युद्ध को लेकर भारत की सोच

-सुभाष मिश्र

पश्चिम एशिया में उभरते युद्ध के हालातों के बीच आखिरकार भारत की आधिकारिक आवाज सामने आई है। प्रधानमंत्री Narendra Modi का लोकसभा में दिया गया बयान केवल एक औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक सोच, कूटनीतिक संतुलन और घरेलू चिंताओं का समेकित प्रतिबिंब है। लंबे समय से जिस “चुप्पी” को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे थे, वह अब एक स्पष्ट नीति-स्थिति में बदलती दिखाई दे रही है—जहां युद्ध नहीं, संवाद ही समाधान का रास्ता है।
पश्चिम एशिया में Iran, Israel और United States के बीच बढ़ते टकराव ने वैश्विक संतुलन को अस्थिर कर दिया है। यह केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण का केंद्र बन चुका है। Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर खतरे की आशंका ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है, क्योंकि विश्व के बड़े हिस्से का तेल परिवहन इसी रास्ते से होता है।
ऐसे समय में भारत का रुख न तो भावनात्मक है और न ही किसी एक खेमे के साथ खड़े होने वाला। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि नागरिक ठिकानों और पावर प्लांट्स पर हमले अस्वीकार्य हैं और समुद्री मार्गों को बाधित करना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। यह बयान अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक व्यवस्था के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा की है। देश अपनी तेल-गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और पश्चिम एशिया इसका प्रमुख स्रोत रहा है। ऐसे में सरकार द्वारा 27 से बढ़ाकर 41 देशों से आयात का निर्णय केवल एक आर्थिक कदम नहीं, बल्कि रणनीतिक विविधीकरण की नीति है। 65 लाख मीट्रिक टन के रणनीतिक भंडार की तैयारी इस बात का संकेत है कि भारत संभावित आपूर्ति संकट से निपटने के लिए दीर्घकालिक सोच के साथ आगे बढ़ रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि ऊर्जा, उर्वरक और खाद्य आपूर्ति की निरंतरता बनाए रखने के लिए बहुस्तरीय निगरानी और वैश्विक साझेदारों से संवाद जारी है।
युद्ध का एक मानवीय पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पश्चिम एशिया में बसे लगभग एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा भारत सरकार की प्राथमिकता के केंद्र में है। 3 लाख 75 हजार नागरिकों की सुरक्षित वापसी और विशेष रूप से छात्रों—जिनमें बड़ी संख्या मेडिकल छात्रों की है—का रेस्क्यू, भारत की कांसुलर क्षमता और संकट प्रबंधन की दक्षता को दर्शाता है। यह केवल कूटनीति नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन है।
घरेलू स्तर पर भी इस संकट के प्रभाव को लेकर सरकार सजग दिखती है। गर्मी के मौसम में बढ़ती बिजली मांग, कोयले का पर्याप्त भंडार, और खाद्यान्न सुरक्षा को लेकर दिए गए आश्वासन यह संकेत देते हैं कि सरकार संभावित बहुआयामी संकट को एक समग्र दृष्टिकोण से देख रही है। कोविड काल के अनुभवों ने भारत को आपूर्ति श्रृंखला के झटकों से निपटने की सीख दी है, जिसका उपयोग अब इस वैश्विक संकट में किया जा रहा है।
राजनीतिक परिदृश्य में इस मुद्दे ने एक दिलचस्प मोड़ भी लिया है। Manish Tewari और Shashi Tharoor जैसे विपक्षी नेताओं द्वारा सरकार के “संयमित रुख” की सराहना यह दर्शाती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर एक व्यापक सहमति की संभावना मौजूद है। वहीं Rahul Gandhi और Mallikarjun Kharge की आलोचनाएं यह याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र में सवाल उठाना भी उतना ही आवश्यक है। हालांकि, कांग्रेस के भीतर उभरता यह मतभेद इस बात का संकेत है कि वैश्विक मुद्दों पर आंतरिक राजनीतिक एकरूपता हमेशा संभव नहीं होती।
भारत की सबसे बड़ी परीक्षा इस समय संतुलन बनाए रखने की है। एक ओर Iran के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर Israel के साथ सामरिक और तकनीकी साझेदारी मजबूत हुई है। United States के साथ बढ़ते रणनीतिक रिश्ते भी किसी से छिपे नहीं हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष का समर्थन करना भारत के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ हो सकता है। यही कारण है कि भारत “संतुलित कूटनीति” (Strategic Autonomy) की नीति पर कायम है—जहां राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं, न कि वैचारिक या दबाव आधारित निर्णय।
वैश्विक परिदृश्य में भी स्थिति तेजी से बदल रही है। नाटो देशों की सक्रियता, अमेरिका की आक्रामक बयानबाजी, और ईरान की जवाबी चेतावनियां इस संघर्ष को व्यापक रूप देने की क्षमता रखती हैं। यदि यह टकराव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक मंदी, आपूर्ति संकट और राजनीतिक अस्थिरता के रूप में सामने आ सकता है।
ऐसे समय में भारत की भूमिका केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि एक संभावित मध्यस्थ की भी हो सकती है। “वसुधैव कुटुंबकम्” की अपनी परंपरा और वैश्विक मंचों पर बढ़ती साख के साथ भारत संवाद और शांति की पहल को आगे बढ़ा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान उसी दिशा में एक संकेत है—जहां भारत न केवल अपने हितों की रक्षा कर रहा है, बल्कि वैश्विक स्थिरता के पक्ष में भी खड़ा है।
यह स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया का यह संकट केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि 21वीं सदी की बदलती वैश्विक राजनीति का प्रतिबिंब है। भारत के लिए यह चुनौती भी है और अवसर भी—चुनौती अपने आर्थिक और ऊर्जा हितों की रक्षा की, और अवसर एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को और मजबूत करने का।

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