बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की महत्वाकांक्षी भारतनेट फेज-2 परियोजना, जिसका उद्देश्य राज्य की 6 हजार ग्राम पंचायतों को हाई-स्पीड इंटरनेट से जोड़ना था, अब एक बड़े कानूनी विवाद में फंस गई है। करीब 3056 करोड़ रुपये की इस परियोजना को लेकर टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड और छत्तीसगढ़ इन्फोटेक प्रमोशन सोसायटी (चिप्स) के बीच चल रहा विवाद अब हाईकोर्ट की दहलीज पर है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की पीठ ने मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
विवाद की मुख्य वजहें
टाटा प्रोजेक्ट्स ने अपनी याचिका में परियोजना में देरी के लिए राज्य सरकार और चिप्स को जिम्मेदार ठहराया है। कंपनी के मुख्य आरोप निम्नलिखित हैं:
- अनुमतियों में देरी: खुदाई और केबल बिछाने के लिए आवश्यक अनुमतियां समय पर नहीं मिलीं।
- भुगतान का संकट: किए गए कार्यों का भुगतान समय पर नहीं किया गया और एकतरफा जुर्माना लगाया गया।
- बैंक गारंटी: कंपनी की बैंक गारंटी भुना ली गई, जिससे उसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
- अनुबंध की समाप्ति: सहयोग की कमी का हवाला देते हुए टाटा ने मई 2025 में अनुबंध समाप्त कर दिया।
कानूनी पेच: ट्रिब्यूनल बनाम अधिकरण
मामले में सबसे बड़ा कानूनी सवाल मध्यस्थता की प्रक्रिया को लेकर है। दोनों पक्षों के तर्क इस प्रकार हैं:
| पक्ष | मुख्य तर्क |
| टाटा प्रोजेक्ट्स | विवाद सुलझाने के लिए ‘मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996’ के तहत ट्रिब्यूनल बने। राज्य अपना दूसरा पंच नियुक्त करे। |
| छत्तीसगढ़ सरकार | यह एक ‘वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट’ है, इसलिए विवाद का निपटारा ‘छत्तीसगढ़ मध्यस्थम् अधिकरण अधिनियम, 1983’ के तहत ही होना चाहिए। |
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि टाटा प्रोजेक्ट्स एक कंसोर्टियम (साझेदारी) के रूप में काम कर रही थी, इसलिए वह अन्य साझेदारों की सहमति के बिना अकेले याचिका दायर नहीं कर सकती।
केंद्र सरकार की भूमिका
भारतनेट एक केंद्रीय योजना है, जिसमें अधिकांश राशि केंद्र सरकार द्वारा दी जाती है। टाटा का दावा है कि केंद्र इस परियोजना की निगरानी में सीधे तौर पर शामिल था, इसलिए वह भी इस विवाद का एक पक्ष है।
अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि इस अरबों रुपये के विवाद का निपटारा किस कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा। इस फैसले का सीधा असर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट विस्तार की गति पर भी पड़ सकता है।