-सुभाष मिश्र
किसी सभ्यता की पहचान केवल उसके स्मारकों से नहीं होती, बल्कि उन आवाज़ों से होती है जो उसकी लोक स्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखती है।
छत्तीसगढ़ की लोक चेतना आज पहले से कहीं अधिक मौन है। पंडवानी की वह बुलंद आवाज, जिसने महाभारत को गांव की चौपाल से लेकर पेरिस, लंदन, मॉरीशस और दुनिया के अनेक प्रतिष्ठित मंचों तक जीवंत कर दिया था, अब हमेशा के लिए शांत हो गई है। पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन केवल एक महान लोक कलाकार का जाना नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की उस जीवंत वाचिक परंपरा की अपूरणीय क्षति है, जिसने सदियों तक इतिहास, मिथक, संस्कृति और लोक स्मृति को अपनी स्वर-साधना के माध्यम से जीवित रखा।
उनका जाना इसलिए भी अधिक पीड़ादायक है क्योंकि यह ऐसे समय में हुआ है जब बाजार संस्कृति लोक संस्कृतियों को लगातार हाशिए पर धकेल रही है। डिजिटल मनोरंजन, त्वरित उपभोग और सोशल मीडिया की क्षणभंगुर दुनिया में लोककलाओं के लिए स्थान लगातार सिकुड़ता जा रहा है। ऐसे दौर में तीजन बाई का निधन केवल एक शोक समाचार नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है—क्या हम अपनी लोक स्मृतियों को बचा पाएंगे?
तीजन बाई का जीवन स्वयं किसी महाकाव्य से कम नहीं था। दुर्ग जिले के गनियारी गांव के एक अत्यंत साधारण पारधी परिवार में जन्मी वह बच्ची कभी विद्यालय नहीं जा सकी। बचपन में अपने नाना बृजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनते-सुनते पूरा आख्यान उनकी स्मृति में उतर गया। बारह वर्ष की उम्र में विवाह, सामाजिक रूढिय़ां, जातीय बहिष्कार, आर्थिक अभाव, टूटते वैवाहिक संबंध और अपमान—जीवन ने उन्हें संघर्ष का हर अध्याय पढ़ाया। लेकिन इन सबके बीच उन्होंने अपने हाथ से तंबूरा कभी नहीं छोड़ा। जिस समाज में महिलाओं का मंच पर खड़े होकर गाना भी अस्वीकार्य माना जाता था, वहां उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली कपालिक शैली को अपनाकर इतिहास रच दिया। यह केवल एक कलात्मक प्रयोग नहीं था, बल्कि सामाजिक प्रतिरोध की उद्घोषणा थी। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा का सम्मान वही कर सकता है, जिसमें उसे बदलने का साहस भी हो।
तीजन बाई के हाथों में तंबूरा केवल एक वाद्य नहीं था। वह कभी भीम की गदा बन जाता था, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी द्रौपदी के खुले केश और कभी कुरुक्षेत्र का रथ। उनकी प्रस्तुति में महाभारत केवल सुनाई नहीं देती थी, वह आंखों के सामने घटित होती थी। भाषा की सीमाएं उनके अभिनय और स्वर के सामने अर्थहीन हो जाती थीं। यही कारण था कि फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, रूस, स्विट्जरलैंड, मॉरीशस और अनेक देशों के दर्शक, छत्तीसगढ़ी भाषा समझे बिना भी उनके प्रदर्शन से अभिभूत हो जाते थे।
उनकी प्रतिभा को सबसे पहले विश्वविख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना। उन्होंने तीजन बाई को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद तीजन बाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और अंतत: पद्म विभूषण से सम्मानित होने तक की यात्रा किसी एक कलाकार की सफलता नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा की प्रतिष्ठा की यात्रा थी। विडंबना यह भी है कि जो महिला कभी विद्यालय नहीं जा सकी, उसी को विश्वविद्यालयों ने मानद डॉक्टरेट प्रदान कर ज्ञान और लोकबुद्धि का सम्मान किया।
लेकिन तीजन बाई की सबसे बड़ी उपलब्धि पुरस्कार नहीं थे। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने लोककला को आत्मसम्मान दिलाया। उन्होंने यह स्थापित किया कि गांव की चौपाल से निकली कला भी विश्व रंगमंच पर उतनी ही गरिमा के साथ खड़ी हो सकती है, जितनी किसी शास्त्रीय परंपरा की कला।
उनका जीवन भारतीय स्त्री संघर्ष का भी अनुपम आख्यान है। जातीय बहिष्कार, सामाजिक उपेक्षा, घरेलू हिंसा, गरीबी और अपमान के बावजूद उन्होंने अपने लिए रास्ता स्वयं बनाया। उन्होंने किसी मंच से महिला सशक्तिकरण का भाषण नहीं दिया, लेकिन उनका पूरा जीवन स्त्री स्वाधीनता का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज बन गया।
अपने जीवन के अंतिम दिनों तक वे नई पीढ़ी को पंडवानी सिखाती रहीं। बीमारी से जूझते हुए भी उनकी चिंता अपनी नहीं, अपनी कला की थी। वह जानती थीं कि कलाकार एक दिन चला जाता है, लेकिन यदि परंपरा बची रहे तो उसकी आवाज़ अमर रहती है।
