-सुभाष मिश्र
देश में इन दिनों युवाओं और छात्रों के सवालों को लेकर जिस तरह का आंदोलन खड़ा हुआ है, उसकी शुरुआत भले ही परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से हुई हो, लेकिन अब धीरे-धीरे इसका रंग बदलता दिखाई दे रहा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी आवाज अब संसद से लेकर प्रधानमंत्री आवास तक पहुंच चुकी है। इसके साथ ही छात्रों का सवाल राजनीति के उस मैदान में प्रवेश कर गया है, जहां मुद्दे अक्सर पीछे रह जाते हैं और झंडे आगे निकल जाते हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने आंदोलन की शुरुआत की, युवाओं को जोड़ा और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए, लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन बड़ा हुआ, वैसे-वैसे राजनीतिक दल भी इसमें शामिल होते गए। कांग्रेस आई, समाजवादी पार्टी आई, आम आदमी पार्टी आई और पूरा इंडिया गठबंधन छात्रों के समर्थन में खड़ा दिखाई देने लगा। लोकतंत्र में इसमें कोई बुराई भी नहीं है। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है और जब सवाल लाखों युवाओं के भविष्य का हो तो विपक्ष का चुप रहना भी उचित नहीं होगा। लेकिन समस्या वहां शुरू होती है, जहां छात्रों के सवाल से ज्यादा इस बात की होड़ मच जाए कि उनके आंदोलन का असली नेता कौन है।
अब हालत यह है कि नीट की परीक्षा, पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की चर्चा से ज्यादा राहुल गांधी, प्रधानमंत्री आवास, पुलिस की बैरिकेडिंग, हिरासत और भाजपा-कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव की चर्चा होने लगी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्ष के नेताओं का प्रधानमंत्री आवास की तरफ बढऩा, पुलिस का उन्हें रोकना और उसके बाद हिरासत में लिया जाना पूरे आंदोलन का नया राजनीतिक मोड़ बन गया। सरकार की तरफ से समझाने की कोशिश हुई, विपक्ष अपनी मांगों पर अड़ा रहा और फिर जो होना था वही हुआ। कैमरे छात्रों से हटकर नेताओं की तरफ घूम गए। अब सवाल यह नहीं रहा कि परीक्षा व्यवस्था कैसे सुधरेगी, सवाल यह हो गया कि राहुल गांधी को क्यों रोका गया और प्रधानमंत्री आवास तक प्रदर्शन ले जाना उचित था या नहीं।
यही वह जगह है जहां छात्रों को सबसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि राजनीति का चरित्र ही कुछ ऐसा है कि मुद्दा किसी का होता है, झंडा किसी और का हो जाता है और आखिर में फायदा कोई तीसरा उठा ले जाता है। प्रधानमंत्री आवास देश के सबसे संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों में से एक है और वहां तक किसी राजनीतिक प्रदर्शन को ले जाने पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विपक्ष को भी इस संवेदनशीलता को समझना चाहिए। विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन विरोध की भी एक मर्यादा और जगह होती है। दूसरी तरफ सरकार को भी यह समझना होगा कि हर प्रदर्शन को केवल राजनीतिक साजिश बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। देश के युवाओं में परीक्षा व्यवस्था को लेकर नाराजगी है और यह नाराजगी एक दिन में पैदा नहीं हुई है। प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी ने युवाओं के भरोसे को कमजोर किया है, इसलिए अगर छात्र सड़क पर उतरता है तो उसके पीछे केवल राजनीति खोजने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
राहुल गांधी के प्रदर्शन के बाद भाजपा भी अब सीधे राजनीतिक मुकाबले में उतरती दिखाई दे रही है। कांग्रेस ने देशभर में प्रदर्शन का ऐलान किया तो भाजपा ने भी कांग्रेस कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन की रणनीति बनाई। अलग-अलग शहरों में दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के आमने-सामने आने लगे, धक्का-मुक्की और मारपीट की घटनाएं सामने आने लगीं। अब जरा सोचिए कि जिस लड़ाई की शुरुआत छात्रों की परीक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए हुई थी, उसमें भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता एक-दूसरे की गाडिय़ों के शीशे तोडऩे लगें तो इससे किस छात्र का भविष्य सुधरेगा? क्या इससे पेपर लीक बंद हो जाएगा?
