-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से जुड़ा कथित एआई जनरेटेड वीडियो विवाद किसी एक नेता या दल की छवि तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह उस गहरी और असहज सच्चाई का संकेत है कि भारतीय राजनीति अब वैचारिक संघर्ष से आगे बढ़कर तकनीकी छल के दौर में प्रवेश कर चुकी है। यह दौर ऐसा है, जहाँ झूठ केवल बोला नहीं जाता, उसे दृश्य प्रमाण की तरह गढ़कर परोसा जाता है। राजनीति में चरित्रहनन नया नहीं है। पर्चों, अफवाहों, फर्जी दस्तावेजों और दुष्प्रचार का इतिहास पुराना है। लेकिन एआई और डीपफेक ने इस हथियार को इतना परिष्कृत बना दिया है कि अब सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। दृश्य का झूठ, शब्दों के झूठ से कहीं अधिक प्रभावी होता है और यही इस खतरे का मूल है।
मुद्दा यह नहीं कि वीडियो में कौन दिखाया गया, चाहे नरेंद्र मोदी हों, भूपेश बघेल हों या कोई और। असली चिंता यह है कि अब मतदाताओं की चेतना को प्रभावित करने के लिए तथ्य नहीं, बल्कि कृत्रिम रूप से निर्मित दृश्य इस्तेमाल किए जा रहे हैं। जब राजनीतिक संघर्ष में तर्क की जगह तकनीकी फरेब ले ले, तो यह लोकतंत्र के स्तर के गिरने का संकेत है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या राजनीतिक दल स्वयं इस गंदगी से अछूते हैं? क्या दुष्प्रचार केवल अज्ञात सोशल मीडिया अकाउंट्स तक सीमित है, या संगठित आईटी सेल, ट्रोल नेटवर्क और प्रचार तंत्र भी इस अंधेरे को खाद-पानी देते रहे हैं? सच्चाई यह है कि वर्षों से आधे-सच और दुष्प्रचार को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाने वाली राजनीति अब डीपफेक के रूप में उसी संस्कृति की चरम परिणति देख रही है।
डीपफेक केवल गलत सूचना नहीं फैलाता, यह सत्य की अवधारणा पर ही हमला करता है। यह ऐसा वातावरण बनाता है जहाँ असली वीडियो को भी नकली कहा जा सकता है और नकली वीडियो को असली मान लिया जाता है। यह ‘पोस्ट-ट्रुथÓ राजनीति का सबसे उन्नत औजार है, जहाँ भ्रम पैदा करना ही रणनीति बन जाती है। दुनिया भर में इसके खतरों के संकेत स्पष्ट हैं। अंतरराष्ट्रीय संघर्षों जैसे ईरान-अमेरिका तनाव के दौरान फर्जी वीडियो और एआई जनरेटेड कंटेंट के जरिए माहौल भड़काने की कोशिशें सामने आई हैं, जहाँ सरकारों को मीडिया और जनता को चेतावनी तक देनी पड़ी। यही प्रवृत्ति चुनावों के दौरान और खतरनाक हो जाती है, जब जनमत को प्रभावित करना लक्ष्य होता है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति भी इससे अछूती नहीं रही। अतीत में कथित सीडी कांडों से लेकर हालिया एआई जनरेटेड वीडियो तक, व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल लगातार होता रहा है। समस्या यह है कि जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक बदनामी अपना काम कर चुकी होती है। और अब स्थिति और जटिल हो गई है, क्योंकि असली अपराधी भी अपने वास्तविक वीडियो को डीपफेक कहकर बच निकलने की कोशिश कर सकते हैं।
यही इस तकनीक का सबसे खतरनाक पहलू है यह दोधारी तलवार है। एक ओर एआई ने रचनात्मकता, सिनेमा, शिक्षा और नवाचार के नए द्वार खोले हैं, वहीं दूसरी ओर यह झूठ को विश्वसनीय बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम भी बन चुका है।
इसलिए यह बहस किसी एक नेता या दल की प्रतिष्ठा बचाने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता को बचाने की होनी चाहिए। कानून को दिखावटी कार्रवाई से आगे बढऩा होगा। डीपफेक को केवल आईटी अपराध नहीं, बल्कि चुनावी हस्तक्षेप और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध एक गंभीर अपराध के रूप में परिभाषित करना होगा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करनी होगी और डिजिटल साक्षरता को नागरिक सुरक्षा का हिस्सा बनाना होगा।
लेकिन सबसे जरूरी आत्मालोचना है, राजनीतिक वर्ग के भीतर। नैतिकता का सवाल चयनात्मक नहीं हो सकता। जो आज डीपफेक का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके अपने डिजिटल नेटवर्क ऐसे हथकंडों से मुक्त हों।
तकनीक स्वयं न तो नैतिक होती है, न अनैतिक, उसका उपयोग ही उसका चरित्र तय करता है। लेकिन जब वही तकनीक झूठ को सच जैसा बना दे, तब खतरा केवल तकनीकी नहीं, नैतिक और राजनीतिक भी हो जाता है और सच यही है। डीपफेक अब केवल एक डिजिटल समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भीतर पनपती नैतिक गिरावट का आईना है। इसे केवल अपराध मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसे एक चेतावनी की तरह पढऩा होगा, उस राजनीति के लिए, जो धीरे-धीरे सत्य से दूर होती जा रही है।