। यहीं से आने वाले वर्षों के नेता तैयार होते हैं। इसलिए बड़े नेता भले मंच से यह कहें कि चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, लेकिन राजनीति में पर्दे के पीछे चलने वाली गतिविधियां अक्सर मंच की बातों से अलग कहानी कहती हैं। सियासत में तटस्थता का बयान भी कई बार एक रणनीतिक बयान होता है। नेता सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि वे किसी उम्मीदवार के साथ नहीं हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं की बैठकों, फोन कॉल और अंदरूनी संदेशों की राजनीति अपना रास्ता खुद बनाती रहती है। कांग्रेस में यह कला नई नहीं है। यहां कई बार समर्थन सीधे नहीं दिया जाता, संकेतों में दिया जाता है। इस पूरे चुनाव का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या युवा कांग्रेस को वास्तव में नया युवा नेतृत्व मिलेगा या फिर यह केवल बड़े नेताओं के प्रभाव का नया प्रदर्शन बनकर रह जाएगा? इतिहास गवाह है कि संगठन की कुर्सियां अक्सर भविष्य की राजनीति का रास्ता तय करती हैं। युवा कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोटा दिखने वाला पद जरूर है, लेकिन यहां से निकलने वाले नेता आगे चलकर विधायक, मंत्री और पार्टी के बड़े चेहरे बनते रहे हैं। फिलहाल युवा कांग्रेस का चुनाव जारी है, लेकिन असली मुकाबला शायद मतपत्रों से बाहर चल रहा है। कुर्सी युवा नेता की होगी, मगर परीक्षा कांग्रेस के बड़े नेताओं की राजनीतिक पकड़ की है।

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