यहीं से हमारे समय का सबसे बड़ा प्रश्न शुरू होता है। क्या हमने सचमुच अपनी लोककलाओं को बचाने की कोई गंभीर तैयारी की है? तीजन बाई के निधन के साथ एक और असहज प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। क्या हम अपने महान लोक कलाकारों को सचमुच याद रखते हैं, या केवल उनके निधन के बाद कुछ दिनों की औपचारिक श्रद्धांजलियों तक ही सीमित रह जाते हैं? सोशल मीडिया के इस दौर में स्मृतियां भी ‘ट्रेंडÓ की तरह आती हैं और अगले ही सप्ताह किसी दूसरे विषय के शोर में गुम हो जाती हैं। सूचना का यह युग जितना तीव्र है, स्मृति का उतना ही अल्पायु भी होता जा रहा है।
यह प्रश्न इसलिए और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षितिज तक पहुंचाने वाले महान रंगकर्मी हबीब तनवीर की विरासत भी आज उस गरिमा के अनुरूप संरक्षित दिखाई नहीं देती, जिसकी वह अधिकारी है। जिस कलाकार ने छत्तीसगढ़ की लोक प्रतिभाओं को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया, उनके जीवन और सृजन से जुड़े स्थलों, दस्तावेजों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर अपेक्षित गंभीरता अब भी दिखाई नहीं देती। यह केवल एक कलाकार की उपेक्षा नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृति के प्रति समाज और व्यवस्था की उदासीनता का संकेत है।
अब यही चिंता तीजन बाई को लेकर भी है। क्या कुछ वर्षों बाद उनका नाम भी केवल पुरस्कारों की सूची, सरकारी विज्ञापनों, जयंती-पुण्यतिथि के औपचारिक आयोजनों और सोशल मीडिया पोस्टों तक सीमित होकर रह जाएगा? या फिर उनका तंबूरा नई पीढ़ी के हाथों में जीवित रहेगा? क्या पंडवानी को वह संस्थागत संरक्षण मिलेगा जिसकी वह अधिकारपूर्वक हकदार है? क्या उनके नाम पर राष्ट्रीय स्तर की ‘तीजन बाई पंडवानी एवं लोककला अकादमी स्थापित होगी? क्या हबीब तनवीर के नाम पर एक समर्पित राष्ट्रीय रंग एवं लोककला शोध संस्थान बनेगा? क्या उनके जीवन, कृतित्व और कलात्मक विरासत का व्यवस्थित डिजिटल अभिलेखीकरण किया जाएगा? क्या विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पंडवानी तथा छत्तीसगढ़ की अन्य लोककलाओं को गंभीर अध्ययन का विषय बनाया जाएगा?
आज आवश्यकता केवल शोक व्यक्त करने की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकल्प लेने की है। लोककलाएं केवल कलाकारों के भरोसे जीवित नहीं रहतीं। उन्हें समाज, सरकार, शिक्षा व्यवस्था और सांस्कृतिक संस्थाओं का संरक्षण चाहिए। यदि हम सचमुच तीजन बाई को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो उनकी स्मृति को केवल प्रतिमाओं, स्मारकों और औपचारिक समारोहों तक सीमित नहीं रहने देना होगा। उनकी सबसे बड़ी स्मृति तब बनेगी जब गांवों में फिर पंडवानी की तान गूंजेगी, लोक रंगमंच आबाद होगा और युवा पीढ़ी अपने लोक कलाकारों को केवल इतिहास नहीं, अपने वर्तमान का हिस्सा मानेगी।
छत्तीसगढ़ सरकार के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। जिस प्रकार राज्यों ने अपने महान साहित्यकारों, संगीतकारों और कलाकारों के नाम पर संस्थाएं, संग्रहालय और शोध केंद्र स्थापित किए हैं, उसी प्रकार तीजन बाई और हबीब तनवीर की विरासत को भी जीवंत संस्थागत स्वरूप दिया जाना चाहिए। भिलाई, रायपुर या गनियारी में राष्ट्रीय स्तर का लोककला परिसर, पंडवानी गुरुकुल, डिजिटल अभिलेखागार, रंग संग्रहालय और वार्षिक अंतरराष्ट्रीय लोक महोत्सव स्थापित करना केवल सम्मान नहीं होगा, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक सुरक्षा का निवेश होगा।
किसी भी सभ्यता की पहचान उसकी ऊंची इमारतों से कम और उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों से अधिक होती है। यदि हम अपने लोक कलाकारों की विरासत को सहेजने में असफल रहे, तो आने वाली पीढिय़ां हमारे आर्थिक विकास की नहीं, हमारी सांस्कृतिक विस्मृति की कहानी लिखेंगी।
आज तीजन बाई का तंबूरा मौन है। लेकिन उससे कहीं अधिक चिंता इस बात की होनी चाहिए कि कहीं हमारी लोक स्मृतियां भी मौन न हो जाएं।
यदि ऐसा हुआ तो यह केवल एक कलाकार की मृत्यु नहीं होगी, बल्कि एक पूरी सभ्यता की स्मृति का क्षरण होगा। तीजन बाई चली गई हैं, लेकिन उनके तंबूरे की प्रतिध्वनि अब भी हमसे एक प्रश्न पूछ रही है—
क्या हम उन्हें सचमुच याद रखेंगे या फिर उन्हें भी समय, बाजार और क्षणिक स्मृतियों की धूल में खो जाने देंगे?