संवाददाता: अनूप वर्मा
स्थान: चारामा (कांकेर)
चारामा। डॉक्टर बनकर देश और समाज की सेवा करने का सपना देखने वाले देश के लाखों युवाओं के भविष्य के साथ एक बार फिर सबसे क्रूर मज़ाक हुआ है। पूरे देश में एक साथ आयोजित होने वाली नीट (NEET) परीक्षा, जो किसी भी छात्र के डॉक्टर बनने का इकलौता दरवाज़ा है, आज भ्रष्टाचार और प्रशासनिक नाकामी की भेंट चढ़ चुकी है। यह केवल एक परीक्षा का पेपर लीक नहीं है, बल्कि देश के परीक्षा तंत्र की रीढ़ की हड्डी टूट जाने का सबूत है।
इस राष्ट्रीय त्रासदी की तपिश दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ के इस छोटे से अंचल चारामा तक महसूस की जा रही है, जहाँ के सैकड़ों परिवारों की उम्मीदें आज दांव पर लगी हैं।
चारामा विकासखंड का यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, परिवारों की सिसकियां हैं
सरकारी दफ्तरों में बैठे अधिकारियों के लिए आंकड़े सिर्फ कागजी संख्या हो सकते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस साल सिर्फ चारामा शहर से 100 से अधिक और यदि पूरे चारामा विकासखंड की बात करें, तो 300 से अधिक होनहार छात्र-छात्राएं दिन-रात एक करके इस परीक्षा की तैयारी में जुटे थे।
चारामा के इन 300 से अधिक बच्चों की दिन-रात की मेहनत, उनके मां-बाप का त्याग, और उनकी रातों की नींद को भ्रष्ट व्यवस्था के चंद दीमकों ने मिलकर चाट लिया।
जमा-पूंजी खत्म, महंगे कोचिंग और बड़े संस्थानों का बोझ: सपनों पर कुठाराघात
इस तैयारी के पीछे की कहानी और भी खौफनाक है। चारामा के कई बच्चे जहाँ घर पर रहकर सीमित साधनों में पढ़ रहे थे, वहीं आधे से ज्यादा बच्चे ऐसे हैं जो बड़े-बड़े शहरों के महंगे कोचिंग सेंटरों और बड़े संस्थानों में रहकर सालों-साल से तैयारी कर रहे थे।
चारामा के कई ऐसे माता-पिता हैं जिनकी आर्थिक क्षमता बाहर पढ़ाने की बिल्कुल नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपने बेटे-बेटियों के डॉक्टर बनने के सपने के लिए अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी झोंक दी। किसी ने कर्ज लिया, किसी ने अपनी जमीन गिरवी रखी, तो किसी ने अपनी गाढ़ी कमाई की एक-एक पाई कोचिंग की भारी-भरकम फीस और हॉस्टल के खर्च में उड़ा दी। इस उम्मीद में कि उनका बच्चा एक दिन डॉक्टर बनेगा और परिवार के सारे कष्ट दूर कर देगा।
लेकिन इस पेपर लीक ने सिर्फ परीक्षा नहीं रद्द की, बल्कि उन लाचार माता-पिता के उस पूरे त्याग और सपनों पर सीधा कुठाराघात किया है। आज पूरा का पूरा परिवार अंदर से टूट चुका है।
खोखले आश्वासन और पूरी तरह नाकाम सरकार
यह सीधे तौर पर सरकार की नाकामी और घोर लापरवाही है। जब देश की सबसे बड़ी और संवेदनशील परीक्षा की सुरक्षा सरकार नहीं कर सकती, तो बड़े-बड़े दावों का क्या मतलब? हर बार पेपर लीक होने के बाद सरकार ‘जांच’ का झुनझुना थमा देती है।
सवाल उठता है कि अगर पिछली घटनाओं से सबक लेकर ठोस और खौफनाक कार्रवाई की गई होती, तो आज किसी की हिम्मत होती कि वह दोबारा पेपर लीक कर सके?
सरकार की यही ढुलमुल नीति और कड़े कदम न उठा पाने की कमजोरी ही है, जिसने शिक्षा माफियाओं के हौसलों को इतना बुलंद कर दिया है कि उन्हें न तो कानून का डर है और न ही बच्चों के आंसुओं की परवाह।
छात्रों का दर्द और मां-बाप का गुस्सा: अब बर्दाश्त से बाहर
चारामा के घरों से जो आवाजें आ रही हैं, वे दिल दहला देने वाली हैं। एक तरफ बच्चों के अंदर यह दर्द है कि “क्या हमारी मेहनत और माता-पिता के पैसों की कोई कीमत नहीं है?”, वहीं दूसरी तरफ माता-पिता का सिस्टम के प्रति भारी गुस्सा है। वे पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक उनके बच्चों के भविष्य की इस तरह सरेआम नीलामी होती रहेगी?
”यह गुस्सा शांत होने वाला नहीं है। जब तक सरकार इस नाकामी को स्वीकार कर दोषियों को ऐसी ऐतिहासिक और कठोरतम सजा नहीं देती जो आने वाली पीढ़ियों के लिए नजीर बने, तब तक युवाओं का इस देश की व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठा रहेगा।”
चारामा के 300 से अधिक बच्चों का यह दर्द और आक्रोश आज पूरे देश के नीति-निर्धारकों के मुंह पर एक करारा तमाचा है। अब वक्त सिर्फ लीपापोती करने का नहीं, बल्कि इस पूरी सड़ी-गली व्यवस्था को बदलने का है।
नीट पेपर लीक: पूरे देश की व्यवस्था तार-तार, चारामा के 300 से अधिक बच्चों और उनके लाचार माता-पिता के आंसुओं का कौन देगा हिसाब?

01
Jun