जगदलपुर। बस्तर के जंगलों में कभी बंदूक और बारूद की दुनिया में जीने वाले कई युवाओं की जिंदगी में अब किलकारियों की उम्मीद लौट आई है। वर्षों तक माओवादी संगठन के कठोर नियमों की वजह से संतान सुख से वंचित रहे 73 आत्मसमर्पित माओवादियों को अब परिवार पूरा करने का अवसर मिला है। दरअसल, बस्तर में सक्रिय रहे माओवादी संगठन अपने कैडरों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाते रहे हैं। इनमें सबसे कठोर नियमों में से एक था संतान पैदा न करने का दबाव। संगठन की सोच थी कि परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी कैडरों को संगठन से दूर कर सकती है। इसी वजह से कई पुरुष माओवादियों की नसबंदी कराई जाती थी ताकि वे पूरी तरह संगठन के प्रति समर्पित रहें।
जिला प्रशासन, पुलिस विभाग और यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (यूएसआई) की संयुक्त पहल से जगदलपुर के महारानी अस्पताल में इन पूर्व माओवादियों की सफल रिवर्स वासेक्टॉमी (नसबंदी पुनर्स्थापन) सर्जरी की गई है। यह पहल केवल एक चिकित्सा अभियान नहीं, बल्कि उन जिंदगियों को सामान्य बनाने का प्रयास है, जिन्हें वर्षों तक हिंसा और वैचारिक बंदिशों के बीच जीना पड़ा। समय बदला, कई माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया और मुख्यधारा का रास्ता चुना। सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें रोजगार, आवास और सामाजिक पुनर्स्थापन की सुविधाएं मिलीं।
इनमें से अधिकांश ने विवाह भी कर लिया, लेकिन परिवार बसाने का सबसे बड़ा सपना अधूरा रह गया। शादी के बाद भी वे माता-पिता बनने की खुशी से दूर थे। यह पीड़ा उनके पुनर्वास की प्रक्रिया में एक अनकहा लेकिन बड़ा सवाल बनकर सामने आई। इसी जरूरत को समझते हुए बस्तर पुलिस, जिला प्रशासन और यूएसआई ने एक विशेष अभियान शुरू किया। जगदलपुर के महारानी अस्पताल में दो चरणों में विशेष सर्जरी शिविर लगाए गए। पहले चरण में 33 और दूसरे चरण में 40 पूर्व माओवादियों की जटिल माइक्रोसर्जरी की गई। देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञ यूरोलॉजिस्टों ने इस अभियान में हिस्सा लिया।
महारानी अस्पताल के अधीक्षक डॉ. संजय प्रसाद और यूएसआई के अध्यक्ष डॉ. राजेश कुकरेजा के नेतृत्व में चिकित्सकों की टीम ने इन सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार रिवर्स वासेक्टॉमी एक अत्यंत सूक्ष्म और तकनीकी प्रक्रिया है, जिसमें नसबंदी के दौरान काटी गई नलिकाओं को दोबारा जोड़ा जाता है। इसके लिए उच्चस्तरीय माइक्रोसर्जिकल तकनीक और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी. और जगदलपुर के एसपी शलभ सिन्हा ने इस पहल को पुनर्वास प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। उनका कहना है कि आत्मसमर्पण के बाद केवल रोजगार देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों को सम्मानजनक और पूर्ण पारिवारिक जीवन उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है। इस अभियान की सफलता का सबसे भावनात्मक पहलू तब सामने आया जब योजना का लाभ लेने वाले एक पूर्व माओवादी के घर हाल ही में बेटी का जन्म हुआ। वर्षों तक जंगलों में संघर्ष और हिंसा के बीच जीवन बिताने वाले इस परिवार के लिए यह सिर्फ एक बच्ची का जन्म नहीं, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत है।
बस्तर में माओवादी हिंसा के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच यह पहल एक अलग संदेश देती है। यह बताती है कि पुनर्वास केवल हथियार छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों को समाज में पूरी गरिमा के साथ वापस स्थापित करने की प्रक्रिया है। जिन लोगों से कभी संगठन ने परिवार का अधिकार छीन लिया था, उन्हें अब उसी समाज ने माता-पिता बनने की खुशी लौटाने की कोशिश की है। बस्तर के बदलते दौर में यह शायद सबसे मानवीय और संवेदनशील कहानियों में से एक है।