-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में स्थित अबूझमाड़ वर्षों तक देश के सबसे दुर्गम, रहस्यमय और प्रशासनिक पहुंच से दूर क्षेत्रों में गिना जाता रहा। नाम ही इसकी पहचान बन गया था—अबूझमाड़, अर्थात ऐसा क्षेत्र जिसे समझा न जा सके, जहां तक पहुंचना और वहां की वास्तविक स्थिति जानना लगभग असंभव हो। घने जंगल, ऊंचे पहाड़, संचार और सड़क सुविधाओं का अभाव तथा दशकों तक फैला नक्सली प्रभाव इसे देश के नक्शे पर एक अलग ही पहचान देता रहा। लेकिन समय बदल रहा है और अबूझमाड़ भी बदल रहा है।
हाल ही में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का नारायणपुर जिले के गरबा गांव पहुंचकर सुशासन तिहार के अंतर्गत ग्रामीणों के साथ खाट चौपाल लगाना केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उस ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक था। जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले तक संभव नहीं थी। जिस क्षेत्र में कभी सरकारी अधिकारी जाने से डरते थे, जहां प्रशासन की उपस्थिति नाममात्र की थी, वहां आज मुख्यमंत्री स्वयं ग्रामीणों के बीच बैठकर उनके भविष्य की चर्चा कर रहे हैं। यह दृश्य केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि बदलते बस्तर का दस्तावेज है।
अबूझमाड़ की सबसे बड़ी त्रासदी केवल उसका भौगोलिक दुर्गम होना नहीं था, बल्कि वह नक्सलवाद की हिंसा और भय का केंद्र बन गया था। दशकों तक यहां विकास योजनाएं कागजों पर बनती रहीं, बजट स्वीकृत होते रहे, आदिवासी उपयोजना का धन आता रहा, बस्तर विकास प्राधिकरण जैसी संस्थाएं भी बनीं, लेकिन वास्तविक विकास जमीन पर दिखाई नहीं दिया। इसका एक बड़ा कारण यह था कि प्रशासनिक मशीनरी का बड़ा हिस्सा कभी उन क्षेत्रों तक पहुंच ही नहीं पाया। निरीक्षण नहीं होने का लाभ भ्रष्ट तंत्र ने भी उठाया और नक्सलियों ने भी। विकास के नाम पर धन खर्च हुआ, लेकिन उसका लाभ उन लोगों तक नहीं पहुंचा जिनके नाम पर योजनाएं बनाई गई थीं।
नक्सलवाद ने केवल विकास को बाधित नहीं किया, बल्कि आदिवासी समाज को भी दोहरी मार दी। एक ओर वे हिंसा और भय के बीच जीवन जीते रहे, दूसरी ओर उनके नाम पर आने वाली योजनाओं का लाभ भी उनसे दूर रहा। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाएं वर्षों तक एक सपना बनी रहीं। यही कारण है कि बस्तर और विशेष रूप से अबूझमाड़ को देश के विकास मानचित्र में पिछड़े क्षेत्रों के रूप में देखा जाता रहा।
पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों और राज्य सरकार की संयुक्त रणनीति ने स्थिति को काफी हद तक बदला है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि बस्तर को देश के सबसे उन्नत संभागों में शामिल करना केंद्र और राज्य सरकार की प्राथमिकता है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, नए कैंपों की स्थापना और प्रशासनिक पहुंच बढऩे से नक्सली प्रभाव वाले क्षेत्रों में सरकार की उपस्थिति मजबूत हुई है। इसका परिणाम यह है कि आज मुख्यमंत्री, मंत्री, अधिकारी और विकास कार्यों से जुड़े दल उन गांवों तक पहुंच रहे हैं जहां कभी जाने की कल्पना भी कठिन थी।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा गरबा गांव में 50 बिस्तरों वाले अस्पताल, सड़कों और पुल-पुलियों के निर्माण की घोषणा इसी बदलते दौर का संकेत है। यह केवल निर्माण कार्यों की घोषणा नहीं है, बल्कि राज्य की उस प्रतिबद्धता का प्रमाण है जिसमें विकास को सुरक्षा के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। किसी भी क्षेत्र में स्थायी शांति तभी स्थापित हो सकती है जब वहां के लोगों को बेहतर जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर उपलब्ध हों।
अबूझमाड़ में प्रशासनिक पहुंच बढऩे का एक और सकारात्मक प्रभाव पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के रूप में सामने आ सकता है। बस्तर प्राकृतिक सौंदर्य, जैव विविधता और आदिवासी संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है। यदि सड़क और संचार सुविधाएं बेहतर होती हैं तो यहां पर्यटन, हस्तशिल्प, वन उत्पाद आधारित उद्योग और स्थानीय उद्यमिता के नए अवसर विकसित हो सकते हैं। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
हालांकि विकास की इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कहीं विकास के नाम पर आदिवासी अस्मिता और संस्कृति प्रभावित न हो जाए। बस्तर की पहचान केवल उसके जंगलों या खनिज संपदा से नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट आदिवासी संस्कृति, परंपराओं, भाषाओं और जीवन शैली से है। विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जो स्थानीय समाज की भागीदारी से संचालित हो और उनकी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखे। आदिवासियों को विकास का विषय नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया का भागीदार बनाया जाना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर नक्सलवाद ने भी इसी क्षेत्र में अपनी जड़ें जमाईं थीं। इसलिए यह आवश्यक है कि भविष्य में किसी भी रूप में बाहरी स्वार्थी तत्व आदिवासी समाज का शोषण न कर सकें। सरकार की योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचे, स्थानीय युवाओं को अवसर मिले और प्रशासन के प्रति विश्वास कायम हो, यही वास्तविक सफलता होगी।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय स्वयं आदिवासी समाज से आते हैं। ऐसे में उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे आदिवासी क्षेत्रों की समस्याओं को अधिक संवेदनशीलता से समझेंगे। उनका अबूझमाड़ पहुंचना केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक संदेश है कि राज्य का सबसे दूरस्थ नागरिक भी शासन की प्राथमिकताओं में शामिल है। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब शासन उन लोगों तक पहुंचे जो सबसे अधिक उपेक्षित रहे हों।
आज जब मुख्यमंत्री अबूझमाड़ के गांवों में चौपाल लगा रहे हैं, अधिकारी वहां रात्रि प्रवास कर रहे हैं, सड़कें बन रही हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं की योजनाएं आकार ले रही हैं, तब यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अबूझमाड़ अब सचमुच अबूझ नहीं रहा। यह परिवर्तन केवल भौगोलिक दूरी कम होने का नहीं, बल्कि शासन और जनता के बीच बने लंबे अंतराल के समाप्त होने का संकेत है।
बस्तर में नक्सलवाद के कमजोर पडऩे के बाद विकास का जो नया अध्याय शुरू हुआ है, उसकी सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि वहां के लोगों को सम्मान, सुरक्षा, अवसर और अपनी संस्कृति के साथ आगे बढऩे का अधिकार मिले। यदि ऐसा हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब कभी देश के सबसे पिछड़े और भयग्रस्त क्षेत्र के रूप में पहचाना जाने वाला अबूझमाड़ विकास, सुशासन और जनभागीदारी का उदाहरण बनकर उभरेगा।