जम्मू-कश्मीर की सरकारी और प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं में अब किताबों को लेकर कड़ी निगरानी शुरू हो गई है। कश्मीर यूनिवर्सिटी और शिक्षा विभाग ने अपने सभी विभागों और स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे अपनी लाइब्रेरी की किताबों की गहन समीक्षा करें। आदेश में साफ कहा गया है कि यदि किसी किताब में आपत्तिजनक, राष्ट्र-विरोधी या छात्रों के लिए अनुपयुक्त कंटेंट मिलता है, तो उसे तुरंत हटा दिया जाए।

लाइब्रेरी से क्यों हटाई जा रही हैं किताबें?
यह पूरा विवाद पिछले हफ्ते सामने आया जब एक सरकारी स्कूल की लाइब्रेरी में मिली किताबों को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ गई। इन किताबों में कश्मीर को भारत-अधिकृत या भारत-नियंत्रित बताया गया था। इसके साथ ही, प्रतिबंधित जेकेएलएफ (JKLF) के संस्थापक मकबूल भट को शहीद के रूप में पेश किया गया था। भट को एक सीआईडी अधिकारी की हत्या के आरोप में 1984 में फांसी दी गई थी। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने इस पर संज्ञान लेते हुए दो विवादास्पद किताबों को वापस लेने का आदेश दिया था।
स्कूलों को 19 जुलाई तक रिपोर्ट देनी होगी
स्कूल शिक्षा निदेशक नसीर अहमद वानी ने एक नया आदेश जारी किया है। इसमें कहा गया है कि स्कूल प्रमुखों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी किताब में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला या राष्ट्रीय हित को नुकसान पहुंचाने वाला कोई भी मटेरियल न हो। सभी स्कूलों को 19 जुलाई तक एक रिपोर्ट जमा करनी होगी, जिसमें यह प्रमाणित करना होगा कि उन्होंने सभी किताबों की समीक्षा पूरी कर ली है और कोई भी आपत्तिजनक किताब लाइब्रेरी में नहीं है।
नेताओं में छिड़ी जुबानी जंग
किताबों की इस समीक्षा को लेकर घाटी में सियासत भी गरमा गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी ने इस फैसले को चिंताजनक बताया है और कहा है कि किताबों को हटाने से इतिहास नहीं बदलता। वहीं पीडीपी विधायक वहीद पारा ने इसे इतिहास को मिटाने की प्रक्रिया बताया है। दूसरी ओर, रिसर्च एंड एडवोकेसी ग्रुप ने इस मामले की शिकायत नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स से की है। उनका कहना है कि स्कूली बच्चों को ऐसे अलगाववादी नैरेटिव पढ़ाना बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है।
क्या आप जानते हैं कि शिक्षा के अधिकार कानून (RTE Act) के तहत स्कूली पाठ्यक्रम और किताबों के चयन के क्या नियम होते हैं?