मुंबई, 3 जून 2026
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) बैंकिंग सिस्टम में शॉर्ट-टर्म के लिए कैश (फंड) की कमी को दूर करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। आरबीआई ने कहा कि वह आज यानी 3 जून से 50,000 करोड़ रुपये की दो दिवसीय परिवर्तनीय रेपो दर (वीआरआर) नीलामी आयोजित करेगा। इस 50,000 करोड़ रुपये के इन्फ्यूजन से बैंकों के पास लिक्विडिटी (नकदी) सुधरेगी और ब्याज दरों को स्थिर रखने में मदद मिलेगी। नीलामी सुबह 9:30 बजे से 10 बजे के बीच होगी और इस कोष की वापसी 5 जून को की जाएगी।
आरबीआई ने एक बयान में कहा कि वर्तमान और बदलते कैश सिनेरियो की समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया गया है। वर्तमान में, 1 जून तक बैंकों में नकदी अधिशेष लगभग 85,411.44 करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जो कि 31 मई को 1.40 लाख करोड़ रुपये के अधिशेष से काफी कम है। बैंकों में कम अधिशेष नकदी के बावजूद, आरबीआई द्वारा मंगलवार को आयोजित वीआरआर नीलामी में बैंकों की मांग में थोड़ी नरमी देखी गई थी। उस तीन दिवसीय वीआरआर नीलामी में केंद्रीय बैंक को 75,000 करोड़ रुपये की अधिसूचित राशि के मुकाबले 17,445 करोड़ रुपये की ही बोलियां प्राप्त हुईं, जिसे शीर्ष बैंक ने 5.26 प्रतिशत की कट-ऑफ और भारित औसत दर पर स्वीकार कर लिया था।
जानिए क्या है वेरिएबल रेपो रेट (VRR)?
वेरिएबल रेपो रेट (वीआरआर) एक मॉनेटरी पॉलिसी टूल है जिसका इस्तेमाल आरबीआई बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी को मैनेज करने के लिए करता है। निश्चित रेपो दर (फिक्स्ड रेपो रेट) के उलट, जो आरबीआई द्वारा पहले से तय होती है, वीआरआर में ब्याज दर नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित की जाती है। इसका मतलब है कि बैंक फंड्स के लिए बोली लगाते हैं, और रेट की कीमत डिमांड और सप्लाई के आधार पर तय होती है। वीआरआर का इस्तेमाल आमतौर पर 2 से 14 दिन या उससे ज्यादा समय के लिए होता है। इसे बैंकों को फंड्स उधार लेने में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी देने के लिए डिजाइन किया गया है।
मॉनेटरी पॉलिसी में वेरिएबल रेपो रेट की भूमिका
वीआरआर, लिक्विडिटी को रेगुलेट करने में मदद करके मॉनेटरी पॉलिसी में एक अहम भूमिका निभाता है। जब महंगाई ज्यादा होती है, तो आरबीआई बैंकों से अतिरिक्त फंड वापस लेने के लिए इसका इस्तेमाल करता है। इससे सर्कुलेशन में मौजूद अतिरिक्त पैसे को कम करके महंगाई को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। इसी तरह, जब मार्केट में लिक्विडिटी की कमी होती है, तो आरबीआई बैंकिंग सिस्टम में ज्यादा फंड डालने के लिए ऑक्शन की फ्रीक्वेंसी बढ़ा देता है। इससे यह पक्का होता है कि बैंक बिजनेस और आम लोगों को आसानी से लोन देना जारी रख सकें।