बिलासपुर
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के एक बड़े प्रशासनिक फैसले को बदलते हुए साफ किया है कि स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों और व्याख्याताओं को दफ्तर के प्रशासनिक कामों में नहीं लगाया जा सकता। हाईकोर्ट ने बलौदा के खंड शिक्षा अधिकारी यानी बीईओ पद का प्रभार एक स्कूल व्याख्याता को सौंपने वाले सरकारी आदेश को पूरी तरह से गैरकानूनी मानते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने निर्देश में यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों के मुफ्त और जरूरी शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 के तहत तय खास हालातों को छोड़कर शिक्षकों को किसी भी गैर-शैक्षणिक काम में नहीं लगाया जाएगा। इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच में हुई।
क्या था पूरा विवाद और क्यों जाना पड़ा कोर्ट
यह पूरा मामला बलौदा के प्रभारी सहायक खंड शिक्षा अधिकारी रवि कुमार गौतम की याचिका से जुड़ा है। रवि कुमार को विभाग ने प्रभारी बीईओ की जिम्मेदारी दी थी। लेकिन बाद में विभाग ने एक आदेश जारी करके आत्मानंद स्कूल बलौदा के प्रभारी प्राचार्य और व्याख्याता अनिल कुमार शर्मा को बीईओ का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। इस फैसले को रवि कुमार ने कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह बात आई कि बीईओ का पद एक प्रशासनिक पद है और स्कूल शिक्षा विभाग के 2026 के भर्ती नियमों के तहत इस पद को केवल तय नियमों से ही भरा जा सकता है। नियमों के मुताबिक बीईओ के 75 फीसदी पद सहायक खंड शिक्षा अधिकारियों को प्रमोट करके और बचे हुए 25 फीसदी पद योग्य प्राचार्यों से ही भरे जा सकते हैं।
व्याख्याता को जिम्मेदारी देना सेवा नियमों का सीधा उल्लंघन
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जिन्हें बीईओ का प्रभार दिया गया था, वे मूल रूप से एक व्याख्याता यानी शिक्षक हैं। उन्हें स्कूल में केवल प्रभारी प्राचार्य का अतिरिक्त काम सौंपा गया था, जिससे वे प्रशासनिक अधिकारी नहीं बन जाते। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि एक शिक्षक को बीईओ जैसे बड़े दफ्तर का काम सौंपना सीधे तौर पर सेवा नियमों और शिक्षा के अधिकार कानून की मूल भावना के खिलाफ है। अदालत के इस फैसले के बाद अब शिक्षा विभाग में शिक्षकों को दफ्तरों में अटैच करने की व्यवस्था पर रोक लगेगी और बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दिया जा सकेगा।