नई दिल्ली। सनातन परंपरा और शास्त्रों में तीर्थ यात्रा का विशेष महत्व बताया गया है। लेकिन सिर्फ किसी पवित्र धाम जाने या वहां नदी में डुबकी लगाने मात्र से पुण्य नहीं मिलता है। शास्त्रों के अनुसार जब तक इंसान अपने अंतर्मन को शुद्ध नहीं करता, तब तक उसकी बाहरी यात्रा अधूरी और व्यर्थ मानी जाती है। ग्रंथों में बताया गया है कि कुछ खास स्वभाव और कमियों वाले लोगों को तीर्थ यात्रा का फल कभी नहीं मिलता है। आइए जानते हैं कौन से हैं वे 5 तरह के लोग जो पुण्य के भागीदार नहीं बन पाते हैं।
बिना श्रद्धा और दिखावे के लिए जाने वाले लोग
नारद पुराण के मुताबिक जो लोग बिना किसी श्रद्धा के सिर्फ घूमने या मनोरंजन के उद्देश्य से तीर्थ पर जाते हैं, उन्हें पुण्य नहीं मिलता है। कई लोग केवल दिखावे के लिए या भीड़ को देखकर यात्रा पर निकल पड़ते हैं। ऐसे लोगों का मन भगवान में नहीं बल्कि बाहरी दुनिया में लगा रहता है, जिससे उनकी यात्रा का कोई लाभ नहीं होता है।
पाप और बुरे कर्म करने वाले इंसान
जो व्यक्ति लगातार बुरे कामों में लगा रहता है और दूसरों को दुख पहुंचाता है, उसे तीर्थ यात्रा का कोई लाभ नहीं मिलता है। ऐसे लोग चाहे कितनी ही बार पवित्र नदियों में स्नान कर लें या बड़े-बड़े मंदिरों के दर्शन कर लें, उनके बुरे कर्मों का हिसाब कम नहीं होता है। मन की पवित्रता के बिना शरीर को पवित्र करना बेकार है।
भगवान पर भरोसा न करने वाले नास्तिक लोग
जिन लोगों को भगवान पर विश्वास ही नहीं होता है, उनके लिए तीर्थ यात्रा महज एक पर्यटन यात्रा जैसी होती है। नास्तिक लोगों के मन में ईश्वर के प्रति कोई सच्चा भाव, आदर या समर्पण नहीं होता है। जब मन में भक्ति का भाव ही नहीं होगा, तो उस स्थान की पवित्र ऊर्जा का असर व्यक्ति पर नहीं पड़ता है।
हर बात पर शंका और संदेह करने वाले व्यक्ति
संशयात्मा यानी वह व्यक्ति जिसके मन में हर समय शक और शंका बनी रहती है। शास्त्रों के अनुसार अगर आपके मन में तीर्थ स्थान या भगवान की शक्ति को लेकर कोई संदेह है, तो आपकी यात्रा व्यर्थ चली जाएगी। पूजा और दर्शन के लिए मन में अटूट विश्वास होना सबसे पहली शर्त है।
सिर्फ गंगा नहाने से नहीं मिलता पुण्य: इन 5 तरह के लोगों की तीर्थ यात्रा होती है बेकार
शास्त्रों में तीर्थ यात्रा को बुद्धि का विषय नहीं, बल्कि पूरी तरह आस्था और समर्पण का विषय माना गया है। जो लोग धार्मिक स्थलों पर जाकर हर रीति-रिवाज और परंपरा में क्यों और कैसे का जवाब ढूंढते हैं, वे भक्ति से दूर हो जाते हैं। हर बात पर तर्क करने की वजह से उनका मन कभी शांत नहीं रहता और वे पुण्य से वंचित रह जाते हैं।