रायपुर/बिलासपुर:
छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा विभाग और विशेषकर अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय (बिलासपुर) से संबद्ध महाविद्यालयों में इन दिनों एक अजीबोगरीब ‘श्रम शोषण’ का खेल चल रहा है। मामला उच्च शिक्षित युवाओं—जिन्होंने M.Sc., Ph.D., और NET जैसी सर्वोच्च डिग्रियां हासिल की हैं—की सेवाओं और उनके वैध पारिश्रमिक (Remuneration) से जुड़ा है।
सरकारी आदेशों की आड़ में इन अतिथि व्याख्याताओं के श्रम का उपयोग तो कर लिया गया, लेकिन जब बात भुगतान की आई, तो नियम-पुस्तिकाओं का हवाला देकर हाथ खड़े किए जा रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
उच्च शिक्षा विभाग के निर्देशानुसार, शैक्षणिक सत्र की समाप्ति के मद्देनजर 15 मई को अतिथि व्याख्याताओं की सेवाएं आधिकारिक रूप से स्थगित (समाप्त) कर दी गईं। नियमतः इसके बाद उनसे कोई शासकीय कार्य नहीं लिया जा सकता था।
लेकिन विडंबना देखिए, विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों द्वारा मुख्य परीक्षाओं का आयोजन 27 मई से 30 मई और 31 मई तक किया गया। परीक्षा को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए इन महाविद्यालयों के पास पर्याप्त स्टाफ नहीं था। इस कमी को पूरा करने के लिए उन्हीं अतिथि व्याख्याताओं को आपातकालीन स्थिति में ड्यूटी (Inviligation/Exam Duty) पर बुलाया गया, जिन्हें 15 मई को “कार्यमुक्त” किया जा चुका था।
कानूनी और नैतिक सवाल: जब सेवा में नहीं थे, तो काम क्यों लिया?
इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर कानूनी और प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं:
आधिकारिक हैसियत (Legal Status) क्या थी?
जब 15 मई को सेवाएं स्थगित हो चुकी थीं, तो 27 से 31 मई के बीच किस हैसियत से इन युवाओं से शासकीय कार्य लिया गया? यदि परीक्षा के दौरान कोई अप्रिय स्थिति या तकनीकी गड़बड़ी होती, तो उसकी जिम्मेदारी किस पर होती? क्योंकि रिकॉर्ड में वे उस समय कॉलेज के कर्मचारी ही नहीं थे।
श्रम का उपयोग, पर भुगतान गायब:
अतिथि व्याख्याताओं का आरोप है कि उन्हें केवल ‘रैम्यूनरेशन’ (प्रति कालखंड/प्रतिदिन के मानदेय) के आधार पर बुलाया गया था। लेकिन अब जब वे अपने इस अवधि के पारिश्रमिक की मांग कर रहे हैं, तो बजट और ‘सेवा समाप्ति’ का हवाला देकर उन्हें टालने की कोशिश की जा रही है।
’फ्री-सर्विस’ की मानसिकता:
पूरे छत्तीसगढ़ के महाविद्यालयों में यह एक अघोषित ढर्रा बन चुका है। पढ़े-लिखे, योग्य युवाओं की मजबूरी का फायदा उठाया जाता है। उनसे परीक्षाओं में वीक्षक (Invigilator), मूल्यांकन और अन्य प्रशासनिक काम तो करा लिए जाते हैं, लेकिन भुगतान के वक्त उन्हें प्रशासनिक चक्रव्यूह में उलझा दिया जाता है।
”डिग्री का सम्मान करें, शोषण बंद हो”
अतिथि व्याख्याताओं का कहना है कि वे राज्य के सबसे पढ़े-लिखे वर्ग में आते हैं। उच्च शिक्षा विभाग उनसे बंधुआ मजदूरों की तरह व्यवहार नहीं कर सकता।
”15 मई के बाद हमसे काम लेना ही पूरी तरह से नीति-विरुद्ध था। और यदि व्यवस्था की लाचारी के कारण हमें बुलाया भी गया, तो हमारे श्रम का एक-एक पैसे का भुगतान तुरंत होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा विभाग में योग्यता का यह अपमान बेहद निराशाजनक है।”
— पीड़ित अतिथि व्याख्याता
निष्कर्ष: सुधार की जरूरत
यह स्थिति केवल एक विश्वविद्यालय या कॉलेज की नहीं है, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में एक पैटर्न बन चुकी है। बजट की कमी या प्रशासनिक लेटलतीफी का खामियाजा इन युवाओं को उठाना पड़ रहा है। शासन-प्रशासन को इस मामले को संज्ञान में लेकर तत्काल प्रभाव से 15 मई के बाद कार्य कर चुके सभी अतिथि व्याख्याताओं के वैध पारिश्रमिक का भुगतान सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” की परिकल्पना में शिक्षित युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो।
उच्च शिक्षा में ‘श्रमदान’ का खेल: 15 मई को सेवा समाप्त, फिर भी परीक्षा के नाम पर काम लिया; अब पारिश्रमिक देने में आनाकानी
31
May