छत्तीसगढ़ में 5वीं और 8वीं की बोर्ड परीक्षाओं के दौरान जिस तरह की अव्यवस्थाएं सामने आई हैं, उसने शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरगुजा, कवर्धा, कोरबा, रायगढ़, धमतरी और जांजगीर जैसे जिलों से आई शिकायतें केवल तकनीकी खामियां नहीं, बल्कि एक गहरे और सुनियोजित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती हैं।
कहीं उत्तर पुस्तिका का कागज इतना पतला है कि एक पन्ने पर लिखे अक्षर दूसरे पन्ने पर साफ दिखाई दे रहे हैं, तो कहीं पेंसिल से लिखे शब्द मिटाने पर कागज फट जा रहा है। गणित जैसे विषय में रफ कार्य के लिए जगह तक नहीं दी गई। कई जगह प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका को एक ही कॉपी में समेट दिया गया, जिससे छात्रों को न केवल लिखने में परेशानी हुई, बल्कि उनके प्रदर्शन पर भी सीधा असर पड़ा।
यह केवल लापरवाही नहीं है। यह उस “अदृश्य भ्रष्टाचार” की झलक है, जो परीक्षा परिणामों या भर्ती घोटालों से कहीं पहले शुरू हो जाता है।
जहां से शुरू होता है असली खेल
आमतौर पर जब परीक्षा में भ्रष्टाचार की बात होती है, तो ध्यान नकल, पेपर लीक या फर्जी चयन पर जाता है। लेकिन उससे पहले एक पूरी प्रक्रिया होती है—प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका की छपाई। यही वह चरण है, जहां पारदर्शिता लगभग शून्य होती है।
परीक्षा से जुड़े इस काम को “गोपनीय” बताकर टेंडर प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है। न खुली प्रतिस्पर्धा होती है, न दरों का सार्वजनिक निर्धारण। कुछ चुनिंदा प्रिंटर्स को सालों-साल यह काम दिया जाता है। आदेश ऊपर से आता है, फाइलें चुपचाप चलती हैं और काम भी चुपचाप हो जाता है।
यही वह जगह है जहां गुणवत्ता से समझौता कर भारी कमीशनखोरी की जाती है। जानकार बताते हैं कि इस प्रक्रिया में 50 से 60 प्रतिशत तक का मार्जिन संभव होता है। कागज की गुणवत्ता घटाकर, पेज कम करके और सस्ती छपाई करके लागत घटाई जाती है, जबकि भुगतान उच्च गुणवत्ता के नाम पर लिया जाता है।
छात्र भुगतते हैं कीमत
इस पूरे खेल का सबसे बड़ा नुकसान उन छात्रों को उठाना पड़ता है, जो परीक्षा देने बैठते हैं। उत्तर पुस्तिका खराब होने से उनका आत्मविश्वास टूटता है, लिखने की गति प्रभावित होती है और कई बार वे सही तरीके से उत्तर तक नहीं दे पाते।
धमतरी में हालात इतने गंभीर थे कि हल्का दबाव डालने पर ही पन्नों में छेद हो रहे थे। कवर्धा में रबर चलाने पर कागज फट रहे थे। जांजगीर में चार पन्नों में 20 प्रश्न समेट दिए गए। यह केवल व्यवस्थागत विफलता नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
और सबसे चिंताजनक बात यह रही कि शिकायतों के समाधान के बजाय कुछ जगहों पर मीडिया की एंट्री तक रोकने के मौखिक निर्देश दिए गए। यानी समस्या को ठीक करने की बजाय उसे छिपाने की कोशिश।
देशभर में भी उठते रहे हैं सवाल
यह समस्या केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है। अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर उत्तर पुस्तिकाओं और प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई बोर्ड परीक्षाओं में कागज की गुणवत्ता, प्रिंटिंग त्रुटियां और जगह की कमी जैसी शिकायतें सामने आई हैं। लेकिन इन पर कभी गंभीर जांच नहीं हुई, क्योंकि यह क्षेत्र “गोपनीयता” के आवरण में छिपा रहता है।
पारदर्शिता की सबसे बड़ी कमी
वास्तविक समस्या यह है कि परीक्षा प्रक्रिया के इस महत्वपूर्ण हिस्से में कोई पारदर्शी तंत्र नहीं है।
- न ई-टेंडरिंग
- न थर्ड पार्टी क्वालिटी ऑडिट
- न सार्वजनिक जवाबदेही
जबकि यही वह चरण है, जहां से पूरी परीक्षा की गुणवत्ता तय होती है।
अब क्या होना चाहिए
इस पूरे मामले ने पहली बार उस परत को उजागर किया है, जो वर्षों से अनदेखी रही। अब जरूरत है कि—
- उत्तर पुस्तिका और प्रश्नपत्र की छपाई को पूरी तरह ई-टेंडरिंग के दायरे में लाया जाए।
- कागज और प्रिंटिंग की गुणवत्ता के लिए मानक तय हों और उनका स्वतंत्र ऑडिट हो।
- जिम्मेदारी तय हो—सिर्फ प्रिंटर की नहीं, बल्कि अधिकारियों की भी।
- सबसे जरूरी, “गोपनीयता” के नाम पर चल रहे इस अपारदर्शी सिस्टम की समीक्षा हो।
क्योंकि अगर परीक्षा की नींव ही कमजोर होगी, तो परिणामों की निष्पक्षता पर भरोसा कैसे कायम रहेगा?
यह मामला केवल खराब कागज का नहीं है, बल्कि उस सोच का है जिसमें व्यवस्था मानकर चलती है कि छात्र कुछ भी सह लेंगे। अब यह मान्यता टूटनी चाहिए—क्योंकि शिक्षा में भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक रूप वही है, जो दिखाई नहीं देता।