नीतिगत विसंगतियों और प्रशासनिक उदासीनता के बीच पिसते अतिथि व्याख्याता: सुधार की तत्काल आवश्यकता

रायपुर। छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत महाविद्यालयों की समीक्षा बैठकों और नीति-निर्धारण की प्रक्रियाओं को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। उच्च वेतनमान प्राप्त प्रशासनिक अधिकारियों और वर्षों से स्थापित प्राचार्यों/प्रोफेसरों द्वारा जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर बनाई जा रही नीतियां, अंततः शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले अतिथि व्याख्याताओं के लिए आर्थिक और मानसिक शोषण का कारण बन रही हैं।
​### जमीनी हकीकत से दूर ‘कमरा-नंबर-1’ की नीतियां
​जानकारों का मानना है कि जब भी विभाग स्तर पर समीक्षा बैठकें होती हैं, तो लाखों रुपये वेतन पाने वाले वरिष्ठ वर्ग द्वारा ऐसे अव्यावहारिक सुझाव दे दिए जाते हैं, जिन्हें विभाग बिना किसी गहन समीक्षा या भविष्य के आकलन के ‘नियम’ का रूप दे देता है। इन तुगलकी फरमानों और तुकबंदियों का सबसे बुरा असर उन अतिथि व्याख्याताओं पर पड़ता है, जो न्यूनतम मानदेय पर उच्च शिक्षा की व्यवस्था को संभाले हुए हैं। बिना किसी दूरदर्शिता के बनाए गए ये नियम केवल विसंगतियों को जन्म देते हैं।
​### समस्या के तीन मुख्य पहलू: कहाँ चूक हो रही है?
​वर्तमान परिदृश्य को देखा जाए तो व्यवस्था की इस बदहाली के लिए मुख्य रूप से तीन स्थितियां जिम्मेदार नजर आती हैं:
​भ्रामक विमर्श (Misguiding System): कुछ ऐसे वरिष्ठ पदस्थ लोग जो जमीनी स्तर पर पढ़ा रहे युवाओं के संघर्ष से कट चुके हैं, वे अपनी प्रशासनिक पकड़ का फायदा उठाकर विभाग को गलत और अव्यावहारिक दिशा में मोड़ देते हैं।
​नीतिगत शून्यता (Flawed Policy-making): शासन और प्रशासन का वह हिस्सा जो बिना किसी जमीनी इनपुट या बिना हितधारकों (अतिथि व्याख्याताओं) से चर्चा किए, केवल कागजी कोरम पूरा करने के लिए नियम थोप देता है।
​मजबूरी और एकता का अभाव: वह वर्ग जो अत्यंत कम मानदेय या कई बार ‘भविष्य की उम्मीद’ में बिना किसी सशक्त विरोध के, अनुचित शर्तों पर भी काम करने को तैयार हो जाता है। संगठन में वैचारिक बिखराव और कुछ साथियों द्वारा बिना किसी ठोस रणनीति के व्यवस्था के आगे झुक जाना भी इस शोषण को लंबी उम्र देता है।
​### व्यवस्थागत सुधार और एकजुटता ही एकमात्र विकल्प
​उच्च शिक्षा की गुणवत्ता केवल शानदार भवनों और ऊंचे वेतनमान वाले पदों से तय नहीं होती, बल्कि क्लासरूम में खड़े होकर पूरी निष्ठा से पढ़ाने वाले युवा शिक्षकों से तय होती है। अगर अतिथि व्याख्याताओं का शोषण इसी तरह “अस्थायी व्यवस्था” के नाम पर चलता रहा, तो राज्य की उच्च शिक्षा का ढांचा कमजोर होना तय है।
​निष्कर्ष: अब समय आ गया है कि उच्च शिक्षा विभाग केवल चंद अधिकारियों की बातों को अंतिम सत्य न माने, बल्कि एक पारदर्शी, स्थायी और सम्मानजनक नीति का निर्माण करे। साथ ही, अतिथि व्याख्याता संघ को भी अपनी मांगों और एकजुटता को इस तरह मजबूत करना होगा ताकि कोई भी प्रशासनिक निर्णय उनकी गरिमा और अधिकारों के साथ खिलवाड़ न कर सके।

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