न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी

-सुभाष मिश्र

देश में इन दिनों आंदोलन का एक नया व्याकरण लिखा जा रहा है। न कोई बड़ा संगठन, न स्थापित राजनीतिक दल और न ही वर्षों पुराना नेतृत्व। सोशल मीडिया से निकला युवाओं का गुस्सा सड़क तक पहुंचा और देखते-देखते नीट सहित प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का सवाल राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया। इसी असंतोष की जमीन से निकली कथित कॉकरोच जनता पार्टी और उससे जुड़े आंदोलनकारियों ने सरकार के सामने सवाल खड़े किए। सोनम वांगचुक जैसे चर्चित सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध और अनशन से लेकर जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन तक घटनाओं की एक ऐसी श्रृंखला बनी, जिसने सरकार, विपक्ष और आंदोलन तीनों को आमने-सामने ला खड़ा किया है।
अब संसद का सत्र चल रहा है तो जाहिर है कि सड़क की आवाज संसद तक पहुंचेगी और विपक्ष इसे सरकार को घेरने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करेगा। राजनीति में कोई भी मुद्दा केवल मुद्दा नहीं रहता, उसमें सत्ता की संभावना भी तलाशी जाती है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के घायल होने के आरोपों ने विपक्ष को एक और हथियार दे दिया है। आंदोलन के समर्थन में बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग मैदान में हैं। ऐसे में असली सवालों के साथ राजनीतिक रोटियां सेंकने का चूल्हा भी गर्म होना स्वाभाविक है। अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर भी अटकलों का बाजार गर्म है। अमित शाह से उनकी मुलाकात हुई तो राजनीतिक पंडितों ने उसमें भी इस्तीफा, विभाग परिवर्तन और न जाने कितने संकेत खोज लिए। लेकिन, नरेंद्र मोदी और भाजपा की राजनीतिक कार्यशैली को जिसने पिछले वर्षों में देखा है, वह जानता है कि विपक्ष के कहने भर से किसी मंत्री की कुर्सी चली जाए, इसकी संभावना बहुत कम है। क्योंकि एक इस्तीफा केवल एक मंत्री का इस्तीफा नहीं होता, वह विपक्ष को संदेश भी देता है कि दबाव बढ़ाओ और विकेट गिराओ। भाजपा शायद ही ऐसी परंपरा शुरू करना चाहेगी। हां, जरूरत महसूस हुई तो चेहरे या विभाग बदलने का रास्ता जरूर निकाला जा सकता है।
सरकार को यह भी समझना होगा कि हर सवाल को विपक्ष की साजिश बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। प्रतियोगी परीक्षाओं में यदि गड़बड़ी के सवाल उठते हैं तो उनका जवाब देना ही होगा। लाखों युवा वर्षों की मेहनत और परिवार की जमा-पूंजी लगाकर परीक्षाओं में बैठते हैं। उनके भरोसे में सेंध लगती है तो उसका नुकसान किसी एक सरकार या पार्टी को नहीं, पूरी व्यवस्था को होता है। दूसरी तरफ आंदोलनकारियों को भी यह समझना होगा कि आंदोलन जितना लंबा चलता है, उसके आसपास राजनीति उतनी ही तेजी से जमा होने लगती है। फिर मुद्दा पीछे छूट जाता है और चेहरे आगे आ जाते हैं। सरकार अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लग जाती है, विपक्ष अपनी राजनीति चमकाने में और आंदोलनकारी अपनी जमीन बचाने में। अंत में जिसके नाम पर पूरी लड़ाई शुरू हुई थी, वही युवा कहीं भीड़ में खड़ा रह जाता है।
फिलहाल सरकार झुकने के मूड में दिखाई नहीं देती, विपक्ष पीछे हटने वाला नहीं है और आंदोलनकारियों ने भी मोर्चा खोल रखा है। ऐसे में कहीं पूरी कहानी उसी पुरानी कहावत पर खत्म न हो जाए—न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। लोकतंत्र में सरकार का हर मांग के सामने घुटने टेकना जरूरी नहीं है, लेकिन जनता की आवाज सुनना उसकी जिम्मेदारी जरूर है और आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार को झुकाना नहीं, व्यवस्था को सुधारना होना चाहिए। वरना संसद में शोर होता रहेगा, जंतर-मंतर पर नारे लगते रहेंगे, पुलिस बैरिकेड लगाती रहेगी और देश का युवा अपनी परीक्षा का प्रश्नपत्र हाथ में लेकर यही पूछता रहेगा मेहनत हमारी है, भविष्य हमारा है, तो व्यवस्था की गलतियों की कीमत भी आखिर हम ही क्यों चुकाएं?

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