-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के समोदा गांव में मक्के की फसल के बीच बड़े पैमाने पर अफीम की अवैध खेती का मामला सामने आना केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस गहरी प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जो धीरे-धीरे समाज और अर्थव्यवस्था दोनों को अपनी गिरफ्त में ले रही है। पुलिस की कार्रवाई में 5 से 6 एकड़ में फैली अफीम की खेती का उजागर होना, फोरेंसिक जांच में उसकी पुष्टि होना और इसके बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का शुरू हो जाना इस बात को दिखाता है कि मामला केवल कानून व्यवस्था का नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट का भी है।
छत्तीसगढ़ अब तक उस तरह के नशीले पदार्थों की खेती के लिए कुख्यात नहीं रहा था, जैसी कि पहचान मध्यप्रदेश के मंदसौर क्षेत्र की रही है, जहां नियंत्रित और लाइसेंस प्राप्त अफीम की खेती भी होती रही है। छत्तीसगढ़ में अब तक मुख्यत: ओडिशा के रास्ते गांजा तस्करी की खबरें आती रही हैं, और बीच-बीच में ड्रग्स के नेटवर्क का खुलासा भी हुआ है। लेकिन अब अगर राज्य के भीतर ही अफीम की खेती शुरू होने लगे, तो यह एक नई और चिंताजनक प्रवृत्ति है।
समोदा के मामले में यह भी सामने आया कि अफीम की फसल को मक्के के बीच इस तरह छिपाकर उगाया गया था कि बाहर से देखने पर संदेह ही न हो। यह तरीका बताता है कि यह कोई अचानक किया गया प्रयोग नहीं बल्कि सोची-समझी योजना का हिस्सा था। आरोप यह भी लगे कि बाहरी राज्यों से आए लोगों ने इस खेती में भूमिका निभाई। पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से आए कई किसानों ने बड़े पैमाने पर जमीन लेकर आधुनिक खेती शुरू की है। इन किसानों ने तकनीक, मशीनरी और नए फसली प्रयोगों से उत्पादन बढ़ाने के उदाहरण भी पेश किए हैं। लेकिन यदि इसी प्रक्रिया के भीतर कहीं अवैध और मुनाफाखोर खेती की प्रवृत्ति भी प्रवेश करने लगे, तो यह पूरे कृषि तंत्र के लिए खतरे का संकेत है।
असल समस्या केवल यह नहीं है कि किसी खेत में अफीम उगाई गई। असली सवाल यह है कि समाज में तेजी से बढ़ती उस मानसिकता का क्या किया जाए जिसमें कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की ललक ने नैतिक और कानूनी सीमाओं को कमजोर कर दिया है। खेती को अक्सर घाटे का सौदा कहा जाता है, लेकिन जब लोग देखते हैं कि अवैध खेती या नशे के कारोबार से बहुत जल्दी पैसा बन सकता है, तो कुछ लोग उसी रास्ते की ओर आकर्षित हो जाते हैं। यह वही मानसिकता है जो सट्टे, ऑनलाइन जुए, ड्रग्स और अन्य अवैध धंधों को बढ़ावा देती है।
छत्तीसगढ़ में पहले ही शराब कारोबार और उससे जुड़े घोटालों को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक बहस होती रही है। अब अगर अफीम जैसी खेती का मामला सामने आता है और उसमें किसी राजनीतिक व्यक्ति का नाम जुड़ता है, तो यह स्वाभाविक है कि मामला राजनीतिक रंग लेगा। विधानसभा में हंगामा, आरोप-प्रत्यारोप और निलंबन जैसी घटनाएँ इसी का परिणाम हैं। लेकिन राजनीति के इस शोर में अक्सर मूल प्रश्न दब जाते हैं—क्या हमारे समाज में नशे का कारोबार लगातार फैल रहा है? क्या युवाओं को तेजी से इसकी गिरफ्त में लिया जा रहा है? और क्या हमारी व्यवस्था इसके सामने उतनी ही गंभीर है जितनी होनी चाहिए?
नशे का कारोबार इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि इसमें बहुत बड़ा पैसा शामिल होता है। यही कारण है कि इसके तार अक्सर स्थानीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तक फैले होते हैं। छत्तीसगढ़ में महादेव ऐप जैसे ऑनलाइन सट्टे के मामलों ने भी यह दिखाया है कि अवैध कमाई के नेटवर्क कितने व्यापक और संगठित हो सकते हैं। कार्रवाई होती है, गिरफ्तारियाँ भी होती हैं, लेकिन कुछ समय बाद वही कारोबार किसी नए रूप में फिर सामने आ जाता है।
समोदा का मामला इसलिए भी चेतावनी है कि यह बताता है कि नशे का कारोबार अब केवल शहरों या सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं रहा। यदि खेतों के भीतर ही नशीली फसलों की खेती होने लगे, तो यह स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। ऐसे में केवल पुलिस कार्रवाई या राजनीतिक बयानबाजी से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि पूरे राज्य में खेती की निगरानी, जमीन के उपयोग और फार्महाउस जैसी व्यवस्थाओं की पारदर्शी जांच हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसानों को वैध और लाभकारी खेती के विकल्प मिलें, ताकि अवैध रास्तों की ओर जाने का प्रलोभन कम हो।
इतिहास में कार्ल मार्क्स ने धर्म को ‘अफीम कहा था—एक ऐसा नशा जो चेतना को सुन्न कर देता है। आज वास्तविक अफीम और अन्य नशे समाज को उसी तरह सुन्न करने का काम कर रहे हैं। यदि हम केवल किसी एक आरोपी या एक खेत तक इस बहस को सीमित कर देंगे, तो हम उस बड़ी समस्या को नहीं देख पाएंगे जो धीरे-धीरे हमारे समाज में जड़ें जमा रही है।
समोदा की घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें चेतावनी देती है कि अगर अभी भी समाज, सरकार और प्रशासन ने मिलकर इस प्रवृत्ति को गंभीरता से नहीं लिया, तो नशे की यह खेती केवल खेतों में ही नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता में भी फैल सकती है। और तब इसका नुकसान केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढिय़ों के भविष्य को भी प्रभावित करेगा।