नई दिल्ली। न्यायपालिका पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर विवादों में रही एनसीईआरटी की कक्षा 8वीं की सोशल साइंस की किताब आखिरकार नए संशोधनों के साथ दोबारा जारी कर दी गई है। लेकिन इस बार सिर्फ न्यायपालिका वाले विवादित हिस्से को ही नहीं सुधारा गया है, बल्कि इतिहास के पन्नों में भी कई बड़े और महत्वपूर्ण फेरबदल किए गए हैं। इस संशोधित किताब का नाम एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड रखा गया है। इसमें 1947 के भारत विभाजन पर कांग्रेस के स्टैंड को बदला गया है, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संदर्भ से हिटलर का नाम हटा दिया गया है, और वीर सावरकर की स्वराज की मांग को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हुआ बड़ा प्रशासनिक बदलाव
यह पूरा विवाद इसी साल फरवरी में तब शुरू हुआ था जब कक्षा 8वीं की इस किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और मुकदमों के लंबित होने को लेकर कुछ गंभीर टिप्पणियां की गई थीं। यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। कोर्ट ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए किताब की छपाई और इसके डिजिटल वितरण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद एनसीईआरटी ने अदालत से माफी मांगते हुए बाजार और डिजिटल प्लेटफॉर्म से सभी किताबें वापस ले ली थीं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इस कमेटी ने अब अध्याय 4 यानी द रोल ऑफ द जुडिशियरी इन सोसाइटी को पूरी तरह से दोबारा लिखा है। नए चैप्टर में विवादित हिस्सों को हटाकर जनहित याचिका, ट्रिब्यूनल्स और वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्र जैसी नई व्यावहारिक जानकारियां जोड़ी गई हैं। वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्र का सीधा मतलब होता है कि अदालत के बाहर आपसी सहमति और मध्यस्थता से झगड़ों को सुलझाना, ताकि अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम हो सके।
इतिहास के पन्नों में फेरबदल: विभाजन पर कांग्रेस का बदला रुख
किताब के इतिहास अध्याय इंडियाज लॉन्ग रोड टू इंडिपेंडेंस में भारत के विभाजन को लेकर बहुत बड़ा बदलाव किया गया है। नई किताब में अब यह लिखा गया है कि विभाजन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा भी व्यापक रूप से विरोध किया गया था। इसके साथ ही यह सवाल भी जोड़ा गया है कि क्या विभाजन को स्वीकार करना ही एकमात्र रास्ता था, जो आज भी एक बड़े बहस का विषय है।
पुरानी किताब से उस वाक्य को पूरी तरह हटा दिया गया है जिसमें लिखा था कि विभाजन के दौरान जब उपमहाद्वीप में सांप्रदायिक कत्लेआम मच रहा था, तब कांग्रेस नेता बेबस और लाचार थे। पुरानी थ्योरी में पहले यह पढ़ाया जाता था कि हिंदू और मुस्लिम नेताओं के मतभेदों का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने भारत के विभाजन का फैसला किया था। हालांकि महात्मा गांधी और अधिकांश कांग्रेस नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया था, लेकिन अंत में उन्होंने इसे एकमात्र रास्ता मानकर स्वीकार कर लिया था।
नेताजी के संदर्भ से हटा हिटलर और नाजीवाद
आजाद हिंद फौज के गठन को लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े संदर्भों में भी शब्दों को बदला गया है। नई किताब में अब केवल इतना कहा गया है कि नेताजी ने सेना खड़ी करने के लिए ब्रिटिश विरोधी ताकतों से समर्थन मांगा था। पुरानी किताब में साफ तौर पर लिखा था कि नेताजी ने हिटलर से मदद मांगी थी। पुरानी किताब में हिटलर को एक ऐसे तानाशाह के रूप में परिभाषित किया गया था जिसकी नस्लवादी नाजी विचारधारा और विस्तारवादी लक्ष्यों के कारण दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ था। अब नए एडिशन से हिटलर और नाजी विचारधारा के ये सारे संदर्भ हटा दिए गए हैं।
इसके साथ ही संशोधित पाठ्यक्रम में देश की आजादी के आंदोलनों का दायरा बढ़ाते हुए स्वतंत्रता सेनानी वी.डी. सावरकर के योगदान को भी जोड़ा गया है। किताब में अब यह विशेष जिक्र मिलता है कि साल 1925 में वी.डी. सावरकर द्वारा भी इसी तरह की स्वराज की मांग उठाई गई थी। इस तरह से देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को अधिक व्यापक रूप देने का प्रयास किया गया है।