कागजों में मौत, अदालत में जिंदगी
बॉलीवुड की चर्चित फिल्म कागज में एक जीवित व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया जाता है और वह अपनी पहचान साबित करने के लिए वर्षों तक संघर्ष करता है। अब ऐसी ही कहानी छत्तीसगढ़ में हकीकत बनकर सामने आई है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की गंभीर लापरवाही का दस्तावेज है। जशपुर जिले के ग्राम गजमा के कोटवार मरियानुस एक्का को सरगुजा संभाग के कमिश्नर ने 2018 में अपने आदेश में मृत मानते हुए उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी। हैरानी की बात यह है कि जिस व्यक्ति को सरकारी कागजों में मृत घोषित किया गया, वही अपने अधिकार की लड़ाई लड़ते हुए हाईकोर्ट पहुंच गया। अदालत में उसकी मौजूदगी ने सरकारी रिकॉर्ड की पूरी सच्चाई उजागर कर दी। बाद में राज्य शासन ने भी स्वीकार किया कि मरियानुस एक्का जीवित हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में कमिश्नर का आदेश रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि किसी जीवित व्यक्ति को मृत मानकर दिया गया फैसला कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता। अदालत ने मामले की दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए हैं। यह प्रकरण केवल एक कर्मचारी की नौकरी का नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही का आईना है। यदि बिना सत्यापन किसी नागरिक को कागजों में मृत घोषित किया जा सकता है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। डिजिटल और सुशासन के दौर में ऐसी चूक यह बताती है कि तकनीक से अधिक जरूरी जिम्मेदारी और तथ्यपरक जांच है। आखिर, सरकारी कागजों में किसी की जिंदगी खत्म कर देना सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है।
नल तो पहुंचे, पानी कब पहुंचेगा?
जल जीवन मिशन को देश की सबसे महत्वाकांक्षी ग्रामीण योजनाओं में गिना जाता है। छत्तीसगढ़ में भी वर्षों तक इसकी उपलब्धियों के दावे किए गए, लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट ने यह संकेत दिया है कि कागजी सफलता और जमीनी हकीकत के बीच अभी लंबी दूरी बाकी है। रिपोर्ट बताती है कि हजारों करोड़ खर्च होने के बावजूद योजना अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी। हजारों जल योजनाएं स्वीकृत हुईं, लेकिन बहुत कम पूरी हो पाईं। कई गांवों को हर घर जल का प्रमाणपत्र मिल गया, जबकि वहां पाइपलाइन या नियमित जलापूर्ति तक पूरी नहीं थी। इससे केवल आंकड़ों की विश्वसनीयता ही नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होते हैं। सबसे बड़ी चिंता योजना निर्माण की प्रक्रिया को लेकर है। यदि ग्राम स्तर की कार्ययोजना और जल सुरक्षा की तैयारी के बिना परियोजनाएं शुरू होंगी, तो संसाधनों का पूरा लाभ मिलना कठिन होगा। यही वजह है कि फंड मिलने में भी देरी हुई और कई योजनाएं अधूरी रह गईं। पानी की गुणवत्ता जांचने वाली प्रयोगशालाओं और सौर ऊर्जा आधारित योजनाओं में भी कमियां सामने आई हैं। यह रिपोर्ट किसी योजना की विफलता का अंतिम प्रमाण नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाने का अवसर है। जल जीवन मिशन की सफलता केवल नल लगाने से नहीं मापी जा सकती। असली कसौटी यह है कि हर घर तक प्रतिदिन सुरक्षित और पर्याप्त पानी पहुंचे। यदि सीएजी की टिप्पणियों को गंभीरता से लेकर सुधार किए जाते हैं, तभी यह मिशन अपने वास्तविक उद्देश्य तक पहुंच पाएगा। आखिरकार, विकास का मूल्यांकन घोषणाओं से नहीं, लोगों के घरों तक पहुंचने वाली पानी की धार से होता है।
अंकों से आगे बढ़कर भरोसे की परीक्षा
