0-हनी ट्रैप का महाविस्फोट, श्वेता-रेशू नेटवर्क से सत्ता और सिस्टम में हड़कंप
कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर
छत्तीसगढ़ से लेकर मध्य प्रदेश तक फैले बहुचर्चित हनी ट्रैप नेटवर्क की परतें अब धीरे-धीरे खुलने लगी हैं। मामले की मुख्य आरोपी मानी जा रही श्वेता जैन के पुराने वीडियो फिर जांच एजेंसियों के हाथ लगे हैं और इन्हीं वीडियो ने पूरे केस को नया मोड़ दे दिया है। सूत्रों के अनुसार इन वीडियो में दोनों राज्यों के कई प्रभावशाली नेता, वरिष्ठ अधिकारी और रसूखदार चेहरे दिखाई दे रहे हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि इन्हीं वीडियो के आधार पर लंबे समय तक ब्लैकमेलिंग और करोड़ों की वसूली का खेल चलता रहा।
बताया जा रहा है कि श्वेता जैन ने रेशू चौधरी के साथ मिलकर इस नेटवर्क को विस्तार दिया। पुराने वीडियो और संपर्कों का उपयोग कर नए लोगों को जाल में फंसाया गया। जांच में यह भी सामने आ रहा है कि “हनी ट्रैप पार्ट-1” और “हनी ट्रैप पार्ट-2” अब पूरी तरह एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं। जिन चेहरों के नाम पहले पर्दे के पीछे थे, अब उनकी कड़ियां एक-एक कर सामने आने लगी हैं। पुलिस और जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क को केवल ब्लैकमेलिंग तक सीमित नहीं मान रहीं, बल्कि इसे संगठित उगाही और डिजिटल अपराध के बड़े सिंडिकेट के रूप में देख रही हैं।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब केवल क्राइम ब्रांच की एसआईटी ही नहीं, बल्कि एटीएस की भी एंट्री होने की खबर है। सूत्रों के मुताबिक एटीएस की टीम मध्य प्रदेश के सागर स्थित नेहानगर मकरोनिया पहुंची, जहां रेशू चौधरी से जुड़े ठिकानों पर तलाशी ली गई। यहां से कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मोबाइल, हार्ड डिस्क और अन्य डिजिटल सामग्री जब्त की गई है। जांच एजेंसियों का पूरा फोकस इस बात पर है कि वीडियो और डिजिटल डेटा किन-किन लोगों तक भेजे गए, किस माध्यम से शेयर हुए और इस नेटवर्क में पर्दे के पीछे कौन-कौन शामिल है।
सूत्रों के अनुसार जांच एजेंसियां केवल वीडियो बनाने वालों तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि उन लोगों की भी पहचान की जा रही है जिन्हें ये क्लिप फारवर्ड किए गए या जिन्होंने ब्लैकमेलिंग के दबाव में आर्थिक लेनदेन किया। डिजिटल फॉरेंसिक टीम कथित चैट, बैंकिंग ट्रेल, क्लाउड स्टोरेज और सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी जांच कर रही है।
उधर पूरे मामले में पुलिस की असामान्य गोपनीयता लगातार सवाल खड़े कर रही है। हनी ट्रैप पार्ट-2 की मुख्य आरोपी रेशू चौधरी को मीडिया से पूरी तरह दूर रखा गया। यहां तक कि उसे कोर्ट परिसर में पेश करने की बजाय गुपचुप तरीके से जज के बंगले पर पेश किया गया। यही प्रक्रिया अन्य आरोपियों के साथ भी अपनाई गई। श्वेता जैन, अलका दीक्षित, विनोद शर्मा, जयदीप दीक्षित, लाखन चौधरी और जितेंद्र पुरोहित को भी बिना किसी सार्वजनिक हलचल के अदालत परिसर के बजाय न्यायाधीश के आवास पर पेश किया गया।
सूत्र बताते हैं कि अलसुबह क्राइम ब्रांच की टीम सभी आरोपियों को मेडिकल परीक्षण के लिए एमवाय अस्पताल लेकर पहुंची। इसके बाद पूरी कार्रवाई बेहद गोपनीय तरीके से की गई। पुलिस को आशंका थी कि यदि आरोपियों का मीडिया से सामना हुआ तो मामले में बड़ा राजनीतिक विस्फोट हो सकता है। यही वजह रही कि पूरी पेशी प्रक्रिया को सामान्य न्यायिक गतिविधि से अलग तरीके से अंजाम दिया गया। अदालत से वारंट जारी होने के बाद अधिकांश आरोपियों को जेल भेज दिया गया, जबकि कथित लेडी तस्कर अलका दीक्षित की रिमांड बढ़ाई गई है। जेल भेजे गए आरोपियों में रेशू चौधरी, श्वेता जैन, लाखन चौधरी, जयदीप दीक्षित, जितेंद्र पुरोहित और सेवा से बर्खास्त हेड कांस्टेबल विनोद शर्मा शामिल हैं।
यह पहली बार नहीं है जब पुलिस ने इस तरह की गोपनीय रणनीति अपनाई हो। इससे पहले भी रेशू चौधरी और विनोद शर्मा को चुपचाप जज के बंगले पर पेश कर पुलिस रिमांड ली गई थी। उस समय पुलिस को 25 मई तक की रिमांड मिली थी। सभी को उम्मीद थी कि रिमांड खत्म होने के बाद आरोपियों को नियमित कोर्ट में पेश किया जाएगा, लेकिन पुलिस ने फिर अलसुबह कार्रवाई कर पूरे घटनाक्रम को गोपनीय बनाए रखा।
सूत्रों का कहना है कि जांच एजेंसियों को सबसे अधिक चिंता रेशू चौधरी को लेकर है। आशंका जताई जा रही है कि यदि वह मीडिया के सामने खुलकर बोलती है तो कई बड़े नाम सार्वजनिक हो सकते हैं और राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ सकता है। जांच में अब तक जो तथ्य सामने आए हैं, उनसे संकेत मिल रहे हैं कि श्वेता जैन, अलका दीक्षित और रेशू चौधरी की तिकड़ी लंबे समय से प्रभावशाली लोगों को टारगेट कर रही थी। कई लोगों के कथित वीडियो तैयार किए गए और बाद में उन्हीं के आधार पर दबाव बनाकर सौदेबाजी की जाती रही।
मामले की सबसे संवेदनशील कड़ी यह मानी जा रही है कि इस नेटवर्क में केवल निजी संबंधों का इस्तेमाल नहीं हुआ, बल्कि डिजिटल तकनीक, सोशल नेटवर्किंग और प्रभावशाली संपर्कों का भी सुनियोजित उपयोग किया गया। यही कारण है कि अब यह केस केवल एक सामान्य हनी ट्रैप नहीं, बल्कि राजनीतिक, प्रशासनिक और आपराधिक गठजोड़ की बड़ी जांच के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में कई और नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है, जिससे दोनों राज्यों की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में हलचल बढ़ सकती है।