रायपुर। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत नवविवाहित दुल्हनों को दिए गए मंगलसूत्र के नकली निकलने के मामले में महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने पहली बार खुलकर सफाई दी है। मंत्री ने स्वीकार किया है कि दुल्हनों को दी गई चेन आर्टिफिशियल थी। उनका तर्क है कि योजना में उपहार सामग्री के लिए निर्धारित बजट इतना कम है कि उसमें चांदी की असली चेन उपलब्ध कराना संभव नहीं था।
मंत्री ने कहा कि वर्तमान समय में सोने और चांदी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना में कपड़े, श्रृंगार सामग्री और उपहार के लिए प्रति जोड़ा केवल 7 हजार रुपए का प्रावधान है। इसी राशि में पायल, बिछिया, श्रृंगार सामग्री समेत अन्य आवश्यक वस्तुएं भी खरीदनी होती हैं। ऐसे में असली चांदी की चेन देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था, इसलिए उपहार सामग्री में आर्टिफिशियल चेन शामिल की गई।
यह बयान ऐसे समय आया है जब एमसीबी जिले में सामूहिक विवाह कार्यक्रम में शामिल कई दुल्हनों ने उन्हें दिए गए मंगलसूत्र के नकली होने की शिकायत की है। मामला तब सामने आया जब विवाह के कुछ महीनों बाद कई महिलाओं के मंगलसूत्र काले पड़ने लगे। संदेह होने पर उन्होंने स्थानीय ज्वेलर्स से इसकी जांच कराई, जहां पता चला कि गहना न तो सोने का था और न ही चांदी का, बल्कि गिलट धातु से तैयार किया गया था।
पूरा मामला 10 फरवरी को आयोजित सामूहिक विवाह समारोह से जुड़ा है। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत एमसीबी जिले के खड़गवां विकासखंड के चनवारीडांड में 184 जोड़ों का विवाह कराया गया था। विवाह समारोह के दौरान दुल्हनों को मंगलसूत्र सहित अन्य उपहार सामग्री प्रदान की गई थी। कुछ महीनों बाद उपहार में दिए गए गहनों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे और मामला सार्वजनिक हो गया।
इस बीच कुछ दुल्हनों ने विभागीय अधिकारियों पर गंभीर आरोप भी लगाए। उनका कहना था कि विवाह सामग्री और मंगलसूत्र के नाम पर उनसे 15-15 हजार रुपए तक वसूले गए। इन आरोपों ने विवाद को और गहरा कर दिया। हालांकि प्रशासनिक जांच में संबंधित अधिकारियों को फिलहाल दोषमुक्त बताया गया है।
मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने कहा कि योजना में पहले अनियमितताओं और कमीशनखोरी की शिकायतें मिलती थीं। इसी वजह से सरकार ने अधिकांश राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजने की व्यवस्था लागू की। वर्तमान में योजना के तहत प्रति जोड़ा 50 हजार रुपए खर्च किए जाते हैं। इसमें लगभग 8 हजार रुपए विवाह आयोजन, भोजन और टेंट व्यवस्था पर खर्च होते हैं, जबकि 36 हजार रुपए सीधे दुल्हन के खाते में डीबीटी के माध्यम से जमा किए जाते हैं। सरकार का दावा है कि इससे लाभार्थी अपनी पसंद के अनुसार गहने और अन्य जरूरी सामग्री खरीद सकते हैं। हालांकि मंत्री की सफाई के बावजूद कई सवाल अब भी कायम हैं। यदि उपहार में दी जाने वाली चेन आर्टिफिशियल थी तो इसकी जानकारी लाभार्थियों को पहले क्यों नहीं दी गई?
क्या उपहार सामग्री की गुणवत्ता और प्रकृति को लेकर कोई स्पष्ट मानक तय नहीं थे? और यदि योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों की बेटियों को सम्मानपूर्वक विवाह सहायता देना है, तो क्या प्रतीकात्मक गहनों को असली बताकर वितरित करना उस उद्देश्य की भावना के अनुरूप माना जा सकता है?
मंत्री ने महंगाई और सीमित बजट को कारण बताया है, लेकिन विवाद अब केवल गहने की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रह गया है। यह सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता, लाभार्थियों को दी जाने वाली जानकारी और उपहार सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।