क्या परीक्षा प्रणाली सुरक्षित हो जाएगी? क्या दोषियों को सजा मिल जाएगी? शायद नहीं। लेकिन राजनीति जरूर गर्म हो जाएगी और हमारे देश की राजनीति को गर्म रखने के लिए एक मुद्दा चाहिए, वह नीट हो या कोई और, इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। इस पूरे आंदोलन में कॉकरोच जनता पार्टी की भूमिका और आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। प्रदर्शन में इस्तेमाल की गई भाषा, पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार, पत्थरबाजी और कुछ संदिग्ध लोगों की मौजूदगी जैसे आरोप गंभीर हैं और इनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि कोई छात्र आंदोलन में किताब की जगह बैग में पत्थर लेकर आता है तो सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए। यदि कोई असामाजिक तत्व युवाओं की भीड़ में घुसकर पुलिस पर हमला करता है या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो आंदोलन का नेतृत्व करने वालों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे लोगों से स्पष्ट दूरी बनाएं। आंदोलन लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन अराजकता लोकतंत्र की ताकत नहीं हो सकती। प्रदर्शन का अधिकार संविधान देता है, पत्थर चलाने का अधिकार कोई संविधान नहीं देता। इसी तरह पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन हर आंदोलनकारी छात्र को उपद्रवी मान लेना भी उचित नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि अक्सर संसद का सत्र शुरू होने के आसपास दिल्ली में आंदोलनों की सक्रियता अचानक क्यों बढ़ जाती है। क्या यह केवल संयोग है या इसके पीछे राजनीतिक रणनीति भी होती है, इसका जवाब आंदोलन चलाने वालों और राजनीतिक दलों को देना चाहिए। जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू होता है, सोशल मीडिया पर माहौल बनता है, विपक्ष सड़क पर उतरता है और फिर वही मुद्दा संसद के भीतर सरकार को घेरने का हथियार बन जाता है। लोकतंत्र में यह सब गलत भी नहीं है, लेकिन गलत तब होता है जब मूल मुद्दा ही पीछे छूट जाए। आज भी यही खतरा दिखाई दे रहा है। छात्र परीक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए निकला था, लेकिन अब उसे शायद खुद समझ नहीं आ रहा होगा कि उसकी लड़ाई नीट की है या भाजपा और कांग्रेस की।
देश के एक सामान्य छात्र को वास्तव में किसी राजनीतिक दल की लड़ाई से मतलब नहीं है। वह न भाजपा का झंडा चाहता है, न कांग्रेस का, न समाजवादी पार्टी का और न किसी दूसरे दल का। उसे केवल एक ऐसी परीक्षा व्यवस्था चाहिए, जिसमें उसकी मेहनत सुरक्षित रहे। एक गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चे की पढ़ाई पर अपनी पूरी जमा पूंजी लगा देता है। कोई पिता जमीन बेचता है, कोई मां अपने गहने गिरवी रखती है और कोई परिवार कर्ज लेकर बच्चे को कोटा, दिल्ली या किसी दूसरे शहर में पढऩे भेजता है। बच्चा चार-पांच साल मेहनत करता है और फिर एक सुबह खबर आती है कि पेपर लीक हो गया। ऐसे में उस परिवार पर क्या गुजरती होगी, इसे दिल्ली के वातानुकूलित राजनीतिक कार्यालयों में बैठकर समझना आसान नहीं है।
