नई दिल्ली: मादक पदार्थों की तस्करी और नशे के खिलाफ जारी अभियान में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को एक बहुत बड़ी सफलता हाथ लगी है। ‘ऑपरेशन रेजपिल’ (Operation Ragepill) के तहत देश में पहली बार ‘कैप्टागॉन’ (Captagon) नाम के एक बेहद खतरनाक सिंथेटिक ड्रग को जब्त किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पकड़े गए इस प्रतिबंधित ड्रग की अनुमानित कीमत करीब 182 करोड़ रुपये आंकी गई है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (Twitter) पर इस बड़ी कामयाबी की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि यह ड्रग मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) के देशों में भेजे जाने के लिए तैयार किया गया था। इस पूरी कार्रवाई के दौरान एक विदेशी नागरिक को भी गिरफ्तार किया गया है। गृह मंत्री ने इस कार्रवाई को देश से नशे के खात्मे और सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का एक बेहतरीन उदाहरण बताया है। उन्होंने देश की सीमाओं की सुरक्षा में तैनात नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के जवानों को इस सतर्कता के लिए बधाई दी और कहा कि देश की धरती को ड्रग्स तस्करी का रास्ता बनाने वाले हर एक अपराधी पर कड़ा प्रहार किया जाएगा।
क्या है ‘कैप्टागॉन’ ड्रग और इसके साइड इफेक्ट्स?
‘कैप्टागॉन’ दरअसल ‘फेनेथिलिन’ (Fenethylline) नामक रसायन का एक प्रचलित नाम है। यह एक कृत्रिम उत्तेजक (सिंथेटिक स्टिमुलेंट) दवा है, जिसे शुरुआत में 1960 के दशक में ध्यान की कमी (ADHD) और नींद से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए बनाया गया था। हालांकि, इसकी गंभीर लत लगने और इसके बेकाबू दुरुपयोग को देखते हुए 1980 के दशक में इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था।
सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, वर्तमान में अवैध बाजारों में बिकने वाली कैप्टागॉन की गोलियों में एम्फ़ैटेमिन, कैफीन और मेथैम्फ़ैटेमिन जैसे कई घातक रसायनों को मिलाकर गुप्त प्रयोगशालाओं में तैयार किया जाता है। इसके सेवन से इंसान के भीतर अचानक अत्यधिक ऊर्जा और झूठी खुशी (Euphoria) का संचार होता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति की भूख-प्यास और नींद गायब हो जाती है और उसका आत्मविश्वास व आक्रामकता कई गुना बढ़ जाती है। लगातार इस्तेमाल से यह इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को खत्म कर देता है और वह मानसिक रूप से इस पर निर्भर हो जाता है। कुछ देशों में इसे “गरीबों का कोकीन” भी कहा जाता है।
इसे ‘जिहादी ड्रग’ क्यों कहा जाता है?
सुरक्षा विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसे “जिहादी ड्रग” के नाम से इसलिए जाना जाता है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में इस ड्रग का सबसे ज्यादा उत्पादन और इस्तेमाल पश्चिमी एशिया के युद्धग्रस्त और अशांत इलाकों में सक्रिय आतंकी संगठनों द्वारा किया गया है। सीरिया इस अवैध कारोबार का मुख्य केंद्र रहा है।
माना जाता है कि ‘इस्लामिक स्टेट’ (ISIS) जैसे खतरनाक आतंकी समूहों के लड़ाके युद्ध के मैदान में लंबे समय तक बिना सोए टिके रहने, डर और थकान को मिटाने तथा अपनी आक्रामकता को बढ़ाने के लिए इस टैबलेट का सेवन करते थे। अंतरराष्ट्रीय जांचों में संघर्ष वाले क्षेत्रों से कई बार इस ड्रग की भारी बरामदगी हुई है। इसके अलावा, इस ड्रग की तस्करी से होने वाला करोड़ों का मुनाफा इन चरमपंथी नेटवर्कों के लिए अवैध फंडिंग (Terror Funding) का एक बहुत बड़ा जरिया बन चुका है।