राष्ट्रीय अपराध और अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम की ताजा रैंकिंग में छत्तीसगढ़ को 100 में 64.97 अंक मिले हैं। यह प्रदर्शन न तो बहुत खराब कहा जा सकता है और न ही संतोषजनक। यही वजह है कि रिपोर्ट सामने आते ही मुख्य सचिव विकास शील ने गृह विभाग की समीक्षा बैठक बुलाकर स्पष्ट संदेश दिया कि अब औसत प्रदर्शन स्वीकार्य नहीं होगा। रिपोर्ट का सकारात्मक पक्ष यह है कि प्रशासनिक सुधार और मेडिको-लीगल रिपोर्ट पोर्टल के क्रियान्वयन में राज्य ने पूरे अंक हासिल किए हैं। लेकिन दूसरी ओर कई महत्वपूर्ण मानकों पर कम अंक यह बताते हैं कि पुलिस व्यवस्था के डिजिटलीकरण और अपराध प्रबंधन में अभी काफी सुधार की जरूरत है। मुख्य सचिव ने जीरो एफआईआर को प्रभावी बनाने, ई-चार्जशीट प्रणाली को मजबूत करने, 60 और 90 दिनों की समय-सीमा में चालान पेश करने तथा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही और डिजिटल साक्ष्यों के बेहतर उपयोग पर जोर दिया है। ये केवल तकनीकी सुधार नहीं हैं, बल्कि न्याय प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तेज और नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में आवश्यक कदम हैं। किसी भी राज्य की कानून-व्यवस्था केवल अपराध के आंकड़ों से नहीं, बल्कि शिकायत दर्ज करने की सहजता, जांच की गुणवत्ता और समय पर न्याय दिलाने की क्षमता से आंकी जाती है। इसलिए यह स्कोर महज एक संख्या नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र की कार्यक्षमता का आईना है। यदि समीक्षा बैठकों के निर्देश जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू होते हैं, तो अगली रैंकिंग में अंक ही नहीं, आम नागरिक का भरोसा भी बढ़ेगा। यही किसी भी सुधार की सबसे बड़ी सफलता होगी।
स्मार्ट मीटर पर सियासत या उपभोक्ताओं की चिंता?
रायपुर में स्मार्ट मीटर और बढ़े हुए बिजली बिलों को लेकर कांग्रेस ने नया अभियान शुरू किया है। स्मार्ट मीटर बदलो अभियानज् के जरिए पार्टी घर-घर जाकर उपभोक्ताओं से आवेदन भरवा रही है और उन्हें बिजली विभाग तक पहुंचाने की तैयारी में है। यह कदम केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उन शिकायतों को संगठित रूप देने की कोशिश भी है, जो लंबे समय से बिजली उपभोक्ताओं के बीच सुनाई देती रही हैं। कांग्रेस का आरोप है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद कई उपभोक्ताओं के बिजली बिल अप्रत्याशित रूप से बढ़ गए हैं और उनकी शिकायतों का संतोषजनक समाधान नहीं हो रहा। दूसरी ओर, बिजली विभाग का पक्ष यह रहा है कि स्मार्ट मीटर बिजली की वास्तविक खपत का अधिक सटीक आकलन करते हैं और बढ़े हुए बिलों के पीछे कई तकनीकी या उपभोग संबंधी कारण हो सकते हैं। ऐसे में विवाद का समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तथ्यों और पारदर्शी जांच से ही संभव है। यदि बड़ी संख्या में उपभोक्ता वास्तव में अधिक बिल आने की शिकायत कर रहे हैं, तो विभाग को प्रत्येक मामले की तकनीकी जांच कर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। वहीं यदि शिकायतें निराधार हैं, तो उपभोक्ताओं को भी पारदर्शी तरीके से पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। स्मार्ट तकनीक का उद्देश्य सुविधा और पारदर्शिता बढ़ाना है, अविश्वास पैदा करना नहीं। इसलिए इस पूरे विवाद का सबसे बेहतर समाधान राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि तथ्यों पर आधारित संवाद और निष्पक्ष जांच है। आखिरकार, स्मार्ट मीटर तभी सफल माने जाएंगे जब उपभोक्ताओं को उनकी सटीकता पर भरोसा होगा, न कि केवल उनके नाम में स्मार्ट शब्द जुड़ा होने से।