सुभाष मिश्र
शिक्षा का उद्देश्य केवल मेधावी विद्यार्थियों को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि हर बच्चे के भीतर छिपी संभावनाओं को विकसित करना है। यदि विद्यालय केवल अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थियों के लिए अपने दरवाज़े खोलें और कमजोर छात्रों को बाहर का रास्ता दिखाने लगें तो यह शिक्षा नहीं, बल्कि अंकों का कारोबार बनकर रह जाएगी।
छत्तीसगढ़ में हाल ही में सामने आई एक शिकायत ने शिक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कुछ सरकारी स्कूल दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षाओं के खराब परिणाम के डर से कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को प्रवेश देने से बच रहे हैं। इस संबंध में मुख्यमंत्री और स्कूल शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है कि पूर्व कक्षा में कम अंक लाने वाले विद्यार्थियों को यह कहकर लौटा दिया जा रहा है कि इससे विद्यालय का बोर्ड परीक्षा परिणाम प्रभावित होगा। दूसरी ओर, शिक्षा विभाग का कहना है कि सरकारी स्कूलों में किसी भी बच्चे के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है और यदि कहीं ऐसी शिकायत मिलती है तो उसकी जांच की जाएगी।
यह विवाद केवल एक शिकायत भर नहीं है। यह उस मानसिकता को उजागर करता है जो पिछले कई वर्षों से हमारी शिक्षा व्यवस्था में धीरे-धीरे गहराती जा रही है जहां विद्यालयों की पहचान शिक्षा की गुणवत्ता से कम और बोर्ड परीक्षा के परिणाम, मेरिट सूची और शत-प्रतिशत सफलता से अधिक होने लगी है। यह प्रवृत्ति पहले निजी स्कूलों तक सीमित मानी जाती थी। अनेक निजी विद्यालय वर्षों से अच्छे परिणाम बनाए रखने के लिए कमजोर विद्यार्थियों को प्रवेश देने से बचते रहे हैं। कहीं ग्यारहवीं में प्रवेश नहीं दिया जाता, कहीं विषय बदलने का दबाव बनाया जाता है और कहीं बोर्ड परीक्षा से पहले ही दूसरे विद्यालय का रास्ता दिखा दिया जाता है। अब यदि यही सोच सरकारी विद्यालयों तक पहुँच रही है, तो यह कहीं अधिक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि सरकारी विद्यालयों का मूल उद्देश्य ही उन बच्चों तक शिक्षा पहुँचाना है, जिन्हें सबसे अधिक सहारे की आवश्यकता होती है।
आज शिक्षा का पूरा वातावरण प्रतिस्पर्धा से संचालित हो रहा है। स्कूल अपनी रैंकिंग, रिजल्ट और टॉपरों के विज्ञापन में व्यस्त हैं। कोचिंग संस्थान तीन-तीन महीने के प्रदर्शन के आधार पर विद्यार्थियों के बैच तय करते हैं। कोटा जैसे बड़े शिक्षा केंद्रों में तो प्रारंभिक परीक्षा से ही तय होने लगता है कि कौन-सा विद्यार्थी शीर्ष बैच में जाएगा और कौन पीछे रहेगा। यह व्यवस्था व्यावसायिक संस्थानों की हो सकती है, लेकिन सरकारी शिक्षा व्यवस्था भी इसी मानसिकता से चलने लगे तो शिक्षा के मूल उद्देश्य पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि केवल तेज़ विद्यार्थियों को ही पढ़ाना है तो फिर शिक्षक की भूमिका क्या रह जाती है? अच्छे अंक लाने वाला छात्र तो अपनी मेहनत और पारिवारिक सहयोग से भी आगे बढ़ सकता है। असली शिक्षक वह है, जो औसत छात्र को बेहतर बनाए, कमजोर छात्र में आत्मविश्वास जगाए और पिछड़ रहे बच्चे को आगे बढ़ाए। शिक्षा की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि विद्यालय में कितने टॉपर निकले, बल्कि यह होना चाहिए कि उसने कितने कमजोर विद्यार्थियों का भविष्य संवार दिया।
भारतीय संविधान समान अवसर की बात करता है। यद्यपि शिक्षा का अधिकार कानून मुख्यत: 6 से 14 वर्ष के बच्चों यानी कक्षा पहली से आठवीं तक लागू होता है, फिर भी सरकारी विद्यालयों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी विद्यार्थी के साथ केवल कम अंक के आधार पर भेदभाव न करें। यदि सीट उपलब्ध है और बच्चा पढऩा चाहता है, तो उसे केवल इसलिए प्रवेश से वंचित करना कि उसका पिछला परिणाम कमजोर था, शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के विपरीत है।
यह समस्या केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि बोर्ड परीक्षा के परिणाम बेहतर दिखाने के लिए कमजोर विद्यार्थियों को दूसरे विद्यालयों में भेजने या प्रवेश न देने की कोशिश की गई। कई मामलों में शिक्षा विभाग को जांच करनी पड़ी और विद्यालयों को प्रवेश देने के निर्देश भी जारी करने पड़े। यह बताता है कि समस्या स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा व्यवस्था में पनप रही एक प्रवृत्ति है।
विडंबना यह है कि सरकारें एक ओर स्कूल छोड़ चुके बच्चों को वापस शिक्षा से जोडऩे के लिए अभियान चलाती है, दूसरी ओर कम अंक लाने वाले विद्यार्थियों को ही विद्यालय से बाहर रखा जाने लगे, तो ऐसे अभियान अपने उद्देश्य से भटक जाएंगे। आखिर कमजोर विद्यार्थी कहां जाएगा? निजी विद्यालय उसे पहले ही स्वीकार नहीं करते और यदि सरकारी विद्यालय भी दरवाज़े बंद कर दें, तो उसके सामने शिक्षा छोडऩे के अलावा क्या विकल्प बचेगा?
आज आवश्यकता बोर्ड परीक्षा के परिणाम सुधारने की अवश्य है, लेकिन उसका रास्ता कमजोर बच्चों को बाहर करना नहीं, बल्कि उन्हें अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता देना है। रिमेडियल कक्षाएं, व्यक्तिगत मार्गदर्शन, विषय विशेषज्ञों की सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श और नियमित शैक्षणिक मूल्यांकन जैसे उपाय परिणाम भी सुधार सकते हैं और शिक्षा के उद्देश्य को भी सुरक्षित रख सकते हैं। आसान रास्ता बच्चों को बाहर करना है, कठिन लेकिन सही रास्ता उन्हें आगे बढ़ाना है। अंतत: यह प्रश्न केवल प्रवेश का नहीं, बल्कि शिक्षा के चरित्र का है। यदि विद्यालय केवल उन बच्चों के लिए रह जाएं जो पहले से अच्छे अंक ला रहे हैं तो शिक्षा सामाजिक न्याय का माध्यम नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा का एक और मंच बनकर रह जाएगी।
किसी भी समाज की पहचान उसके टॉपरों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर बच्चे को कितना आगे ले जा सका। सरकारी विद्यालयों का दरवाज़ा हर बच्चे के लिए खुला होना चाहिए, क्योंकि शिक्षा का अधिकार केवल प्रतिभाशाली बच्चों का अधिकार नहीं, बल्कि उन बच्चों का भी अधिकार है, जिन्हें सबसे अधिक सहारे, अवसर और विश्वास की आवश्यकता है। यदि हम शिक्षा को केवल परिणामों की दौड़ बना देंगे तो हो सकता है विद्यालयों के रिजल्ट बेहतर दिखने लगें लेकिन समाज का भविष्य निश्चित रूप से कमजोर हो जाएगा।