छात्रों का गुस्सा असली है, उनकी बेचैनी असली है और उनके सवाल भी असली हैं। इन्हें केवल राजनीति कहकर खारिज करना सरकार की भूल होगी और इन्हें अपनी राजनीति का हथियार बना लेना विपक्ष की भूल होगी। प्रधानमंत्री ने साफ कहा है कि परीक्षा लीक करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा, परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाया जाएगा और छात्रों के भविष्य के साथ समझौता नहीं होगा। यह भरोसा जरूरी है, लेकिन अब इस भरोसे को जमीन पर दिखाई भी देना चाहिए। देश का युवा अब केवल भाषण नहीं चाहता, वह परिणाम चाहता है। वह चाहता है कि अगली बार परीक्षा देने जाए तो उसके मन में यह संदेह न हो कि कहीं प्रश्नपत्र पहले ही किसी दूसरे के मोबाइल में तो नहीं पहुंच गया। भरोसा प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं लौटता, भरोसा व्यवस्था में बदलाव से लौटता है।
विपक्ष को भी यह समझना होगा कि छात्रों के कंधे पर रखकर राजनीतिक बंदूक चलाना आसान है, लेकिन इससे छात्रों की समस्या हल नहीं होती। सरकार को घेरना है तो संसद में घेरिए, सवाल पूछिए, आंकड़े मांगिए, जिम्मेदारी तय कराइए और परीक्षा सुधार का रोडमैप मांगिए। सड़क पर भी आंदोलन करिए, यह लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आंदोलन को भाजपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई मत बनने दीजिए। सरकार को भी यह समझना होगा कि हर आंदोलन के पीछे विपक्ष नहीं होता, कभी-कभी व्यवस्था की खामियां भी आंदोलन पैदा करती हैं। हर सवाल साजिश नहीं होता और हर प्रदर्शनकारी देश विरोधी नहीं होता।
आज सबसे बड़ा खतरा यही है कि नीट और छात्रों का आंदोलन कहीं राहुल गांधी बनाम सरकार की लड़ाई में न बदल जाए। पेपर लीक का सवाल कहीं भाजपा बनाम कांग्रेस के शोर में दब न जाए।
राजनीति का चरित्र बड़ा विचित्र है। वह पहले किसी मुद्दे को गोद लेती है, फिर उसे बड़ा करती है, उस पर भाषण देती है, उसके नाम पर सड़क पर उतरती है और जब राजनीतिक जरूरत पूरी हो जाती है तो उसे वहीं छोड़ देती है, जहां से उठाया था। छात्र फिर अपनी किताब लेकर कोचिंग चला जाता है, नेता अगला मुद्दा खोजने निकल जाते हैं और व्यवस्था फिर अपनी पुरानी चाल से चलने लगती है।
सरकार, विपक्ष और आंदोलन का नेतृत्व करने वालों तीनों को समझदारी दिखानी होगी। छात्रों की लड़ाई को छात्रों के सवालों तक रहने देना होगा। पेपर लीक हुआ है तो दोषियों को पकडि़ए, व्यवस्था में कमजोरी है तो उसे सुधारिए, जिम्मेदारी तय करनी है तो कीजिए और संसद में बहस करनी है तो खुलकर कीजिए। लेकिन दिल्ली की सड़कों से लेकर देश के अलग-अलग शहरों तक भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को आमने-सामने खड़ा करके इस मुद्दे का समाधान नहीं निकलेगा। इस राजनीतिक कुश्ती में जीत चाहे सरकार की हो या विपक्ष की, अगर परीक्षा व्यवस्था नहीं सुधरी तो हार केवल छात्र की होगी और छात्र की हार केवल एक परीक्षा की हार नहीं होती, वह देश के भविष्य और व्यवस्था पर उसके भरोसे की हार होती है। यही इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल है और यही चिंता भी कि कहीं नेताओं की लड़ाई में छात्रों की आवाज फिर एक बार शोर बनकर न रह जाए।