-सुभाष मिश्र
साहित्य अकादमी और गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त आयोजन में वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ कुलपति द्वारा किया गया सार्वजनिक अपमान न सिर्फ निंदनीय है, बल्कि यह विश्वविद्यालयी गरिमा और साहित्यिक संवाद पर सीधा हमला है। इस व्यवहार की कड़े शब्दों में भर्त्सना की जानी चाहिए। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति सत्ता के मद में चूर होकर आमंत्रित लेखक से बदतमीज़ी करता है और असहमति को ‘अनुशासनहीनता’ घोषित कर देता है।
जिस परिसंवाद का विषय ‘समकालीन हिंदी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ’ जैसा गंभीर और विचारोत्तेजक था, वहां अध्यक्षीय वक्तव्य का चुटकुलों और सतही टिप्पणियों में बदल जाना अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण था। साहित्यिक विमर्श के मंच पर इस तरह की हल्कापन भरी भाषा न केवल विषय का अपमान है, बल्कि श्रोताओं और वक्ताओं दोनों के समय और बौद्धिक श्रम का भी अवमूल्यन है। इससे भी अधिक शर्मनाक यह रहा कि जब एक वरिष्ठ साहित्यकार ने अत्यंत संयत स्वर में केवल इतना कहा कि विषय पर बात की जाए, तो कुलपति का अहंकार भड़क उठा।
मंच से ही लेखक को अपमानित किया गया। ‘किसने बुलायाÓ जैसे सवाल उछाले गए और अंतत: उन्हें सभागृह छोडऩे को कहा गया। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए विचलित करने वाला है। असहमति को सुनने के बजाय उसे बाहर का रास्ता दिखा देना आज की संस्थागत प्रवृत्ति का खतरनाक संकेत है। यह कोई व्यक्तिगत टकराव नहीं, बल्कि उस सोच का प्रदर्शन है जिसमें सवाल पूछने वाला ही अपराधी बना दिया जाता है।
कुलपति का पद ज्ञान, संवाद और सहिष्णुता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन यहां कुर्सी ने व्यक्ति को तानाशाह बना दिया। विश्वविद्यालयों में कुलपति कभी वैचारिक नेतृत्व के प्रतीक हुआ करते थे, आज कई जगह वे सत्ता के छोटे-छोटे प्रतिनिधि बनते जा रहे हैं, जिन्हें लगता है कि सवाल पूछना अनुशासनहीनता है और सिर झुकाकर सुनना ही शिष्टाचार। यही सोच विश्वविद्यालयों को धीरे-धीरे बौद्धिक रूप से खोखला कर रही है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि वहां उपस्थित अधिकांश लेखक और बुद्धिजीवी चुप बैठे रहे। होना यह चाहिए था कि इस बत्तमीज़ी के बाद पूरा सभागार प्रतिरोध में खड़ा होता। कार्यक्रम का तत्काल बहिष्कार किया जाता। लेकिन सामूहिक मौन ने कुलपति के व्यवहार को और वैधता दे दी। यह चुप्पी भी उतनी ही निराशाजनक और अपमानजनक है जितना स्वयं वह व्यवहार।
इस कार्यक्रम में महेश कटारे और जया जादवानी जैसे नामी कथाकार भी उपस्थित थे। ऐसे वरिष्ठ और स्थापित लेखकों से यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि वे इस अपमान के क्षण में प्रतिरोध का नेतृत्व करते। लेकिन उनका और कुछ अन्य लेखकों का बैठे रहना साहित्य जगत के लिए एक असहज और पीड़ादायक प्रश्न छोड़ गया है। आज साहित्यिक दुनिया में इस चुप्पी की आलोचना हो रही है, और यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या साहित्यकार अब केवल मंच साझा करने तक सीमित रह गए हैं, या वे मूल्य और मर्यादा के लिए खड़े होने का साहस भी रखते हैं?
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब राज्य में सरकार और समाज साहित्य-कला के प्रति संवेदनशीलता दिखाने का दावा करते हैं। साहित्य महोत्सवों का आयोजन, वरिष्ठ रचनाकारों के प्रति सार्वजनिक सम्मान और सांस्कृतिक पहलों का प्रचार ये सब इसकी गवाही देते हैं। ऐसे में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति का यह आचरण एक गहरे विरोधाभास को उजागर करता है और बताता है कि संस्थानों के भीतर गरिमा कितनी तेजी से गिर रही है।
यह सवाल केवल एक कुलपति के आचरण का नहीं है, बल्कि पूरे साहित्यिक और अकादमिक समाज की जिम्मेदारी का है। अगर लेखक, प्राध्यापक और बुद्धिजीवी ही अपमान के क्षण में चुप रह जाएंगे, तो फिर सत्ता को मर्यादा की याद कौन दिलाएगा? असहमति का सम्मान ही साहित्य और लोकतंत्र की बुनियाद है। जब उसी असहमति को ‘अनुशासनÓ के नाम पर कुचला जाएगा, तो विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र नहीं, अहंकार के केंद्र बनकर रह जाएंगे।
इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि अब सवाल केवल यह नहीं है कि कुलपति ने क्या कहा, बल्कि यह है कि साहित्य ने उस अपमान के जवाब में क्या किया—और क्या नहीं किया। यदि भविष्य में ऐसे आचरण को रोकना है, तो अगली बार जवाब केवल शब्दों में नहीं, सामूहिक प्रतिरोध में दिया जाना चाहिए।